सीखिए सरदार पटेल के गुण भी!

By Prabhat Khabar Digital Desk
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।। हरिवंश।।
सरदार पटेल इन दिनों सुर्खियों में हैं. भारत के बड़े नेताओं ने बहुत पहले उनके बारे में अपने विचार बदल लिये थे. अब सौजन्य, कांग्रेस (अगर कांग्रेस ने उन्हें भुलाने की रणनीति न अपनायी होती, तो नरेंद्र मोदी को, सरदार पटेल को जनता के बीच उतारने का मौका नहीं मिला होता), सरदार फिर लोकचर्चा में हैं. कांग्रेस जरा सचेत होती, तो वह पूछती कि मोदी जी, सरदार पटेल के जन्मस्थान कर्मसध (मध्य गुजरात) में सरदार के पैतृक घर का रखरखाव कैसा है? चूंकि यह महापाप कांग्रेस ने भी किया है, इसलिए वह नरेंद्र मोदी से यह सवाल नहीं पूछ सकती. आज भी सरदार साहब (सम्मान के लिए ‘साहब’ शब्द जोड़ा है) के गांव का घर, उसके रखरखाव, उनके व्यक्तित्व के अनुरूप उनके पैतृक घर को स्मारक बनाने का काम होना बाकी है. नरेंद्र मोदी ने दस वर्षो में यह काम नहीं किया, तो कांग्रेस ने 55 वर्षो में यह नहीं होने दिया. आरटीआइ से उपलब्ध सूचना के अनुसार (टीवी पर एक बहस के दौरान सुना) देश की मेगा केंद्रीय योजनाओं में से 16 राजीव गांधी के नाम चल रही हैं. छह, इंदिरा गांधी के नाम और तीन जवाहर लाल नेहरू के नाम हैं. एक सरदार पटेल के नाम बतायी जा रही है, पर वह कौन-सी योजना है, सामान्य लोगों को नहीं मालूम.

नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया कि सरदार पटेल को जानबूझ कर भुलाया गया. केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने तुरंत उत्तर दिया. यूपीए सरकार के कार्यकाल में पटेल की जयंती पर 8.5 करोड़ खर्च किये गये हैं. पिछले चार सालों में. उन्होंने आरोप लगाया कि एनडीए के कार्यकाल में सिर्फ 68 लाख इस मद में खर्च किये गये थे. यह भी सूचना दी गयी कि एनडीए राज में 2001-02 के बीच पटेल के ऊपर सरकार द्वारा कोई विज्ञापन ही जारी नहीं किया गया. यूपीए ने 2008 में पटेल के ऊपर कोई विज्ञापन जारी नहीं किया. सरकारी सूचना के अनुसार ही डीएवीपी ने महात्मा गांधी की जयंती और पुण्यतिथि के लिए 33 करोड़, राजीव गांधी के लिए 21 करोड़, इंदिरा गांधी के लिए 14.5 करोड़ और पंडित नेहरू के लिए 9.5 करोड़ रुपये प्रिंट विज्ञापनों पर खर्च किये. यूपीए शासन में. अब कांग्रेस को मोदी के हर बात का स्पष्टीकरण देना क्यों जरूरी हो गया है? अब नयी बहस शुरू हो गयी है कि नेहरू परिवार के प्रचार पर कुल कितना खर्च हुआ? (21+14.5+9.35 = 44.88) यानी लगभग 45 करोड़? पटेल को अपना बताने के नये दौर में अब गुजरात सरकार और केंद्र सरकार में उनके जन्मदिन पर विज्ञापन देने और श्रेय लेने की होड़ है.

