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असमंजस के भंवर में कांग्रेस

पार्टी को नये सिरे से अपनी विचारधारा को परिभाषित करना है, ताकि वह अपनी उपस्थिति का विस्तार कर सके.

By रशीद किदवई
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असमंजस के भंवर में कांग्रेस
असमंजस के भंवर में कांग्रेस
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लंबे समय से कांग्रेस के भीतर जो स्थिति दिख रही है, उससे एक प्रमुख संकेत यह मिलता है कि राहुल गांधी पार्टी में नयापन लाना तथा नयी ऊर्जा का संचार करना चाहते हैं. इसके लिए वे कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं. इस प्रयास में कभी उन्हें लाभ होता हुआ, तो कभी घाटा होता हुआ दिखायी दे रहा, जो किसी राजनीतिक दल के साथ होना स्वाभाविक है. लेकिन कांग्रेस की विडंबना यह है कि लोकसभा के दो चुनाव लगातार बुरी तरह से हारने के बावजूद उसकी संरचना में कोई बदलाव नहीं हुआ है. ऐसा किसी भी राजनीतिक दल में नहीं होता है.

स्मरण करें, साठ के दशक के अंतिम वर्षों में जब अनेक राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ था, तब दो वर्ष के भीतर 1969 में कांग्रेस दो फाड़ हो गयी थी. उस समय के कद्दावर कांग्रेसी नेता अलग हो गये और इंदिरा गांधी को नये लोगों के साथ नये सिरे से पार्टी को खड़ा करने में सहूलियत हुई. आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव से पहले और बाद में बहुत से नेता इंदिरा गांधी से अलग हो गये, जिसमें देवकांत बरुआ भी शामिल थे, जो कभी ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा लगाया करते थे.

उस उल्लेख का आशय यह है कि बड़े-बड़े वफादार कांग्रेसियों ने भी पार्टी छोड़ दी थी. एक बार फिर इंदिरा गांधी को अपने हिसाब से पार्टी को बनाने का मौका हासिल हुआ. सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ऐसे अवसर नहीं मिल सके. इतना ही नहीं, 2014 और 2019 के चुनावी हार की कोई जवाबदेही भी तय नहीं हुई.

पार्टी नेतृत्व के पास कार्यकर्ताओं और समर्थकों को कोई स्पष्टीकरण देने के लिए उत्तर भी नहीं है. इस वजह से हर कांग्रेसी कार्यकर्ता के मन में शिकायत और नाराजगी है. मेरा संकेत केवल उन कांग्रेसी नेताओं की ओर नहीं है, जिन्हें हम जी-23 के नाम से जानते हैं. आम कांग्रेसजन पार्टी की वर्तमान स्थिति के लिए कहीं-न-कहीं शीर्ष नेतृत्व को दोषी मानते हैं.

बीते वर्षों में पार्टी ने विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए सम्मेलन और अधिवेशन भी नहीं बुलाये हैं. साल 2019 के चुनाव के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से दिये अपने इस्तीफे को वापस भी नहीं लिया और तब से सोनिया गांधी कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में काम कर रही हैं. इसके बावजूद पार्टी के निर्णयों पर मुख्य रूप से राहुल गांधी की ही चलती है. आज जो भ्रामक वातावरण बना हुआ है, इसकी एक पृष्ठभूमि है. पंजाब के मसले पर पार्टी के तीन वरिष्ठ नेताओं- मल्लिकार्जुन खड़गे, जेपी अग्रवाल और हरीश रावत- की रिपोर्ट में 18 एजेंडे तय हुए थे.

उस प्रक्रिया में हर पार्टी विधायक की राय ली गयी थी. उसके बाद कहा गया कि नवजोत सिंह सिद्धू अच्छे चेहरे के रूप में उभर सकते हैं और उन्हें राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया गया. फिर तेजी से घटनाएं हुईं और कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन इस निर्णय में विधायकों की रायशुमारी नहीं की गयी और कांग्रेस की कार्य संस्कृति के अनुरूप आपसी विवादों को दबा दिया गया.

