लाल किले से प्रधानमंत्री ने देश के डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, अच्छे शिक्षकों और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने वाला एक व्यापक नेटवर्क तैयार करने की घोषणा की. इस पहल का उद्देश्य सराहनीय है. कोचिंग महंगी है और बेहतर कोचिंग संस्थानों तक पहुंच काफी हद तक उन्हीं लोगों की है, जो इसका खर्च उठा सकते हैं. छोटे शहर या गरीब परिवार का प्रतिभाशाली बच्चा केवल इसलिए पीछे नहीं रहना चाहिए क्योंकि कोई दूसरा उम्मीदवार कोचिंग पर कई लाख रुपये खर्च कर सकता है. अच्छे शिक्षकों और अध्ययन सामग्री तक मुफ्त पहुंच इस असमानता को कम कर सकती है. पर इस घोषणा में एक विडंबना भी छिपी है. कोचिंग इतनी अनिवार्य क्यों हो गयी है? अभिभावक कोचिंग पर भरोसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें सामान्य स्कूली शिक्षा या कॉलेज की शिक्षा पर पूरा भरोसा नहीं होता. बेशक, निजी ट्यूशन के पीछे अन्य कारण भी हैं. पर देश में इसके असाधारण महत्व को औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता. वर्ष 2025 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, स्कूल जाने वाले 27 फीसदी बच्चे निजी कोचिंग लेते हैं. उच्च माध्यमिक स्तर पर यह अनुपात बढ़कर 37 फीसदी हो जाता है. दूसरी ओर, असर (एएसइआर) बुनियादी शिक्षा में गंभीर कमियों को लगातार सामने रखता रहा है. वर्ष 2024 में सरकारी स्कूलों की कक्षा पांच के केवल 44.8 प्रतिशत बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे और एक-तिहाई से भी कम बच्चे साधारण भाग दे सकते थे. एक ओर बुनियादी शिक्षा कमजोर बनी हुई है, दूसरी तरफ परीक्षाओं में सफलता दिलाने के लिए तेजी से विकसित होता एक उद्योग मौजूद है. छात्र आधिकारिक तौर पर स्कूल में नामांकित रहते हैं, पर अपना अधिकांश समय जेइइ या नीट की कोचिंग में बिताते हैं. कक्षा महज औपचारिकता बन जाती है और कोचिंग केंद्र पढ़ाई की वास्तविक जगह बन जाता है. छात्र नीट की तैयारी में आठ से पंद्रह घंटे तक लगा सकते हैं, इसके बावजूद उन्हें जीव विज्ञान की प्राथमिक प्रयोगशाला गतिविधियों में कठिनाई हो सकती है. परीक्षा के प्रारूपों से परिचित होना जरूरी नहीं कि गहरी समझ भी पैदा करे. कमजोर स्कूली शिक्षा के अलावा इसका बड़ा कारण अवसरों की कमी है. इस वर्ष 16 लाख से अधिक उम्मीदवारों ने जेइइ मेन के लिए पंजीकरण कराया. इनमें से केवल शीर्ष 2.5 लाख जेइइ एडवांस में आगे बढ़ने के पात्र होते हैं. वहां से भी बहुत कम छात्र आइआइटी में प्रवेश पाते हैं. चिकित्सा महाविद्यालयों, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में भी ऐसी सीमित अवसरों वाली स्थिति है. जब कुछ चुनिंदा और प्रतिष्ठित अवसरों को लाखों अभ्यर्थियों के बीच बांटना हो, तो परीक्षा महज ज्ञान की जांच नहीं रह जाती. उसका उद्देश्य बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को बाहर करना होता है. यदि हर व्यक्ति कोचिंग पर दोगुना खर्च करने लगे, तब भी आइआइटी की सीटों या सरकारी नौकरियों की संख्या दोगुनी नहीं होगी. हर परिवार अपने बच्चे की स्थिति बेहतर करने की कोशिश में लगा है. पर आगे निकलने की कोशिश में भारी मात्रा में पैसा, समय तथा युवाओं की ऊर्जा खर्च हो रही है. इसी कारण परीक्षा की विश्वसनीयता इतनी महत्वपूर्ण है. प्रश्नपत्र लीक