पर सरदार पटेल से श्रेय लेनेवाले क्या सीखें या देश को उनसे क्या सीखना चाहिए या भारतीय युवा कैसे पटेल को जानें, इसकी कोशिश कहीं नहीं है? भारत की आजादी की लड़ाई में उनका योगदान और आजाद होने पर भारत को संघ का एकरूप देने का श्रेय, सरदार पटेल को है. पहले 1934 से 1950 के बीच उनकी आलोचना हुई, प्रगति विरोधी के रूप में. सामाजिक बदलाव के विरोधी के रूप में. यानी यह उनके वैचारिक विरोध का दौर था. इन बड़े आलोचकों ने भी बाद में सरदार के विचारों को सही माना. यह भी याद रखिए आजादी की लड़ाई में उनकी ईमानदारी और चरित्र ने एक नया प्रतिमान और उत्कर्ष स्थापित किया, जिसके आगे-पीछे दूर-दूर तक कोई नहीं रहा. आजादी की लड़ाई के बड़े नेता भी. उनके विरोधी भी तब यह मानते थे. पर 1950 के बाद सभी बड़े आलोचक नेताओं ने, यानी आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, मीनू मसानी वगैरह सब ने अपनी राय बदली. खुद मधु लिमये ने एक लंबा लेख लिखा, जिसका शीर्षक है, वल्लभ भाई पटेल : फ्रीडम सरदार (सरदार वल्लभ भाई पटेल : आजादी के सरदार). याद है, छात्र था. 1974-75 की बात है. भारतीय विद्याभवन द्वारा प्रकाशित भवन्स जर्नल, अंगरेजी पत्रिका खरीदी. दशकों तक वह अंक कहीं रखा था. उसमें जयप्रकाश नारायण का लंबा लेख था कि सरदार पटेल को तब प्रतिक्रियावादी मानने की बड़ी भूल हमने कैसे की. वह पूरा लेख प्रायश्चित था. जयप्रकाश ने लिखा - ‘फौलादी सांचे में ढले भारतीय लौहपुरुष सरदार पटेल के मन की एक प्रबल लालसा यह भी थी कि उनके मरने के बाद लोग यह कहें .. वह बोलता था, तो कुछ कड़ी बातें भी कहता था, लेकिन आदमी ठीक था. सरदार की यह लालसा उस दिन पूरी हुई जब उनकी मृत्यु के पच्चीसों वर्ष बाद, उनके सबसे बड़े आलोचक जयप्रकाश नारायण ने यह स्वीकारा. ‘सरदार को हमने गलत समझा. मेरे अंदर आज प्रधान भावना आत्म-भर्त्सना की है क्योंकि उनके जीवन-काल में मैं महान सरदार का केवल एक आलोचक ही नहीं बल्कि एक प्रतिपक्षी भी रहा. ‘ (साभार - राजनीति मेरी प्रेयसी, लेखक - अरुण भोले)

दरसअल, समाजवादियों और सरदार पटेल में फर्क क्या थे? सरदार पटेल, व्यवहारवादी थे. वह दिवास्वप्न नहीं देखते थे. एक बार उन्होंने समाजवादी नेताओं को कहा कि पूरे देश में कोई एक प्रांत आप ले लो और उसे अपने ढंग से चला कर दिखाओ कि कैसे वह राज्य सर्वश्रेष्ठ हो सकता है? फिर मैं अपना विचार छोड़ कर आपका अनुयायी हो जाऊंगा. फिर वही मॉडल देश के अन्य राज्य फालो (अनुकरण) करेंगे. तब समाजवादी अपने को उगता सूरज मानते थे. वे पूरे भारत पर राज करने का ख्वाब पाल रहे थे. उन्हें लगा यह प्रस्ताव हमारी तौहीन है, जबकि सरदार पटेल ने सच्चे मन से यह कहा था.