सिद्धू अभी भी अपने पुराने मुद्दों पर अड़े हुए हैं, जिसमें धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने से जुड़ा हुआ एक मसला प्रमुख है. उस मामले के जांच दल के अधिकारी को पुलिस महानिदेशक बनाये जाने से सिद्धू बिफर पड़े हैं. यह भी सवाल है कि इस अधिकारी को वरिष्ठ अधिकारियों पर वरीयता देते हुए यह पद दिया गया है. यह भी कहा जा रहा है कि इस नियुक्ति के पीछे किसी धार्मिक डेरे की भूमिका भी है.

यह कहा जा सकता है कि अब जो पंजाब कांग्रेस में आंतरिक संघर्ष हो रहा है, इसमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की भूमिका नहीं है. पंजाब में धार्मिक आस्था भावनात्मक मुद्दा है. सिद्धू करतारपुर साहिब गलियारे को लेकर अपनी बढ़त बना चुके हैं. उन्हें लगता है कि बेअदबी के मामले को रफा-दफा करने की कोशिश हुई है. उन्हें उम्मीद है कि इस मसले को उठाने से उनका कद बढ़ेगा. इसी कारण आज का संकट पैदा हुआ है.

अब कांग्रेस के सामने यही रास्ता है कि सिद्धू को समझा-बुझा कर या तुष्ट कर उन्हें वापस अध्यक्ष पद पर बैठाया जाए, जिससे पार्टी की योजना को आगे बढ़ाया जाये. ऐसा करने से सिद्धू का कद और बढ़ेगा तथा संकेत जायेगा कि उन्होंने आलाकमान को भी झुकने पर मजबूर किया. लेकिन राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतना सबसे महत्वपूर्ण है और उन्हें यह कर दिखाना होगा. ऐसा नहीं होगा, तो हाल में हारे हुए राज्यों की सूची में पंजाब का नाम भी जुड़ जायेगा. अगर सिद्धू की नाराजगी बनी रही और वे चुनाव के समय आम आदमी पार्टी का दामन थाम लें, तो कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं लगेगा.

पंजाब का असर अन्य राज्यों, खास कर जहां कांग्रेस सरकारें हैं, की कांग्रेस राजनीति पर भी पड़ेगा. कांग्रेस आलाकमान के साथ एक बड़ी समस्या है कि वह नेताओं और कार्यकर्ताओं से पूरे समर्पण की अपेक्षा रखता है. अगर सिद्धू प्रकरण को नहीं संभाला जायेगा, तो राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट को साध कर चलने की योजना गड़बड़ हो सकती है. छत्तीसगढ़ में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

पार्टी के शीर्ष पर देखें, तो वरिष्ठ नेताओं का एक ऐसा समूह है, जो 2014 के चुनाव के बाद से ही आलाकमान पर सवाल उठाता रहा है. उससे कांग्रेस विरोधियों को ही फायदा होता है. वामपंथी युवा नेता कन्हैया कुमार के कांग्रेस में शामिल होने पर पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने आपत्ति जतायी है, वह इसी श्रेणी में हैं. कांग्रेस और वाम विचारधारा व पार्टियों के संपर्क, संबंध एवं समर्थन का इतिहास बहुत पुराना है. इस पर आपत्ति उठाने का कोई तुक नहीं है.

तीन दशक के आर्थिक सुधारों, जिसकी शुरुआत राजीव गांधी के कार्यकाल में हुई थी, का लाभ उठानेवाला वर्ग आज कांग्रेस के साथ नहीं है. ऐसे में पार्टी को नये सिरे से अपनी विचारधारा और कार्य संस्कृति को परिभाषित करना है, ताकि वह अपनी उपस्थिति का विस्तार कर सके.

उसे मजदूर, किसान और युवा वर्ग की समस्याओं को उठाना होगा. इन वर्गों की संख्या भी बहुत बड़ी है. कांग्रेस को यहां एक संभावित जमीन नजर आ रही है. इसलिए वह वाम रुझान के कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है. दस-पंद्रह साल में हर राजनीतिक दल अपनी सोच और कार्यशैली में बदलाव करता है. कांग्रेस में यही प्रक्रिया चल रही है और इस क्रम में उसमें उथल-पुथल चलती रहेगी.

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