गांधी की ओर लौटते समाधान

Updated at : 18 Apr 2017 6:37 AM (IST)
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गांधी की ओर लौटते समाधान

शैबाल गुप्ता सदस्य सचिव, एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एडीआरआइ), पटना महात्मा गांधी द्वारा 1917 में चंपारण में किये गये प्रथम भारतीय सत्याग्रह की एक सदी पूरे होने के मौके पर बीते 10-11 अप्रैल को पटना में एक ‘राष्ट्रीय विमर्श’ का आयोजन हुआ, जिसने देश में व्याप्त निराशा के घटाटोप अंधेरे में एक बार फिर गांधी […]

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शैबाल गुप्ता
सदस्य सचिव, एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एडीआरआइ), पटना
महात्मा गांधी द्वारा 1917 में चंपारण में किये गये प्रथम भारतीय सत्याग्रह की एक सदी पूरे होने के मौके पर बीते 10-11 अप्रैल को पटना में एक ‘राष्ट्रीय विमर्श’ का आयोजन हुआ, जिसने देश में व्याप्त निराशा के घटाटोप अंधेरे में एक बार फिर गांधी को बुद्धिजीवियों के बीच चल रही चर्चा के केंद्र में ला दिया. देश की आजादी के लिए कांग्रेस-नीत आंदोलन को ‘चंपारण सत्याग्रह’ ने ही पहली बार एक जनाधारित सरोकार का रंग दिया था. आज विश्व जिस अव्यवस्था एवं अशांति से जूझ रहा है, उनके अहिंसक समाधान की सामर्थ्य अब गांधीवादी नीति में ही दिखती है.
गांधीवाद के सरलतम स्वरूप को देखने में दो नतीजे सामने आते हैं.
पहला, गांधी बाध्यकारी ढंग से प्राचीन सोच के नजर आते हैं, और दूसरा, वे किसी भी मानक सांचे से बंधे नहीं दिखते. गांधी सैद्धांतिक रूप से हमेशा समरूप नहीं रहे. उनकी सैद्धांतिक संरचना का ‘हिंद स्वराज’ काल संभवतः सर्वाधिक नकारात्मक चरण था, हालांकि इसे ब्रिटिश उपनिवेशवाद के फलस्वरूप भारतीय उद्योगों के विनाश की आलोचना के रूप में ही देखा जाना चाहिए. चंपारण सत्याग्रह की सफल समाप्ति के बाद, गांधी ने 1919 से शुरुआत कर ‘स्वदेशी आंदोलन’ की रूपरेखा तय की, जिसने घरेलू औद्योगीकरण की नींव रखी. यदि उन्होंने ‘ट्रस्टीशिप’ की अवधारणा को मूर्तरूप दे दिया होता, तो उससे भारत में लोकतांत्रिक औद्योगीकरण शुरू हुआ होता और वह गांधी के जीवन का शीर्ष पल बन गया होता. संभवत: वे पहले भारतीय थे, जिन्होंने रेखांकित किया कि देश के विकास तथा मुक्ति के लिए जरूरी है कि उपनिवेशी राज्य, सिविल सोसाइटी और बाजार तथा कॉरपोरेट क्षेत्र से एक साथ संवाद कायम किये जायें. इन तीनों क्षेत्रों पर गांधी का पूर्ण प्रभाव था.
पटना में संपन्न इस विमर्श के अलावा, एक के तुरंत बाद पढ़ी गयी दूसरी पुस्तक ने मुझे गांधी के दर्शन, खासकर उसके आर्थिक आयाम, पर फिर से गौर करने को प्रेरित किया. पहली पुस्तक सूजन जॉर्ज द्वारा लिखित ‘हाउ दि अदर हाफ डाइज- दि रीयल रीजन फॉर वर्ल्ड्स हंगर’ है, और दूसरी है, आइजक विलियम मार्टिन द्वारा लिखित ‘रिच पीपल्स मूवमेंट्स: ग्रासरूट्स कैंपेंस टु अनटैक्स दि वन परसेंट.’ पहली पुस्तक में सतत विकास के अभाव में सूजन द्वारा तीन प्रभावशाली चीजों की भविष्यवाणी की गयी है- पहली, तीसरा विश्वयुद्ध पानी के प्रश्न पर होगा; दूसरी, तीसरी दुनिया के मनुष्यों द्वारा अन्न की खपत की तुलना में विकसित दुनिया में पालतू पशुओं के द्वारा अधिक अन्न का उपभोग होता है, और तीसरी, यदि उपभोग के मामले में तीसरी दुनिया विकसित दुनिया के ढांचे का अनुकरण करती है, तो उसकी पूर्ति के लिए चार पृथ्वियों की जरूरत होगी.
