हवा को स्वच्छ बनाने में एआइ यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता मददगार साबित हो सकती है. वायु गुणवत्ता के आंकड़े बड़े निगरानी केंद्रों, कम कीमत वाले सेंसर्स, विभिन्न मॉडल्स और पूर्वानुमानों के साथ उत्सर्जन सूची (एमिशन इन्वेंटरी) और सर्वेक्षण जैसे विभिन्न स्रोतों से आते हैं. ऐसी सभी जानकारियों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना एक चुनौती है. फिर इन आंकड़ों को सही से समझना और इन्हें अमल में लाने योग्य बनाना बिल्कुल अलग चुनौती है. यहीं पर एआइ-संचालित 'डिसीजन सपोर्ट सिस्टम' की भूमिका है. यह जटिल विश्लेषण की जरूरत पूरी कर वायु गुणवत्ता प्रबंधनकर्ताओं को सीधे कदम उठाने में मदद कर सकता है. काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वॉटर (सीइइडब्ल्यू) तथा आइआइटी, गांधीनगर मिलकर एक 'वायुचैट' विकसित कर रहे हैं, जो वायु गुणवत्ता की मॉनिटरिंग करने वाले स्टेशनों, स्वीकृत लो कास्ट सेंसर्स और राज्यस्तरीय जनसांख्यिकी जैसी जानकारियों को एक प्लेटफॉर्म पर लायेगा. इस पर लोग सरल अंग्रेजी में सवाल पूछ सकेंगे. सीइइडब्ल्यू में एक एआइ-संचालित सिनारियो टूल भी विकसित किया जा रहा है, जो वायु गुणवत्ता के विभिन्न स्तरों के लिए अलग-अलग विकल्पों के मॉडल बना सकता है. जटिल वायु गुणवत्ता मॉडलों के जरिये ऐसा करने का पारंपरिक तरीका खर्चीला है, जबकि एआइ से लागत कम हो जाती है. एआइ वायु गुणवत्ता के प्रभावी व किफायती प्रबंधन का प्रमुख माध्यम बन रहा है. कई जगह वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए सरकार के भीतर और बाहर की विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी होती है. इनको जोड़ने में एआइ का उपयोग हो सकता है. 'डिसीजन सपोर्ट सिस्टम' को एआइ यह बताने में भी सक्षम बना सकता है कि समस्या कहां है. इस दिशा में आगे बढ़ने में ये कदम महत्वपूर्ण होंगे. पहला, एआइ-संचालित डिसीजन सपोर्ट सिस्टम में प्रशिक्षित कर्मियों को शामिल कर इसे अचूक बनाना होगा. दूसरी तकनीक की तरह एआइ संचालित टूल और उपाय भी सौ फीसदी सटीक नहीं होते. हम एक ऐसे टूल की कल्पना करें, जो एक फीसदी की गलती के साथ पराली जलाने या निर्माण स्थलों पर नियमों के उल्लंघनों का पता लगा सकता हो. आप इस त्रुटि दर के साथ 10,000 किसानों या निर्माण स्थलों की निगरानी करते हैं, तब 100 गलत जवाब मिलने की आशंका हो सकती है. इसलिए एआइ के प्रयोग का यह अर्थ नहीं है कि इसे बिना इंसानी जांच के काम करने दिया जाए, खासकर जहां नियमों के कार्यान्वयन, जुर्माना तय करने और वायु गुणवत्ता नियमों के उल्लंघन के आधार पर आर्थिक गतिविधियों को रोकने जैसे फैसले शामिल होते हैं. सतर्क कदमों के साथ एआइ तकनीक के इस्तेमाल से इसका संचालन ढांचा भरोसेमंद बनेगा. दूसरा, एआइ की क्षमताओं का पूरा लाभ उठाने के लिए साझेदारियां बढ़ानी होंगी. सीइइडब्ल्यू ने 'क्लाइमेट रेजिलिएंट एनालिटिक्स एंड विजुअलाइजेशन इंटेलिजेंस सिस्टम' (क्रेविस) नाम से एआइ प्लेटफॉर्म बनाया है. इसमें भारत मौसम विभाग, आइआइटीएम, पुणे और अन्य संस्थानों के सार्वजनिक आंकड़े शामिल किये गये हैं. यह विकासशील देशों में अपनी तरह का पहला टूल है, जिसमें जलवायु के पिछले 40 वर्षों के आंकड़ों का 279 संकेतकों के आधार पर विश्लेषण किया गया है, तो अगले 50 वर्षों की जलवायु स्थितियों का अनुमान लगाया गया है. अब इन अति-स्थानीय आंकड़ों को विभिन्न क्षेत्रीय आंकड़ों, जैसे निर्माण गतिविधियों, डाटा सेंटर्स, बिजली के बुनियादी ढांचे के साथ जोड़ा जा सकता है. फिलहाल इसमें वायु गुणवत्ता के आंकड़े शामिल नहीं हैं, पर ये आंकड़े अन्य संगठनों के सहयोग और साझेदारी से जोड़े जा सकते हैं. क्रेविस को एक 'ओपन-लेयर, ओपन डाटा प्रोटोकॉल प्लेटफॉर्म' के रूप में तैयार किया गया है. हालांकि, इसकी क्षमता वायु गुणवत्ता के आंकड़ों को शामिल करने तक सीमित नहीं, इसे उत्सर्जन व भीषण गर्मी जैसे कारकों से भी जोड़ा जा सकता है. तीसरा, एआइ आधारित औजारों में शुरुआत से ही हितधारकों के सुझावों को शामिल करना होगा. अगर अंतिम उपयोगकर्ता किसी तकनीक को उपयोगी नहीं समझते हैं, तो अच्छा टूल व्यापक प्रयोग में नहीं आ सकता है. इसलिए स्टार्टअप्स और शोध संस्थानों को शुरुआत में ही अपने प्रोटोटाइप को सरकारी हितधारकों के हाथों में सौंप कर उनमें सुधार के लिए सुझाव लेना चाहिए. जैसे, मुंबई नगर निगम, 75 लो-कॉस्ट सेंसर्स से रियल-टाइम जानकारी के लिए, 'मुंबई एयर क्वालिटी नेटवर्क फॉर एडवांस्ड साइंसेज' नाम से एआइ-सक्षम डिसीजन सपोर्ट सिस्टम बनाने के लिए आइआइटी, कानपुर के साथ काम कर रहा है. कुल मिलाकर, एआइ आधारित उपाय बेहतर फैसले लेने में मदद करके वायु गुणवत्ता प्रबंधन में व्यापक बदलाव ला सकते हैं, पर इन्हें अंतिम उपयोगकर्ता की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया जाना चाहिए और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए. हालांकि, एआइ उपायों के इस्तेमाल को लेकर संसाधनों की सततशीलता और डाटा सेंटर्स के पर्यावरणीय प्रभावों की चर्चा शुरू हो जाती है. ऐसे में एआइ उपायों को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले उनके पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, अन्यथा हम स्वच्छ हवा की दिशा में अपने प्रयास तेज करते हुए पर्यावरण के दूसरे पक्षों को नुकसान पहुंचा बैठेंगे. (ये लेखकद्वय के निजी विचार हैं.)