तोड़फोड़-विध्वंस-विरोध, हर बात पर संघर्ष की राजनीति से आजादी के बाद मुल्क नहीं बनेगा? सृजन के लिए श्रम, धैर्य, ईमानदारी चाहिए. संकल्प भी. यह सब से पहले सरदार समझ गये थे. दरअसल समाजवादियों व उनमें बुनियादी मतभेद थे. सरदार समाजवादियों के यूटोपियन विचारों से सहमत नहीं थे. देश की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए वे भी व्यग्र थे. मगर फिलहाल सारे उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, उनकी समझ में, इसका कारगर उपाय नहीं था. सोशलिस्टों की राष्ट्रीयकरण तजवीज से वे चौंक पड़ते थे, क्योंकि वे मानते थे कि अनुभव एक बड़ी चीज है और राष्ट्रीयकरण जैसे बड़े काम को शुरू करने और संभालने के लिए मुल्क में, और बातों के अलावा, अनुभवी लोग भी बहुत ही कम हैं. उन्होंने कहा - .. वह सब केवल सिद्धांत की बात है, अनुभव की नहीं. अभी तक हमने कुछ काम तो किया नहीं है, और जो कहते हैं (सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट लोग) उन्होंने तो कुछ भी नहीं किया है. वह कब कर पायेंगे, पर यह तो ईश्वर जाने. अगर आज मैं राष्ट्रीयकरण के बोझ को उठा सकूं, तो एक मिनट की भी देर नहीं करूंगा .. ‘ लेकिन सोशलिस्टों को लगा, सरकार की नीयत साफ नहीं. उनके हड़ताल और राष्ट्रीयकरण विरोधी रुख के कारण सोशलिस्टों ने उनके विरुद्ध जो कुप्रचार चलाया, उससे सरदार भन्ना उठे थे. उन्होंने जनसभाओं में कहा, .. आप कहते हैं कि मजदूरों को पैसा मिले, उनकी जितनी जरूरतें हैं, वे पूरी करनी चाहिए. तो इस काम में मेरा आपको पूरा साथ मिलेगा. मजदूरों को जो इंसाफ से मिलना चाहिए, वह उन्हें जरूर मिलना चाहिए. (मगर) हिंदुस्तान को तो अभी आजादी मिली है. हम दो-चार साल हिंदुस्तान में इंडस्ट्री बना लें, कुछ उद्योग पैदा करें. तभी तो मजदूरों के लिए कुछ धन पैदा हो सकेगा और उन्हें हिस्सा मिल सकेगा. जहां होगा, वहीं से तो कुछ दिया जा सकेगा. कोई चीज होगी ही नहीं, तो क्या बांटोगे? तो कुछ पैदा करो .. अगर मुझे समझ आ जाये कि हमारे मुल्क में एक-एक कैपिटलिस्ट की कैपिटल को खत्म कर देने से हिंदुस्तान का भला होगा, तो उसे खत्म कर देने में मेरा नंबर पहला होगा.

याद रखिए, सरदार के इसी रास्ते पर चीन 1978 में चलना शुरू किया और आज वह दुनिया की महाशक्ति है. सरदार यही नहीं रुके. उन्होने अपने आलोचक समाजवादियों-कम्युनिस्टों से कहा, ‘ मुझे सोशलिज्म सिखाने की किसी को जरूरत नहीं .. जब से मैंने गांधी जी का साथ दिया, और आज इस बात को बहुत साल हो गये, तभी से मैंने फैसला किया था कि यदि पब्लिक लाइफ में काम करना हो, तो अपनी मिल्कियत नहीं रखनी चाहिए. तब से आज तक मैंने अपनी कोई चीज नहीं रखी. न मेरा कोई बैंक एकाउंट है, न मेरे पास कोई जमीन है और न मेरे पास अपना कोई मकान है .. मुङो कोई सोशलिज्म का पाठ सिखाए, तो फिर उसे सीखना पड़ेगा कि पब्लिक लाइफ किस तरह से चलानी है.. जितने लोग सोशलिस्ट का लेबल लगाते हैं, वे सब सोशलिस्ट हैं, ऐसा न मानिए.. मैं सोशलिस्ट का लेबल नहीं लगाता, लेकिन मैं अपनी कोई प्रोपर्टी नहीं रखता .. उससे भी आगे जाना पड़े, तो मुकाबला करने को तैयार हूं : लेकिन हिंदुस्तान की बरबादी होने के काम में कभी साथ नहीं दूंगा. उसमें आप कहें कि मैं कैपिटलिस्टों का एजेंट हूं, जो चाहे सो नाम लगाइए ..’

(साभार - राजनीति मेरी प्रेयसी, लेखक - अरुण भोले)

इतने साहसी और दूरदर्शी थे, सरदार.

