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बांधों की सुरक्षा पर बढ़े ध्यान

By संपादकीय
Updated Date
बांधों की सुरक्षा पर बढ़े ध्यान
बांधों की सुरक्षा पर बढ़े ध्यान
फाइल फोटो

रवि शंकर

लेखक एवं शोधकर्ता

ravishankar.5107@gmail.com

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के बांधों पर हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले पांच वर्षों में सैकड़ों बांध पुराने हो जायेंगे. जिन देशों में ये बांध हैं, वहां की आबादी को इससे खतरा होगा. भारत में 2025 तक 1000 से अधिक बड़े बांध लगभग 50 वर्ष पुराने हो जायेंगे. इस तरह दुनियाभर में पुराने ढांचे भविष्य में खतरा बढ़ने का कारण बन सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2050 तक दुनिया की ज्यादातर आबादी 20वीं सदी में बने इन हजारों बांधों के नीचे की ओर बसी होगी और इसके चलते पुराने बांधों से उन्हें गंभीर खतरा होगा. दुनिया के कुल 58,700 बड़े बांधों में से ज्यादातर का निर्माण वर्ष 1930 से 1970 के बीच हुआ है.

इन्हें 50 से 100 वर्ष के लिए बनाया गया था. कंक्रीट से बने बांधों की दीवारें 50 साल के बाद टूटने की स्थिति में आ जाती हैं, इसलिए दुनिया के हजारों बांध इस समय खतरनाक स्थिति में पहुंच गये हैं. दुनिया में 55 फीसदी यानी 32,716 बांध चार एशियाई देशों चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया में हैं. भारत में 1115 बड़े बांध 2025 में 50 वर्ष से अधिक पुराने हो जायेंगे. इसी तरह 2050 तक 4250 बांध 50 वर्ष के हो जायेंगे, जबकि 64 बांध ऐसे हैं जो वर्ष 2050 तक 150 वर्ष से अधिक पुराने हो जायेंगे.

बड़े बांधों की संख्या के मामले में चीन और अमेरिका के बाद भारत तीसरे नंबर पर है. नेशनल रजिस्टर ऑफ लार्ज डैम्स (एनआरएलडी) की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 5,254 बड़े बांध बन चुके हैं और 447 निर्माणाधीन हैं. इन बांधों के पानी भंडारण की क्षमता 253 बीसीएम (बिलियन क्यूबिक मीटर) है. अन्य 51 बीसीएम क्षमता भंडारण के लिए बांधों का कार्य प्रगति पर है. दुनिया में जितने बांध हैं, उनमें अनुमानत: 7000 से 8300 क्यूबिक किलोमीटर पानी जमा है. यह पानी इतना है, जो कनाडा जैसे देश की 80 फीसद आबादी को कवर कर सकता है.

इस रिपोर्ट का मकसद है कि बांधों की सुरक्षा पर सरकारों और एजेंसियों का ध्यान खींचा जाए. पुराने बांधों को अपग्रेड करने या उन्हें बंद करने के बारे में फैसला लिया जा सके, ताकि लोगों की जिंदगी खतरे में न पड़े. भारत में बाढ़ जैसी अापदा में इन बांधों का खतरा और ज्यादा हो जाती है. बांध के किनारे और निचले स्तर के क्षेत्रों में पानी भर जाता है. इससे लोगों को विस्थापित होना पड़ता है. सरकारी कोशिशों के बावजूद इसमें कोई बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला. बांध विफलता का सबसे बड़ा कारण है-बाढ़.

भारत के हर क्षेत्र में बड़ी संख्या में नदियों और पहाड़ों के होने से अनेक बांधों का निर्माण संभव हुआ है. लेकिन बांधों के सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक असर को न आंकते और न जांचते हुए कैसे अवैज्ञानिक तरीके से आगे धकेला जाता है यह विविध उदाहरणों से उजागर हो रहा है. पिछले कुछ दशकों में बांधों का समुचित रखरखाव नहीं होने से 36 बांध टूटे हैं. इनके अचानक टूटने से न केवल पर्यावरणीय क्षति हुई, बल्कि हजारों लोगों की मौतें भी हुईं.

बाढ़ का पानी अचानक बढ़ जाने से बांध टूट जाते हैं. दूसरा कारण पानी की निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था है. त्रुटिपूर्ण पाइपिंग अथवा निर्माण कार्य के कारण भी बांध टूट जाते हैं. विकास की वर्तमान अवधारणा का समय-समय पर आकलन जरूरी है. हमने इतने वर्षों तक नदियों को मात्र मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन माना, इसके परिणाम हमारे सामने हैं. बांध विफलता की पहली घटना 1917 में मध्य प्रदेश में तब हुई, जब ज्यादा पानी भरने से तिगरा बांध टूट गया था. जानमाल का सबसे अधिक नकुसान 1979 में गुजरात का मच्छू बांध टूटने पर हुआ था.

इस हादसे में करीब 2,000 लोग मारे गये. देश में बांध सुरक्षा संबंधी कई चुनौतियां हैं. जैसे-जैसे बांध पुराने होते जाते हैं, उनके डिजाइन, जल विज्ञान और प्रणाली नवीनतम जरूरत के अनुरूप नहीं रहते. बड़े पैमाने पर गाद जमा होने से बांधों की जलधारण क्षमता कम हो रही है.

डैम सेफ्टी स्कीम के तहत देश के सभी पुराने हो चुके बांधों की सुरक्षा तय करने और उन्हें लंबे समय तक उपयोगी बनाये रखने के लिए केंद्र सरकार खर्च कर रही है. स्वतंत्रता के बाद से ही भारत सरकार के लिए ये प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहे हैं. लेकिन विश्व बांध आयोग की रिपोर्ट और नदी पर बने बांधों के अनुभव से पता चलता है कि बांध से जो लाभ होना था, वह तो नहीं हुआ, बल्कि पर्यावरण पर और स्थानीय आवास पर नकारात्मक असर हुआ है. इसलिए, यह राष्ट्रीय जिम्मेदारी है कि यह सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जाये.

बांध संचालन के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके दिशा-निर्देश भी स्पष्ट होने चाहिए, क्योंकि बांध एक ऐसा आधारभूत ढांचा होता हैं जिसकी किसी राष्ट्र की आर्थिक, भौगोलिक, राजनीतिक और समाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका होती है. इसका निर्माण बहुद्देश्यीय उपयोग, जैसे- सिंचाई, बिजली उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, जल आपूर्ति और औद्योगीकरण के लिए किया जाता है. भविष्य में यदि भारत में नदी जोड़ों अभियान जोर पकड़ता है तो बांध और नहरों के निर्माण से लेकर दो या इससे अधिक राज्यों में जल-बंटवारे को लेकर जो विवाद उत्पन्न होते हैं, उन्हें निपटाने में सुगमता होगी.

Posted By : Sameer Oraon

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