वेलेंटाइन डे की सुबह क्यों झेंपे मुन्ना

Published at :14 Feb 2014 5:33 AM (IST)
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वेलेंटाइन डे की सुबह क्यों झेंपे मुन्ना

।। सत्य प्रकाश चौधरी ।। प्रभात खबर, रांची मुन्ना बजरंगी आज हिरन के बच्चे की तरह कुलांचे मार रहे हैं. रोम-रोम से तेज फूट रहा है. माथे पर गहरा सिंदूरी तिलक लगा है. चेहरे पर क्रीम की मोटी परत चढ़ी हुई है जो उन्हें ‘नया निखार’ तो दे रही है, पर इस बात की भी […]

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।। सत्य प्रकाश चौधरी ।।

प्रभात खबर, रांची

मुन्ना बजरंगी आज हिरन के बच्चे की तरह कुलांचे मार रहे हैं. रोम-रोम से तेज फूट रहा है. माथे पर गहरा सिंदूरी तिलक लगा है. चेहरे पर क्रीम की मोटी परत चढ़ी हुई है जो उन्हें ‘नया निखार’ तो दे रही है, पर इस बात की भी गवाही दे रही है कि उनके हरहराते हुए आत्मविश्वास को अगर कुछ बांध या थाम रहा है, तो वह है उनका दबा हुआ रंग.

उन्हें इस बात का पूरा ज्ञान है कि भगवान कृष्ण काले थे (आखिर मोहल्ले की सालाना कृष्ण-कथा के आयोजक जो हैं), पर कुछ तो ऐसा जरूर है जो गोरा होने की चाहत दिल से खत्म नहीं होने देता. वह क्या है, क्यों है, इन गहराइयों में उतरने से बेहतर वह ‘फेयर एंड लवली’ लगाना समझते हैं. उनके हाथों में एक बल्ला सुशोभित हो रहा है, जो ‘राष्ट्रप्रेम’ के प्रतीक खेल क्रिकेट का नहीं, बल्कि अमेरिकी खेल बेसबाल का है.

इसका मतलब यह नहीं है कि वह बेसबाल खेलते हैं. इस खेल के बारे उनकी समझ इतनी ही है कि इसका बल्ला मार-पीट में उपयोगी है (हॉकी स्टिक अब पुराने फैशन की लगती है) और इसकी टोपी में एक स्टाइल है. तभी चचा बजरंगी भी पप्पू पनवाड़ी की दुकान पर पहुंचे. मुन्ना ने उनके पैर छुए. आशीर्वाद देने की जगह चचा ने पूछा, ‘‘पूरा तैयारी है न?’’ जवाब में मुन्ना कानों तक होंठ फैला कर मुस्कराये. मैंने पप्पू से इशारे में पूछा कि किस तैयारी की बात हो रही है.

पप्पू ने इशारे की ऐसी-तैसी करते हुए बुलंद आवाज में जवाब दिया, ‘‘अरे आज भेलन्टाइन डे है न. भइया पार्क में बैठनेवाला लड़का-लड़की सबको ठीक करने निकलने वाले हैं.’’ मुझे याद आया- अरे हां, यह तो मुन्ना के लिए सालाना पर्व है, जिसके जरिये वह पश्चिमी संस्कृति का विनाश और भारतीय संस्कृति की स्थापना करते हैं. वैसे, मुन्ना बजरंगी प्रेम के विरोधी नहीं, पर यह काम वह पार्क में ठीक नहीं मानते. इसलिए उन्होंने प्यार के लिए स्टेशन के पास एक दोस्त के होटल में जुगाड़ बैठा रखा है.

चचा बजरंगी का परिचय तो रह ही गया. वह मुन्ना के युवा संगठन के संरक्षक हैं. सभा-समाज के बीच बात-बात पर कहते सुने जाते हैं, ‘‘क्या जमाना आ गया है?’’ उस वक्त अगर आप उन्हें देखें, तो ऐसा लगेगा कि घृणा से थूकने का काम आंखों से भी बखूबी किया जा सकता है.

लेकिन, जब वह अपने खास दोस्तों के साथ होते हैं, तो मस्ती करते लड़के -लड़कियों को देख उनकी आंखों से घृणा की जगह लार टपकती दिखती है. उनके मुंह से बेसाख्ता फूट पड़ता है, ‘‘काश! हम लोग आज के जमाने में पैदा हुए होते.’’ तभी सामने सड़क पर बिना साइलेंसर वाली एक मोटर-बाइक तेजी से गुजरती है. उसकी पिछली सीट इतनी ज्यादा उठी हुई है कि यह समझ में नहीं आ रहा, मुंह पर दुपट्टा बांधे लड़की बाइक पर सवार है या चलानेवाले लड़के की पीठ पर. चचा और मुन्ना एक दूसरे को देखते हैं. दोनों इस बात से झेंपे हुए हैं कि बरसों से चल रहा उनका ‘संस्कृति रक्षा अभियान’ बेअसर रहा.

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