आजादी के बाद से ही देश में एक अजीब प्रवृति रही. सरदार पटेल के व्यक्तित्व या योगदान का उल्लेख जानबूझ कर कांग्रेस नहीं होने देती थी. उन्हें लगता था कि इससे नेहरू परिवार की महिमा घटेगी. ऐसा काम नेहरू परिवार द्वारा नहीं, चापलूस कांग्रेसियों द्वारा किया गया होगा. यह छोटी सोच थी. पंडित नेहरू अपने ढंग के अनूठे, बड़े और महान नेता थे. वह स्वप्नदर्शी थे. आधुनिक थे. उन्होंने देश के लिए बड़ा सपना देखा. अपना जीवन लगा दिया. इंदिरा जी और राजीव गांधी के भी अपने-अपने योगदान हैं. यह सब तथ्य हैं. पर सरदार पटेल की कुरबानी और त्याग कई क्षेत्रों में सबसे आगे थे. इन दोनों ने कैसे साथ रह कर काम किया, आज के भारत को यह याद करने व उनसे सीखने की जरूरत है. इस संदर्भ में अरुण भोले द्वारा लिखित पुस्तक, राजनीति मेरी प्रेयसी में एक सुंदर प्रसंग है - ‘भारत के प्रधानमंत्री तो पंडित जी थे, लेकिन सरदार वल्लभ भाई पटेल जब तक जीवित रहे, घर के असल मालिक-मुख्तार वे ही थे. एक तौर पर पार्टी और सरकार, दोनों ही के गार्डियन. यद्यपि, वे अपना नेता, पंडित जी को ही मानते थे, और कहते थे - ‘यदि मैं अपने लीडर का साथ न दे सकूं और उनके पैर मजबूत न कर सकूं, तो मैं एक मिनट भी गवर्मेट में नहीं रहूंगा .. इस तरह की बेवफाई मेरे चरित्र में नहीं.’ लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति इसी से स्पष्ट हो जाती थी कि प्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो को खुद पंडित जी ने ही कहा - .. मैं जानता हूं कि मैं इशारा कर दूं, तो सरदार मंत्रिमंडल छोड़ देंगे, और वे भी जानते हैं कि उनका इशारा पाते ही मैं मंत्रिमंडल से निकल आऊंगा.’

यह इन दोनों महान नेताओं की विरासत है, जिससे आज की भारतीय राजनीति को सीखना चाहिए. आज हमारे नेता कैसे हैं? विरोधियों की बात छोड़ दें, उन्हें तो वे दुश्मन मानते ही हैं. अपने दल में भी भिन्न या अलग विचार रखनेवाले नेताओं को कोई सहने को आज तैयार नहीं. पटेल की प्रासंगिकता आज इस संदर्भ में है. दरअसल, सरदार पटेल के व्यक्तित्व के अचर्चित पहलुओं को समझना जरूरी है. खासतौर से युवा पीढ़ी को. सरदार पटेल हमेशा पीछे रहकर काम करते रहे. श्रेय लेने की लड़ाई में वह नहीं कूदे. यश, प्रसिद्धि और व्यक्तित्व पूजा की भूख से वह बिल्कुल दूर रहे. आजादी की लड़ाई में दशकों तक एक मौन साधक की तरह तप-त्याग किया. आहुति दी. गांधी युग के भी अनेक बड़े नेताओं में यह रोग या संस्कृति थी, पर सरदार पटेल इन सब चीजों से निस्पृह थे. इतिहास जाननेवाले अनेक लोग कहते हैं कि स्वाधीनता की घड़ी में महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस अध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद पर बैठा कर अच्छा नहीं किया.

बारी सरदार पटेल की थी. 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस समितियां सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में थी. वरीयता की दृष्टि से भी पटेल आगे थे. भारत के प्रधानमंत्री बनने का सरदार पटेल के जीवन में वह पहला और अंतिम मौका था. इतिहासकार कहते हैं कि सरदार पटेल के सर से तख्त और ताज उतार कर गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को पहना दिया. पर सरदार की महानता देखिए. सरदार ने एक शब्द भी नहीं बोला. कुछ नहीं कहा. गांधीजी को दिया वचन माना. क्योंकि सरदार पटेल जानते थे कि वह अलग हुए तो कांग्रेस पार्टी टूट जायेगी और मुल्क टूट जायेगा. तब सरदार पटेल ने मिलने आनेवाले कांग्रेसी नेताओं से कहा - ‘वही करें जो जवाहरलाल कहते हैं’ और ‘इस विवाद पर ध्यान न दें’. दो अक्तूबर को इंदौर में एक महिला केंद्र का उदघाटन करते हुए पटेल ने इस अवसर का उपयोग प्रधानमंत्री के प्रति अपनी विश्वास के प्रदर्शन में किया. उन्होंने अपने भाषण में कहा कि ‘वे महात्मा गांधी के बहुत सारे अहिंसक शिष्यों में से महज एक हैं.’ पटेल ने आगे कहा कि ‘अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं. बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था, और इसकी घोषणा भी की थी. अब यह बापू के सभी सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैर-वफादार सिपाही नहीं हूं.’ (साभार - भारत: गांधी के बाद, लेखक - रामचंद्र गुहा). यह उदारता या बड़प्पन, यह जीवन दृष्टि आज किसी नेता में दिखता है? महज पटेल की चर्चा या मूर्ति बना देने से मुल्क का भला नहीं होगा. पटेल के तप, त्याग, आदर्श और योगी का स्वभाव, भारतीय राजनीति में कहीं जगह पा सके, इसके लिए नेता कोशिश करें, तो मुल्क का भला होगा.