होना इस भरोसे को नष्ट कर देता है. जब एक परीक्षा किसी के करियर को बना या बिगाड़ सकती है, तब उसकी विश्वसनीयता सार्वजनिक संपत्ति बन जाती है. एक और विकृति सामने आयी है. लाखों उम्मीदवारों की परीक्षा लेने की जरूरत ऐसे मानकीकृत परीक्षणों को बढ़ावा देती है, जिनकी जांच आसानी से मशीनों से की जा सके, खासकर बहुविकल्पीय प्रश्नों को. पर जब एक महत्वपूर्ण परीक्षा किसी छात्र के भविष्य पर हावी हो जाती है, तब पढ़ाई परीक्षा की तैयारी में बदल जाती है, ज्ञान पैटर्न पहचानने तक सीमित हो जाता है और सीखने की प्रक्रिया को चार विकल्पों में से तीन को जल्दी से खारिज कर देने की क्षमता समझ लिया जाता है. वर्ष 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इसी खतरे को पहचाना था. इसमें उच्च दांव वाली एकल परीक्षा आधारित व्यवस्था से हटकर दक्षता और अवधारणात्मक समझ पर जोर देने की बात कही गयी थी. पर अवसरों की मूल कमी अब भी बनी हुई है. सरकारें भी कोचिंग की इस दौड़ का हिस्सा बन गयी हैं. महाराष्ट्र का राज्य प्रशासनिक करियर संस्थान यूपीएससी की मुफ्त पूर्णकालिक कोचिंग उपलब्ध कराता है. अन्य राज्यों में भी ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं और केंद्र सरकार की भी विशेष रूप से वंचित वर्गों के लिए योजनाएं हैं. इसका उद्देश्य गरीब और मेधावी छात्रों को उनकी तैयारी में मदद करना है. मुफ्त कोचिंग तात्कालिक स्तर पर असमानता कम करने का उपयोगी माध्यम हो सकती है. पर यह मूलतः असमान प्रतियोगिता के लिए एक सुधारात्मक उपाय है, उस व्यवस्था का इलाज नहीं, जो ऐसी प्रतियोगिता को जन्म देती है. कोचिंग केवल भारत की समस्या नहीं है. जापान एवं दक्षिण कोरिया में भी बेहद मजबूत स्कूल व्यवस्था के बावजूद गहन परीक्षा-तैयारी वाले कोचिंग स्कूलों की संस्कृति रही है. गणित, पठन और विज्ञान में जापान का प्रदर्शन अब भी ओइसीडी के औसत से काफी ऊपर है. उधर फिनलैंड राष्ट्रीय स्तर की उच्च दांव वाली परीक्षाओं पर बहुत कम जोर देता है, जबकि जर्मनी विश्वविद्यालयी शिक्षा के साथ सम्मानित व्यावसायिक और प्रशिक्षुता आधारित शिक्षा के रास्ते भी उपलब्ध कराता है. सीख यह नहीं है कि अच्छी सार्वजनिक स्कूली शिक्षा से कोचिंग पूरी तरह समाप्त हो जाती है. सीख यह है कि युवाओं को शिक्षा, कौशल, सम्मान व रोजगार तक पहुंचने के लिए कई विश्वसनीय रास्तों की जरूरत होती है. यही वास्तविक सुधार का एजेंडा है. सामान्य स्कूलों और विश्वविद्यालयों को मजबूत किया जाये. संस्थानों की संख्या बढ़ाने के बजाय अच्छे संस्थानों की उपलब्धता बढ़ायी जाये. परीक्षाओं में कोचिंग से मिली दक्षता के बजाय समझ की जांच की जाये. व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को वास्तविक प्रतिष्ठा दी जाये. आकर्षक और सुरक्षित रोजगार के कहीं अधिक अवसर पैदा किये जायें, ताकि लाखों युवा भारतीय सरकारी नौकरियों की कुछ ही सीटों की ओर टूट पड़ने को मजबूर न हों. भारत का डिजिटल ढांचा निश्चित रूप से लाखों लोगों तक मुफ्त कोचिंग पहुंचा सकता है. पर इससे भी बड़ी उपलब्धि ऐसी शिक्षा और रोजगार व्यवस्था तैयार करनी होगी, जिसमें परिवारों को शुरुआत से ही कोचिंग खरीदने की मजबूरी महसूस न हो. बोतलबंद पानी सस्ता करना उपयोगी है. पर नलों से आने वाले पानी को भरोसेमंद बनाना ही वास्तविक समाधान है.(ये लेखक के निजी विचार हैं.)