इस बार भले ही आंकड़ों में देश के बड़े हिस्से में औसत से कम बरसात हुई हो, पर जहां भी इंद्रदेव की कृपा हुई, नदी-नाले उफनकर बस्तियों में घुस गये. भारत में जलवायु परिवर्तन, अनियमित मॉनसून और अत्यधिक बारिश के कारण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं का दायरा बीते दो वर्षों में जिस तरह व्यापक हुआ है, उसने देश के नीति-निर्माताओं, पर्यावरणविदों और आम जनजीवन के समक्ष विकट चुनौती खड़ी कर दी है. आधिकारिक और पर्यावरण संबंधी रिपोर्टों के अनुसार, 2024 व 2025 में बाढ़ और भारी बारिश ने जो तबाही मचायी है, वह केवल आर्थिक या ढांचागत नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमारे विकास के पैमानों और पर्यावरण संरक्षण की नीतियों पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिये हैं. गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, 2024-25 के दौरान प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से बाढ़ और चरम मौसम के कारण देशभर में 3,080 से अधिक लोगों की मौतें दर्ज की गयीं. वर्ष 2024 में देश में लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ में डूब गयी और लगभग 3.64 लाख से अधिक मकानों को आंशिक या पूर्ण रूप से नुकसान पहुंचा. इस दौरान क्षेत्रीय प्रभाव भी बेहद विनाशकारी रहे, जहां केरल के वायनाड में आये भीषण भूस्खलन ने भारी तबाही मचायी, वहीं देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में भी नदियों के उफान पर होने से भारी तबाही देखने को मिली. वर्ष 2025 के दौरान मॉनसून और बेमौसम बारिश ने देश के अधिकांश हिस्सों में नुकसान पहुंचाया. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और मौसम विभाग की रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में भारत ने लगभग 331 दिन किसी न किसी रूप में चरम मौसमी घटनाओं का सामना किया. इस वर्ष मॉनसून और बाढ़-बारिश जनित हादसों से देशभर में 2,700 से अधिक लोगों की जान चली गयी. मॉनसून के दौरान देश के विभिन्न प्रमुख नदी बेसिनों, विशेषकर गंगा और यमुना बेसिन में 59 से अधिक स्थानों पर उच्च स्तर की विनाशकारी बाढ़ रिकॉर्ड की गयी. करोड़ों हेक्टेयर फसलें जलमग्न हो गयीं और कृषि क्षेत्र के साथ-साथ पशुधन को भी भारी क्षति उठानी पड़ी. पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इस आपदा से सर्वाधिक प्रभावित राज्य रहे. पंजाब में सतलुज-घग्गर बेसिन के कई जिले पूरी तरह जलमग्न हो गये थे, जिससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गयी, बल्कि बुनियादी ढांचे को हजारों करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ा. हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहाड़ों के दरकने और लगातार बादल फटने की घटनाओं ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया. इन आंकड़ों और घटनाओं का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि भारत में अब कम दिनों में अत्यंत तीव्र बारिश का नया और खतरनाक पैटर्न विकसित हो रहा है. कम समय में अत्यधिक बारिश होने से अचानक आने वाली बाढ़ में बेतहाशा वृद्धि हुई है. जब कुछ ही घंटों में महीनों की बारिश हो जाती है, तो हमारी पारंपरिक जल निकासी प्रणालियां, नदियां और झीलें उस अपार जलराशि को संभालने में असमर्थ हो जाती हैं. परिणामस्वरूप, शहरों से लेकर गांवों तक पानी का सैलाब तबाही मचाता हुआ निकल जाता है. बाढ़ के इस बढ़ते दायरे और विभीषिका के कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित और अवैज्ञानिक शहरीकरण है. हमारे महानगरों और कस्बों में प्राकृतिक जल निकास मार्गों, तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमि पर अवैध कब्जे कर लिये गये हैं, जिससे पानी के प्राकृतिक बहाव का रास्ता बंद हो चुका है. कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके शहरों में पानी जमीन के भीतर जाने के बजाय सड़कों पर बहता है, जिससे मामूली बारिश भी बाढ़ का रूप ले लेती है. वनों की अंधाधुंध कटाई और पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ दिया है. नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में छेड़छाड़ और बांधों के कुप्रबंधन ने भी बाढ़ के संकट को और गंभीर बना दिया है. वैश्विक तापन के कारण समुद्र के तापमान में हो रही वृद्धि और मॉनसूनी हवाओं के पैटर्न में आ रहा बदलाव इस समस्या को वैश्विक स्तर पर और जटिल बना रहा है. इस आसन्न संकट से निपटने के लिए युद्धस्तर पर ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे. देश की जल प्रबंधन नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है. नदियों के पुनर्जीवन, पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और वाटरशेड मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान देना होगा. शहरी क्षेत्रों में स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम का विकास किया जाना चाहिए और सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी प्राकृतिक जल स्रोत या वेटलैंड पर अतिक्रमण न हो. पहाड़ों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा. संवेदनशील क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण कार्यों पर रोक लगानी होगी. कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आपदा से बचाने के लिए मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को अत्याधुनिक बनाना होगा. वृक्षारोपण अभियानों को जन आंदोलन का रूप देना होगा, विशेषकर नदी के किनारों और पहाड़ी ढलानों पर बड़े पैमाने पर पौधे लगाने होंगे. पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, इसमें समाज के हर वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी. बाढ़ के बढ़ते दायरे को रोकना केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, देश की आर्थिक संप्रभुता, खाद्य सुरक्षा और नागरिकों के जीवन की रक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य बन चुका है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)