इसी पुस्तक, भारत: गांधी के बाद में लिखा है कि ‘ ऐसे सबूत हैं जो पटेल के जीवनीकार राजमोहन गांधी से हमें उपलब्ध हुए हैं. दरअसल, ये तथ्य नेहरू के जीवनीकार सर्वपल्ली गोपाल की उसी बात की तस्दीक करते हैं, जो उन्होंने भावुक होकर व्यक्त की थी. उन्होंने कहा कि ‘पटेल के महान आत्मसंयम और शराफत ने दोनों के बीच होनेवाली खुली लड़ाई को रोक दिया. पटेल को गांधी से किया हुआ अपना वह वादा याद था जिसमें नेहरू के साथ मिल कर काम करने की बात कही थी. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उन्होंने 14 नवंबर को नेहरू के जन्मदिन पर उन्हें बधाई-पत्र लिखा था. एक सप्ताह बाद जब प्रधानमंत्री उनसे मिलने उनके घर आये तो पटेल ने कहा कि ‘जब मेरा स्वास्थ्य थोड़ा ठीक हो जायेगा, तो मैं आपसे अकेले में बात करना चाहता हूं. मुङो ऐसा लग रहा है कि आप मुझमें अपना विश्वास खोते जा रहे हैं.’ इसके जवाब में नेहरू ने कहा कि ‘मुङो लगता है कि मैं अपने आप में यकीन खोता जा रहा हूं. इसके तीन सप्ताह बात पटेल की मृत्यु हो गयी.’

पटेल का चरित्र इससे समझिए. आज देश के राजनेता यह समझते तो मुल्क का भला होता कि मतभेद के बावजूद नेहरू -पटेल कैसे एक-दूसरे के साथ रहे. ऐतिहासिक काम किया. दोनों राष्ट्र निर्माता रहे (नेशन बिल्डर). विरोध के बावजूद एक लूज टाक नहीं. आज के मामूली राजनेताओं के दंभ-अहंकार देखिए. योगदान शून्य, पर खुद को इतिहास पुरुष घोषित करनेवाले. आधुनिक भारत को जिस अकेले इंसान ने एक रूप दिया हो, उस व्यक्ति के अंदर क्या विनम्रता थी. उनका क्या योगदान था? यह भी रामचंद्र गुहा के ही शब्दों में पढ़िए- ‘महज दो सालों में 500 से ज्यादा स्वायत्त और कई प्राचीन रियासतें इतिहास के पन्नों में समा गयीं और आजाद हिंदुस्तान की चौदह नयी प्रशासनिक इकाइयों का हिस्सा बन गयीं. किसी भी मापदंड पर देखा जाये, तो यह एक आश्चर्यजनक उपलब्धि थी. यह उपलब्धि किसी लड़ाई से हासिल नहीं हुई थी, बल्कि बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और कड़ी मेहनत का नतीजा थी. ‘

कितनी कठिनाई थी और माउंटबेटन की क्या शर्ते थी, यह भी जानने लायक हैं - ‘जब वल्लभभाई पटेल ने पहली बार माउंटबेटन के साथ रियासतों की समस्या पर बातचीत की तो उन्होंने वायसराय से आजादी मिलने के दिन तक सेब से भरी हुई एक पूरी टोकरी को एक साथ लाने को कहा था. वायसराय ने उनसे पूछा कि क्या 565 सेबों के थैले में से 560 पर संतुष्ट हो जायेंगे? कांग्रेस के उस ‘कद्दावर नेता’ ने इस पर अपनी सहमति जतायी. जैसे-जैसे दिन बीतता गया, 15 अगस्त से पहले उन सारी रियासतों में से सिर्फ तीन ने समस्या पैदा की और 15 अगस्त के बाद भी समस्या खड़ी करनेवाली रियासतों की तादाद तीन ही थी.’