दूसरी पुस्तक में, कर तथा किसी भी तरह के वित्तीय बंधन से मुक्ति के लिए समृद्धों द्वारा किये गये एक आंदोलन की कहानी है. आइजक लिखते हैं कि ‘15 अप्रैल, 2010 को कर दिवस के अवसर पर लाखों अमेरिकियों ने अमेरिका में रैलियां करके करों तथा पूर्ण शक्तिशाली सरकार के प्रति अपना विरोध व्यक्त किया तथा पूंजीपतियों व समृद्धों के बचाव में गरीबों एवं वंचितों द्वारा प्रयुक्त की जानेवाली जमीनी रणनीति का उपयोग किया.’
सामाजिक शांति तथा समानता के लिए हमें गांधी के आर्थिक सिद्धांतों की दो बुनियादी बातों पर लौटना होगा. पहली, जरूरतों को सीमित करना. उत्पादन में विस्तार की कोई भी तकनीक असीमित जरूरतों को संतुष्ट नहीं कर सकती. उत्पादन को सतत होना चाहिए और हमें पृथ्वी की वहनीय क्षमता का ध्यान भी रखना चाहिए. सूजन के अनुसार, प्राकृतिक संसाधनों का असीमित दोहन दुनिया को एक आपदा बिंदु तक पहुंचा देगा.
दूसरी बात, बढ़ते बाजार-केंद्रित विकास एवं विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों की स्थापना के साथ, अब ट्रस्टीशिप की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक सी लगती है. हालांकि, गांधी ने स्वदेशी आंदोलन के एक अतिरिक्त उत्पाद के रूप में भारतीय पूंजीवाद को बढ़ावा दिया, पर वे इसके विनाशकारी नतीजे भी जानते थे. अपनी हत्या के ठीक पहले उन्होंने इसके व्यावहारिक सूत्र को अंतिम रूप दे दिया था, जिसने ‘समाज की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को एक समतामूलक व्यवस्था में बदल दिया होता, जिसमें एक व्यक्ति संपदा को धारण करने अथवा स्वार्थपूर्ति के लिए उसका उपभोग करने को स्वतंत्र नहीं रहेगा.’
नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में गठित 1946 की अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने गांधी के ट्रस्टीशिप के ऐच्छिक अनुसरण के विरुद्ध प्रथम बजट में न केवल 91 प्रतिशत आयकर का प्रावधान किया, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भ्रष्ट तरीकों से अर्जित धन की जांच के लिए आयोग की भी स्थापना की. तब संसद की दर्शक दीर्घा में बैठे उद्योगपति जीडी बिरला विरोधस्वरूप न केवल संसद से बाहर चले गये, वरन उन्होंने देश के स्टॉक एक्सचेंज में एक पखवाड़े की हड़ताल भी करा दी. गांधी के अत्यंत निकटस्थ सहयोगी बिड़लाजी लियाकत अली का विरोध करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल से मुसलिम लीग के प्रतिनिधि को हटवाने में ही जुट गये.
कुछ अर्थों में गांधी तथा लियाकत अली खान के विचार मिलते-जुलते भी थे. यदि गांधी एवं लियाकत को अपना एजेंडा लागू करने की छूट मिल जाती, तो भारत के विकास की राह बिलकुल अलग रही होती. देश के बंटवारे तथा गांधी की हत्या ने समतामूलक कर ढांचे तथा ट्रस्टीशिप के क्रांतिकारी विचार का क्रियान्वयन रोक दिया. बिलकुल विरोधाभासी रूप में, आज हम भारत में गरीबों की विश्व की सबसे बड़ी तथा अरबपतियों की विश्व की तीसरी सबसे बड़ी तादाद पर गर्व किया करते हैं.
मैं उम्मीद करता हूं कि चंपारण सत्याग्रह की शताब्दी के अवसर पर आयोजित यह ‘राष्ट्रीय विमर्श’ न केवल राष्ट्रीय, बल्कि वैश्विक स्तर पर गांधी के आदर्शों पर एक बार फिर से ध्यान केंद्रित करायेगा. जब तक समृद्धों का प्रति-आंदोलन रोका नहीं जाता, विश्व किसी प्रामाणिक आर्थिक लोकतंत्रीकरण का दीदार नहीं कर सकेगा.
(अनुवाद: विजय नंदन)
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