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महामारी को लेकर ब्रिटेन का असमंजस

Updated at : 16 Jun 2021 7:54 AM (IST)
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महामारी को लेकर ब्रिटेन का असमंजस

तेज टीकाकरण अभियान की बदौलत ब्रिटेन में 62 प्रतिशत लोगों को टीके की एक खुराक दी जा चुकी है और लगभग 42 प्रतिशत लोगों को दोनों टीके लग चुके हैं.

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कोरोना महामारी की यूरोप में सबसे बुरी मार झेलनेवाले ब्रिटेन के लोग बड़ी बेसब्री से 21 जून का इंतजार कर रहे थे. इसी दिन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की चरणबद्ध कोरोना-मुक्ति योजना के अनुसार वे तमाम बची-खुची पाबंदियां हटायी जानी थीं, जो महामारी की रोकथाम के लिए लगायी गयी थीं, लेकिन भारत से आये डेल्टा कोरोना ने इस पर सवाल खड़ा कर दिया है.

स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक ने पिछले दिनों स्पष्ट किया कि डेल्टा वायरस काबू में नहीं आया, तो बाकी पाबंदियों को हटाने की तारीख आगे बढ़ायी जा सकती है. यह वायरस पिछले कुछ हफ्तों के दौरान इंग्लैंड के उत्तरी शहर मैनचेस्टर के नजदीकी बोल्टन और ब्लैकबर्न जैसे शहरों और पश्चिमी लंदन के हाउंसलो जिले में तेजी से फैला है. इन सभी जगहों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं.

ताजा शोध के मुताबिक, डेल्टा वायरस सामान्य कोरोना वायरस की तुलना में 40 फीसदी ज्यादा तेजी से फैलता है. सोमवार को ब्रिटेन में 5311 लोग संक्रमित हुए और चार लोगों की मृत्यु हुई. भारत की तुलना में यह आंकड़ा मामूली है, लेकिन ब्रिटेन में यह पिछले हफ्ते की तुलना में लगभग दोगुना है. इसलिए कई वैज्ञानिक और नेता एहतियात बरतने की सलाह दे रहे हैं. दूरी और मास्क की शर्तों में कितनी ढील दी जाए, इस पर भी विचार जारी है.

तेज टीकाकरण अभियान की बदौलत ब्रिटेन में 62 प्रतिशत लोगों को टीके की एक खुराक दी जा चुकी है और लगभग 42 प्रतिशत लोगों को दोनों टीके लग चुके हैं. इसी सप्ताह से 30 वर्ष से ऊपर की उम्र के लोगों का टीकाकरण शुरू हो रहा है. डेल्टा वायरस प्रभावित इलाकों में किशोरों से लेकर वयोवृद्ध लोगों तक, सबको टीके लगाये जा रहे हैं. स्कूलों व कॉलेजों को खुले दो महीने हो चुके हैं.

सभी दुकानें, शराबखाने, रेस्तरां, सिनेमाघर, थिएटर, संग्रहालय, पुस्तकालय और क्लब खुल चुके हैं. केवल नाइट क्लबों, बड़े आयोजनों, रंगारंग कार्यक्रमों और खेल-आयोजनों को अनुमति नहीं है. जल्द ही माध्यमिक स्कूलों और कॉलेजों में टीकाकरण अभियान भी शुरू हो रहा है, ताकि तीसरी लहर न आने पाए. किशोरों के टीकाकरण को लेकर नैतिक बहस भी चल रही है,

क्योंकि ज्यादातर बच्चे और किशोर संक्रमित होने पर गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़ते, लेकिन टीके से भविष्य में होनेवाले बुरे प्रभाव की आशंका पैदा हो जाती है. ऐसे में स्कूल-कॉलेजों में फाइजर के टीके लगाये जायेंगे, क्योंकि नये शोध के अनुसार बच्चों के लिए इस टीके को ज्यादा सुरक्षित पाया गया है. जिन लोगों को दोनों टीके लग चुके हैं, उनका बड़े आयोजनों में और विदेश यात्राओं पर जाना और आसान करने के लिए कोविड पासपोर्ट के प्रस्ताव पर भी नैतिक बहस खड़ी हो गयी है.

पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने कोविड पासपोर्ट की वकालत की है, लेकिन प्रधानमंत्री जॉनसन की सत्ताधारी कंजरवेटिव पार्टी के कई दक्षिणपंथी नेता और मंत्री इसका विरोध कर रहे हैं. उनकी दलील है कि कोविड पासपोर्ट जारी करना उन लोगों के साथ भेदभाव करना होगा, जो या तो स्वास्थ्य संबंधी कारणों से टीका नहीं लगवा पायेंगे या फिर जो टीका नहीं लगवाना चाहेंगे. विकलांगों और गंभीर बीमारी के रोगियों को टीके नहीं लगाये जा रहे हैं.

नैतिक बहस इस बात पर भी छिड़ी हुई है कि ब्रिटिश सरकार के भंडार में बचे टीकों को पहले जरूरतमंद देशों को दिया जाए या पहले ब्रिटेन के बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सबको टीके लगा िदये जाएं. हो सकता है कि तीसरी लहर आने पर बूस्टर के तौर पर एक बार फिर टीका लगाने की जरूरत पड़ जाए. विपक्षी लेबर पार्टी के नेताओं और परोपकारी संगठनों की दलील है कि सबसे पहले उन देशों को टीके देने चाहिए, जहां प्रौढ़ और बुजुर्गों को टीके नहीं लगे हैं.

इसे ध्यान में रखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आठ करोड़ टीकों का दान करने का फैसला किया है. ब्रिटिश सरकार ने 40 करोड़ टीकों का सौदा किया है, जो आबादी के लिए जरूरी 13 करोड़ टीकों से तीन गुना है. इसलिए बूस्टर के लिए सात करोड़ टीके रखने के बाद भी ब्रिटेन बड़ी मात्रा में टीके दान कर सकता है. समस्या यह है कि ये टीके अभी तक बने नहीं हैं और अभी दुनिया की कुल टीका उत्पादन क्षमता इतनी भी नहीं है, जितनी जरूरत अकेले भारत को है.

अच्छी बात यह है कि उत्पादन क्षमता में तेजी से वृद्धि हो रही है. कई कंपनियां एक ही खुराक वाले टीके विकसित कर रही हैं. कुछ कंपनियां सूई की बजाय नाक में स्प्रे द्वारा लगने वाले टीके का विकास कर रही हैं. स्वीडन के टीका शोध संस्थान ने कोविड टीके को पाउडर में बदलने की तकनीक का विकास कर लिया है. पाउडर बने टीके को सामान्य तापमान पर रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर इसमें पानी मिला कर टीके की तरह लगाया जा सकता है. पाउडर बना टीका दक्षिण एशिया और अफ्रीका के देशों के लिए सस्ता और सुगम साबित होगा.

बहरहाल, टीकाकरण और टीका पासपोर्ट पर नैतिक बहस के साथ-साथ अब लोगों का ध्यान अर्थव्यवस्था को उबारने और उसके लिए यातायात और सत्कार क्षेत्र के उद्योगों को पुनर्जीवित करने पर लग गया है. ग्रीस के बाद अब स्पेन और फ्रांस ने पर्यटन के लिए अपने दरवाजे खोलने शुरू कर दिये हैं, लेकिन सभी को भारत में फैले डेल्टा और वियतनाम और थाइलैंड में फैले कोरोना वायरसों का भय है. पर्यटन खोलनेवाले देश टीके के प्रमाणपत्र और नेगेटिव पीसीआर टेस्ट की शर्तों पर प्रवेश करने देंगे. इसलिए ऐसा कोई टीका प्रमाणपत्र बनाने पर भी विचार चल रहा है, जो हर देश में मान्य हो सके.

इस जांच में महामारी की रोकथाम के लिए सरकार की तैयारी से लेकर लॉकडाउन के समय वृद्धाश्रमों के बचाव के लिए किये गये उपायों और टीकाकरण की रफ्तार की छानबीन की जायेगी. सरकार इस जांच को जितना हो सके, देरी से कराना चाहती है, ताकि फैसला कार्यकाल की समाप्ति के आस-पास आए. फिर भी, ब्रिटिश सरकार ने जांच का आश्वासन तो दिया है. भारत में तो इस विषय पर अभी बहस तक नहीं हुई है.

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शिवकांत

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By शिवकांत

शिवकांत is a contributor at Prabhat Khabar.

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