आयुर्वेद की प्रगति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Aug 2015 7:05 AM (IST)
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केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तर्ज पर दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान खोलने की घोषणा की है. इसे अगले वर्ष तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है. देश के हर राज्य में ऐसे संस्थान बनाने का संकल्प भी सरकार ने लिया है. आयुर्वेद भारतीय ज्ञान-विज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण […]
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केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तर्ज पर दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान खोलने की घोषणा की है. इसे अगले वर्ष तक चालू करने का लक्ष्य रखा गया है.
देश के हर राज्य में ऐसे संस्थान बनाने का संकल्प भी सरकार ने लिया है. आयुर्वेद भारतीय ज्ञान-विज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में इसके प्रसार के प्रयास सराहनीय हैं. पिछले एक वर्ष से विभिन्न अस्पतालों में इस चिकित्सा पद्धति के विभाग खोलने के प्रयास के साथ चिकित्सकों की बहाली भी हुई है.
अभी देश में करीब एक लाख आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं. प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर और जनसुलभ बनाने में सरकार इनके सहयोग की आकांक्षी भी है. योग और प्राकृतिक चिकित्सा पद्वति के साथ आयुर्वेद हमारी लचर और अपर्याप्त स्वास्थ्य-तंत्र को मजबूती देने की क्षमता रखता है. इलाज में एलोपैथी की आधुनिक पद्धति के साथ आयुर्वेद के नुस्खों के प्रयोग अनेक अस्पतालों में हो रहे हैं.
पिछले साल प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत भोपाल, पटना, रायपुर, जोधपुर, ऋषिकेश और भुवनेश्वर के आयुर्विज्ञान संस्थानों में आयुष पद्धति से चिकित्सा के लिए बिस्तर आरक्षित करने की घोषणा की थी. अभी देश में 281 आयुर्वेदिक कॉलेज, 42 यूनानी कॉलेज और आयुष से संबंधित 200 अन्य मान्यताप्राप्त कॉलेज कार्यरत हैं. उत्तराखंड में आयुर्वेद विश्वविद्यालय भी निर्माणाधीन है. चालू वित्त वर्ष में आयुष मंत्रलय को 12 सौ करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है. आयुर्वेद के विकास की राह में प्रमुख चुनौती शोध सुविधाओं का अभाव और अप्रशिक्षित वैद्य-हकीमों की बड़ी संख्या है.
प्राचीन ज्ञान की इस विरासत को आधुनिक समय के लिए प्रासंगिक और प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि इसे चिकित्सा विज्ञान के आधुनिक मानदंडों पर परखा जाये और इसमें बेहतरी के प्रयास किये जाएं. प्रस्तावित शोध संस्थान और एलोपैथी के साथ इसके विभाग बनाने से निश्चित रूप आयुर्वेद-संबंधी अनुसंधानों को बढ़ावा मिलेगा. प्रशिक्षित चिकित्सकों व स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना से आयुर्वेद के नाम पर चल रहे पाखंड और झूठे दावों को रोकने में भी मदद मिलेगी.
एलोपैथी के बरक्स विभिन्न वैकल्पिक पद्धतियों के प्रति भारत समेत दुनियाभर में आकर्षण बढ़ रहा है. ऐसे में वैज्ञानिक मानदंडों और आधुनिक शोध पर आधारित आयुर्वेद एक ऐसी उपलब्धि होगा, जो परंपरा और वर्तमान को सकारात्मकता के साथ जोड़ेगा.
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