देश के विकास में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) का बड़ा हाथ रहता है और पिछले वित्त वर्ष में इसमें उल्लेखनीय सुधार हुआ. ताजा आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में, भारत में 94.53 अरब डॉलर का रिकॉर्ड निवेश हुआ. यह पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है. इससे न केवल अर्थव्यवस्था को सहारा मिला, बल्कि गिरते हुए रुपये को थामने में भी कुछ हद तक मदद मिली. इस वृद्धि का मुख्य कारण यह रहा है कि सरकार ने एफडीआइ से संबंधित नियमों में कुछ जरूरी बदलाव किये हैं, जिससे निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी है. इसके तहत खास तरह के उन निवेशों पर लगे अंकुश को हटाया या कम किया गया है, जो पड़ोसी राष्ट्रों, जैसे चीन से आते हैं. परिणामस्वरूप, 4,895.65 करोड़ रुपये की 29 परियोजनाएं इस वर्ष अगस्त तक भारत में आयीं. चीन भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करने को उत्सुक दिखाई दे रहा है, पर सरकार इस दिशा में सावधानी से काम कर रही है. वह केवल उन्हीं क्षेत्रों को खोल रही है, जिनमें विदेशी निवेश से राष्ट्रीय हितों पर आंच न आये. भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बीते एक दशक में तेजी से बढ़ा है. इसके पीछे सरकार के नीतिगत बदलाव की पॉलिसी है. इसके तहत सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में विश्वभर से पूंजी आने के लिए नियम-कानूनों को सरल बनाया और बाधाओं को हटाया. इन क्षेत्रों में वित्तीय सेवा, टेक्नोलॉजी, मैन्युफैक्चरिंग और स्वच्छ ऊर्जा शामिल हैं, जिनमें हमें बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है. इस संबंध में आंकड़े कुछ उत्साहजनक तस्वीर पेश कर रहे हैं. अप्रैल, 2000 से मार्च, 2026 तक कुल निवेश 1.16 खरब डॉलर रहा. बीता दशक तो रिकॉर्ड बढ़ोतरी का रहा. वित्त वर्ष 2013-14 में जहां विदेशी निवेश 36.05 अरब डॉलर का था, वह वित्त वर्ष 2025-26 आते-आते 94.53 अरब डॉलर का हो गया. यानी, 2014 से 2025 तक भारत में 748.78 अरब डॉलर के रिकॉर्ड विदेशी निवेश का प्रवाह हुआ. निवेश में इस अभूतपूर्व बढ़ोतरी का बड़ा कारण देश की नीतियों में लगातार सकारात्मक बदलाव का होना रहा है. कुछ क्षेत्रों में निवेशकों को सरकारी अनुमति की पहले से जरूरत नहीं रही है. सरकार ने कोयला खनन और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में सौ प्रतिशत निवेश की इजाजत दे दी है, जिसका लाभ देखने में आ रहा है. बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दी गयी है. जबकि टेलीकॉम सेक्टर को ऑटोमेटिक रूट में डाल दिया गया है और इसमें कोई भी विदेशी कंपनी कभी भी निवेश कर सकती है. बीमा क्षेत्र में एफडीआइ को बढ़ाकर सौ प्रतिशत करने की बात भी चल रही है. यहां संबंधित कंपनियों के लिए बहुत गुंजाइश है, क्योंकि देश की कुल जनसंख्या के मात्र पांच प्रतिशत का ही बीमा हुआ है. उसमें भी बहुत बड़ी तादाद उन लोगों की है, जिनकी बीमा राशि काफी कम है. इससे बड़े पैमाने पर रोजगार मिलने की भी संभावना है. भारत में, हाल में जिन क्षेत्रों में एफडीआइ आये, वे हैं मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और उच्च लागत वाले टेक्नोलॉजी सेक्टर. कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है. देश के टेक्नोलॉजी सेक्टर में 2025-26 में 13.9 अरब डॉलर का विदेशी निवेश आया, जो इस बात का प्रमाण है कि देश के टेक्नोलॉजी सेक्टर में बहुत जान है और उसका भविष्य उज्ज्वल है. माइक्रोसॉफ्ट ने भारत में अपने क्लाउड और एआइ इंफ्रास्ट्रक्चर में तीन अरब डॉलर के निवेश की हाल ही में घोषणा की है. इसी तरह, सर्विस सेक्टर में 2025-26 में 10 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया. इस सेक्टर में वित्तीय सेवा, बैंकिंग, बीमा, बिजनेस आउटसोर्सिंग, आरएंडडी और टेक्नोलॉजी टेस्टिंग को रखा गया है. अप्रैल, 2020 से इस सेक्टर में कुल मिलाकर 127.26 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया, जो एक रिकॉर्ड है. पर जो क्षेत्र सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करता है, वह है मैन्युफैक्चरिंग. अब विदेशी निवेशक इस क्षेत्र में भी निवेश करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. वे ऑटोमोबाइल, फार्मा और इंफ्रास्ट्रक्चर में भी बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे हैं. इस बड़े निवेश का एक कारण सरकार द्वारा उत्पादन से जुड़ी इंसेंटिव स्कीम (पीएलआइ) को चालू करना है, जिससे इस क्षेत्र में रिटर्न बढ़िया आ रहा है. मतलब साफ है, अब भारत को सिर्फ आइटी और सर्विस सेक्टर के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि उसका दायरा बढ़ गया है. इसकी मुख्य वजह नीतियों में बदलाव तो है ही, डिप्लोमेसी के जरिये भी देश कोे आर्थिक शक्ति के रूप में पेश किया गया है. अब भारत एक-दो देशों पर निर्भर नहीं है. कई देश भारत में निवेश करने जा रहे हैं. बस, सरकार को अपनी नीतियों में समयानुसार बदलाव करना चाहिए. साथ ही नौकरशाही पर भी अंकुश लगाना चाहिए. यदि नौकरशाही नियंत्रण में नहीं होगी, तो विदेशी निवेशक यहां आने के पहले सोचेंगे. जरूरत यह भी है कि हम मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चीन की अपार सफलता से भी कुछ सीखें. हालांकि, यहां भारत और चीन की तुलना नहीं हो सकती, क्योंकि हमारा देश लोकतांत्रिक है और यहां कायदे-कानून हैं. जबकि चीन में श्रमिकों के कल्याण के कानूनों की बलि दे दी जाती है. भारत में जिस रफ्तार से विदेशी निवेश आ रहा है, उसे और बढ़ाने की जरूरत है, ताकि जीडीपी तो बढ़े ही, बड़े पैमाने पर रोजगार का भी सृजन हो. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)