मनमोहन सिंह का मिशन मालदीव

Published at :23 Oct 2013 2:58 AM (IST)
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मनमोहन सिंह का मिशन मालदीव

।।पुष्परंजन।।(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक) सिर्फ साढ़े तीन लाख की आबादी के आगे भारतीय कूटनीति के बड़े-बड़े दिग्गज बेबस हों, इतिहास के लिए इससे बढ़िया उदाहरण कहां मिलेगा? जी बिल्कुल! बात हम मालदीव की ही कर रहे हैं. भारत से 330 नॉटिकल मील दूर मालदीव की आबादी, अपने यहां के छोटे से कस्बे, या […]

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।।पुष्परंजन।।
(ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक)

सिर्फ साढ़े तीन लाख की आबादी के आगे भारतीय कूटनीति के बड़े-बड़े दिग्गज बेबस हों, इतिहास के लिए इससे बढ़िया उदाहरण कहां मिलेगा? जी बिल्कुल! बात हम मालदीव की ही कर रहे हैं. भारत से 330 नॉटिकल मील दूर मालदीव की आबादी, अपने यहां के छोटे से कस्बे, या दिल्ली के किसी मोहल्ले के बराबर है. पच्चीस साल पहले, इस देश में श्रीलंका से आये अस्सी तमिल अतिवादियों ने तत्कालीन राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल गयूम की सत्ता पलटने का प्रयास किया था, जिसे भारत सरकार ने विफल कर दिया था. उस समय भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे, उनके आदेश से मात्र 16 सौ भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी ने ‘ऑपरेशन कैक्टस’ को अंजाम दिया था. भारतीय कूटनीति का वह एक सफल मॉडल था, जिसकी सराहना, उस समय सोवियत संघ, अमेरिका, ब्रिटेन, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों ने की थी. ढाई दशक बाद उन्हीं राजीव गांधी की विदेश नीति को आगे बढ़ाने वाले मनमोहन सिंह मूकदर्शक होकर मालदीव की ओर देख रहे हैं. क्या मालदीव, ‘मनमोहनी कूटनीति’ का विफल मॉडल है?

11 नवंबर से पहले मालदीव में नये राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना चाहिए. राष्ट्रपति वहीद कह चुके हैं कि 10 नवंबर के बाद एक दिन के लिए भी कुर्सी संभालना मेरे लिए संभव नहीं है. चुनाव आयोग ने मतदान की तारीख नौ नवंबर निर्धारित की है. चुनाव आयोग के अध्यक्ष फुवाद तौफीक ने बयान दिया कि किसी वजह से पहले दौर में मतदान का परिणाम स्पष्ट नहीं होता है, तो दूसरा और अंतिम दौर 16 नवंबर को संपन्न होगा. 19 माह पहले राष्ट्रपति की गद्दी से उतार दिये गये मोहम्मद नाशीद एक बार फिर से कुर्सी पाने की कोशिश में लगे हुए हैं. मोहम्मद नाशीद 2008 में मालदीव में पहली बार संपन्न बहुदलीय चुनाव जीत कर आये थे. तीन दशकों तक लगातार राष्ट्रपति रहे मॉमून अब्दुल गयूम से मालदीव की जनता मुक्ति चाहती थी. 2007 में मतसंग्रह हुआ, और तय हुआ कि दो दौर के प्रत्यक्ष मतदान द्वारा मालदीव में राष्ट्रपति चुनाव हो. 2008 में चुनाव हुआ और ‘मालदीव का मंडेला’ नाम से मशहूर मोहम्मद नाशीद पांच वर्षो के लिए राष्ट्रपति चुन लिये गये. मॉमून अब्दुल गयूम के हुजरे से राजनीति बाहर हुई, तो भारत उनका दुश्मन नंबर वन हो गया. राष्ट्रपति नाशीद ने सत्ता में आने के बाद कुछ ऐसे कदम उठाये, जो देश के पर्यटन उद्योग को मुट्ठी में करनेवाले माफिया को रास नहीं आ रहा था. मालदीव के छोटे-छोटे द्वीपों पर केबिन बना कर एक रात के लिए हजारों डॉलर वसूलनेवाले टूरिस्ट माफिया तब सिर पकड़ कर बैठ गये, जब नाशीद ने बजटवाले केबिन और सस्ते गेस्टहाउस की सुविधाएं देने का ऐलान किया. डॉलर बटोरनेवाले पर्यटन माफिया के विरुद्ध ‘विशेष कर वसूली अभियान’ चलाया गया. नाशीद को निपटाने के वास्ते सत्ता के गलियारे में षड्यंत्र शुरू हो गया. राष्ट्रपति पद पर रहते हुए 2010 में नाशीद की पहली भिड़ंत वहां की भ्रष्ट न्यायपालिका से हुई. यह सिलसिला थमा नहीं, इसके पीछे पूर्व राष्ट्रपति गयूम थे. नाशीद पर आरोप लगा कि उन्होंने 16 जनवरी, 2012 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए क्रिमिनल कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद को 22 दिनों तक एक सैनिक कैंप में हिरासत में रखा था. जज को ‘बंधक’ रखने से हुए बवाल पर सात फरवरी, 2012 को नाशीद ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया था. दरअसल, राष्ट्रपति नाशीद पर पुलिसिया और सेना का दबाव बना कर इस्तीफा लिया गया था. यह एक अनोखे किस्म का सत्तापलट था, जिसका पता दुनिया को तब चला, जब नाशीद का सत्ताहरण हो चुका था. अब यह कुर्सी उनके डेपुटी, उपराष्ट्रपति वहीद को मिल चुकी थी. फिर तो वहीद ने अपने रंग दिखाने शुरू किये, पूर्व राष्ट्रपति गयूम की बेटी दुनिया मॉमून, मंत्री बन गयीं, और उनके परिवार के लोग लाभ वाले पदों पर फिर से आसीन हो गये. भूतपूर्व हो चुके राष्ट्रपति नाशीद के खिलाफ ट्रायल कोर्ट के नाम पर एक ‘कंगारू कोर्ट’ का गठन किया गया. गिरफ्तारी से बचने के लिए नाशीद को माले के भारतीय दूतावास में शरण लेनी पड़ी. इस हाइ वोल्टेज ड्रामा के पीछे मकसद नाशीद को चुनाव लड़ने से वंचित करना था. इस साजिश का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध हुआ. मालदीव को कॉमनवेल्थ की सदस्यता से सस्पेंड कर दिया गया. कुछ महीनों बाद कॉमनवेल्थ समर्थित न्यायिक आयोग की अस्सी पेज की रिपोर्ट आयी. इसमें निष्कर्ष था कि अपराध न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला मोहम्मद अपने बेतुके निर्णय देने के लिए बदनाम हो चुके थे, गयूम के एक भ्रष्ट सांसद को बचाने के कारण उनके साथ जो सुलूक हुआ, सही था. इस रिपोर्ट से मालदीव में भ्रष्ट अदालत, सरकार और सुरक्षा तंत्र के गठजोड़ का असली चेहरा सामने आया, और अंतत: चुनाव की प्रक्रिया आरंभ हुई.