सरदार पटेल ने उस देश को एक किया, जिसके बारे में एक अनुभवी अंग्रेज अधिकारी ने तब लिखा था - ‘उस मसीहा ने भविष्यवाणी की कि ब्रिटिश भारत की जगह इस मुल्क की आखिरी नियति तीन या चार देशों में बंट जाने की लगती है, जिसमें दक्षिण भारतीय राज्यों का एक संघ होगा. ऐसा होने से लगभग वही स्थिति हो जायेगी जो 16वीं सदी के भारत की थी..’ (साभार - भारत: गांधी के बाद, लेखक - रामचंद्र गुहा)

रामचंद्र गुहा मानते हैं कि खासतौर पर नेहरू भी रजवाड़ों के विलय को इतने धैर्य और दूरदर्शिता के साथ अंजाम नहीं दे पाते. 554 रियासतों को एक हजार वर्ष बाद एकसूत्र में बांधनेवाले भी थे, सरदार पटेल. आज उनके योगदान के अनुरूप देश में उनका स्मरण कहा हैं? याद रखिए, कभी सरदार ने अपनी उपलब्धि का दावा नहीं किया. सरदार पटेल न होते, तो यह देश एक न होता और हम आज इस अमूर्त या मूर्त भारत की अवधारणा से न बंधे होते. जिन सरदार साहब ने हमें एक देश दिया. एक पहचान दी, वे कितने दूरदर्शी थे, यह भी जान लें. पंडित नेहरू को जीवन के अंत में जो पत्र सरदार पटेल ने लिखा, वह भी रामचंद्र गुहा की पुस्तक, भारत: गांधी के बाद में है. इसमें लिखा है, वल्लभाई पटेल हालांकि इस बात के प्रति आश्वस्त थे कि चीनियों ने पाणिकर को झांसे में रखा है. चीनियों ने पाणिकर को गलत तरीके से विश्वास में लिया था, जिससे भारतीय राजदूत पाणिकर ने चीनी हमले की योजनाओं के बारे में तमाम बातों को नजरंदाज कर दिया. लेकिन चूंकि अब तिब्बत पर हमला हो चुका था, इसलिए भारत के लिए सतर्क रहना जरूरी था. 7 नवंबर को नेहरू को पत्र लिखते हुए पटेल ने कहा था कि ‘चीन अब विभाजित नहीं है, बल्कि एकीकृत और मजबूत हो गया है.’ पटेल ने आगे लिखा है कि - ‘हाल का कटु इतिहास हमें बताता है कि साम्राज्यवाद के खिलाफ साम्यवाद कोई ढाल नहीं है. कम्युनिस्ट भी उतने ही अच्छे या बुरे साम्राज्यवादी हो सकते हैं, जितनी कोई और व्यवस्था. इस हिसाब से चीनियों की महत्वाकांक्षा सिर्फ हमारे हिमालय की ढलानों तक ही नहीं, बल्कि असम के महत्वपूर्ण हिस्सों तक पर है. .. चीन का उसके पड़ोसी देशों पर ऐतिहासिक दावा और कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद पश्चिमी शक्तियों के विस्तारवादी साम्राज्यवाद से बिल्कुल अलग है. चीन के इस दावे में विचारधारा का पुट मिला हुआ है, जो इसे पश्चिमी साम्राज्यवाद से दसियों गुणा ज्यादा खतरनाक बनाता है. इसके वैचारिक विस्तारवाद के रूप में उसका नस्लीय, राष्ट्रीय और ऐतिहासिक विस्तारवाद का दावा छुपा हुआ है.’

याद रखिए, आज जिस हाल में देश है, चीन का जो बरताव-व्यवहार है, उसके बारे में अपनी मृत्युशय्या से सरदार ने पंडित नेहरू को आगाह किया था. 60-62 वर्ष पहले. आज किसी नेता में वह दम, दृष्टि और चरित्र है? आज इस मौके पर हम उनके चरित्र कि इस पहलू से सीखें, तो उनकी स्मृति के प्रति न्याय होगा.

सरदार पटेल के निजी जीवन, संघर्ष के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. किन विपरीत परिस्थितियों में वह जन्में? कैसे वह पले-बढ़े? दूसरों के लिए क्या कुरबानी दी? अपने काम, धुन और संकल्प के वह कैसे पक्के थे? ईमानदारी में उनका क्या प्रतिमान था? अपने पुत्र से कैसे और क्यों आजीवन वह दूर रहे? उनकी पत्नी की मरने की सूचना मिली, तो उनका कैसा धैर्य था? उनका जन्मदिन पता नहीं है. दरअसल, 31 अक्तूबर उनका सर्टीफिकेट में दर्ज जन्मदिन है. उनका जीवन संघर्ष से भरपूर और और चरित्र अद्भुत है. महान स्वतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी की पुस्तक में सरदार पटेल पर बहुत सुंदर लेख है. हर भारतीय के पढ़ने योग्य. पढ़िए पुस्तक का एक छोटा अंश -

सादा जीवन

एक बार मणिबेन कुछ दवाई पिला रही थी. मेरे आने-जाने पर तो कोई रोक-टोक थी नहीं, मैंने कमरे में दाखिल होते ही देखा कि मणिबेन की साड़ी में एक बहुत बड़ी थेगली (पैवंद) लगी है. मैंने जोर से कहा, ‘मणिबेन, तुम तो अपने आप को बहुत बड़ा आदमी मानती हो. तुम एक ऐसे बाप की बेटी हो कि जिसने साल-भर में इतना बड़ा चक्रवर्ती अखंड राज्य स्थापित कर दिया है कि जितना न रामचंद्र का था, न कृष्ण का, न अशोक का था, न अकबर का और अंगरेज का. ऐसे बड़े राजों-महाराजों के सरदार की बेटी होकर तुम्हें शर्म नहीं आती? बहुत मुंह बना कर और बिगड़ कर मणि ने कहा, ‘शर्म आये उनको, जो झूठ बोलते और बेईमानी करते हैं, हमको क्यों शर्म आये?’ मैंने कहा, ‘हमारे देहरादून शहर में निकल जाओ, तो लोग तुम्हारे हाथ में दो पैसे या इकन्नी रख देंगे, यह समझ कर कि यह एक भिखारिन जा रही है. तुम्हें शर्म नहीं आती कि थेगली लगी धोती पहनती हो!’ मैं तो हंसी कर रहा था. सरदार भी खूब हंसे और कहा, ‘बाजार में तो बहुत लोग फिरते हैं. एक-एक आना करके भी शाम तक बहुत रुपया इकट्ठा कर लेगी. पर मैं तो शर्म से डूब मरा जब सुशीला नायर ने कहा, ‘त्यागी जी, किससे बात कर रहे हो? मणिबेन दिन-भर सरदार साहब की खड़ी सेवा करती है. फिर डायरी लिखती है और फिर नियम से चरखा कातती है. जो सूत बनता है, उसी से सरदार के कुर्ते-धोती बनते हैं. आपकी तरह सरदार साहब कपड़ा खद्दर भंडार से थोड़े ही खरीदते हैं. जब सरदार साहब के धोती-कुर्ते फट जाते हैं, तब उन्हीं को काट-सीकर मणिबेन अपनी साड़ी-कुर्ती बनाती हैं.’

‘मैं उस देवी के सामने अवाक खड़ा रह गया. कितनी पवित्र आत्मा है, मणिबेन. उनके पैर छूने से हम जैसे पापी पवित्र हो सकते हैं. फिर सरदार बोल उठे, ‘गरीब आदमी की लड़की है, अच्छे कपड़े कहां से लाये? उसका बाप कुछ कमाता थोड़े ही है.’ सरदार ने अपने चश्मे का केस दिखाया. शायद बीस बरस पुराना था. इसी तरह तीसियों बरस पुरानी घड़ी और कमानी का चश्मा देखा, जिसके दूसरी ओर धागा बंधा था. कैसी पवित्र आत्मा थी! कैसा नेता था! उसकी त्याग-तपस्या की कमाई खा रहे हैं, हम सब नयी-नयी घड़ियां बांधनेवाला देशभक्त!’

आज की राजनीति में हम इन अभूतपूर्व सात्विक व ईमानदार गुणों से संपन्न सरदार पटेल को याद करें. महज रस्म के तौर पर नहीं. उनके गुणों को जीवन में उतारें, तो देश का भला होगा.

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