2008 में चुनी गयी सरकार की अवधि 10 नवंबर, 2013 को समाप्त हो रही है. मगर, मतदान में बार-बार अड़चन का एक ही मकसद है कि सरकार की बदनाम गली में बाधा न हो, और राष्ट्रपति वहीद जैसा कमजोर वजीर सियासत की बिसात पर बना रहे. सात सितंबर को पहले दौर के मतदान में दो लाख 40 हजार वोटरों में से, दो लाख 11 हजार लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया. कुर्सी से जबरन हटाये गये पूर्व राष्ट्रपति नाशीद को जनता ने 45.45 प्रतिशत वोट दिया था. पूर्व तानाशाह मॉमून गयूम के सौतेले भाई यामीन गयूम 25 फीसदी मतों के साथ दूसरे नंबर पर थे, तीसरे नंबर पर गयूम के जमाने के वित्त मंत्री और रिसॉर्ट-होटल कारोबारी गासिम इब्राहिम को 24 प्रतिशत मत मिले थे. सबसे बड़े ‘लूजर’ राष्ट्रपति वहीद साबित हुए, जिन्हें मालदीव की जनता ने मात्र पांच प्रतिशत वोट दिया था.

मालदीव की न्यायपालिका और पुलिस ने जिस बेशर्मी के साथ मतदान को फर्जी कहा है, और 19 अक्तूबर को दूसरे दौर के मतदान में बाधा पैदा की है, उससे पूरी दुनिया हैरान है. जनता इसके खिलाफ सड़कों, चौक-चौराहों पर बैठ गयी है. इससे यह साबित होता है कि मालदीव में तानाशाही अभी मरी नहीं है और गयूम अब भी गोटी खेल रहे हैं. वहां की पुलिस, मतदान पेटियों को ले जाने से चुनाव आयोग को रोके, इससे ज्यादा बेशर्मी और क्या हो सकती है? सबकी नजर अब नौ नवंबर वाले मतदान पर रहेगी. पिछले हफ्ते भारत की विदेश सचिव सुजाता सिंह मालदीव में थीं. इनसे पहले के विदेश सचिव लगभग इसी तरह पत्ता खड़कने पर मालदीव पहुंच जाया करते थे. मालदीव एक संप्रभुता संपन्न देश है, और भारत को कूटनीतिक लक्ष्मणरेखा में रह कर ही वहां पर लोकतंत्र लाने के प्रयास में मदद करनी चाहिए!

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