जब वे जूता चोरी की रपट लिखाने पहुंचे!

Published at :06 Aug 2015 11:39 PM (IST)
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जब वे जूता चोरी की रपट लिखाने पहुंचे!

वीर विनोद छाबड़ा सेवानिवृत्त अधिकारी (फेसबुक वॉल से) पड़ोसी मित्र से मुलाकात हुई. चेहरा उतरा हुआ है. मैंने पूछा- सब खैरियत तो है? उन्होंने बताया-कल ही नया जूता खरीदा था. पूरे 1995 रुपये का. पैंट-कमीज की सिलाई सहित टोटल कीमत से ज्यादा का. आज सुबह मंदिर गये. वहां बहुत भीड़ भी नहीं थी. जूता मंदिर […]

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वीर विनोद छाबड़ा
सेवानिवृत्त अधिकारी
(फेसबुक वॉल से)
पड़ोसी मित्र से मुलाकात हुई. चेहरा उतरा हुआ है. मैंने पूछा- सब खैरियत तो है? उन्होंने बताया-कल ही नया जूता खरीदा था. पूरे 1995 रुपये का. पैंट-कमीज की सिलाई सहित टोटल कीमत से ज्यादा का. आज सुबह मंदिर गये. वहां बहुत भीड़ भी नहीं थी. जूता मंदिर के बाहर द्वार पर उतार दिया. अंदर जाकर भगवान जी के दर्शन किये. ढेर सारी खुशियां और दौलत मांगी.
लेकिन जब वापस आये तो दिल धक्क सा हो गया. मेरा नया जूता वहां से गायब था. या यूं कहें चोरी हो गया. जो जूता ले गया, बदले में अपनी यह पुरानी चप्पल छोड़ गया. हे भगवान, यह कैसा अंधेर! अंदर आप बिराजे हैं और बाहर चोर घूम रहे हैं. सिपाही का तो कहीं अता-पता नहीं है.
मित्र महोदय रपट लिखवाने पास की पुलिस चौकी गये. पुलिस वाले नदारद थे. एक भिखारी खड़ा था वहां. बोला- मुंशी जी सुलभ शौचालय गये हैं, निपटने. उन्होंने भिखारी से पूछा- तुम यहां ड्यूटी देने आये हो? भिखारी बोला- नहीं. हमें तो मंदिर के सामने दिन भर भीख मांगनी है. सर्टिफिकेट लेने आया हूं. मुंशी जी यहां खड़ा कर गये हैं. तुम्हें क्या चाहिए? इससे पहले तो तुम्हें कहीं देखा नहीं.
भीख का सर्टिफिकेट या पॉकेटमारी का!
मित्र महोदय यह सुन कर दंग रह गये. उन्होंने भिखारी से कहा- नहीं, हमारा जूता चोरी हुआ है.रपट लिखवाने आये हैं. क्या तुम किसी जूता चोर को जानते हो? भिखारी हंसा- जूता चोर? मुंशी जी का खुद का जूता गये दिन चोरी हुआ है, यहीं चौकी से. बाहर खटिया डाले सो रहे थे.
इत्ते में मुंशी जी आ गये. हमने अपनी व्यथा बतायी. मुंशी जी बोले- रिपोर्ट तो थाने में दीवान जी लिखेंगे. अभी हैं नहीं. फिर मुंशी जी ने सौ टके की बात बतायी- थाने में रिपोर्ट लिखवाने से कुछ नहीं होनेवाला है.
लाखों की चोरी-चकारी, हत्या, डकैती, लूटपाट की खोज-खबर तो कर नहीं पाते हम. आपके 1995 रुपये के जूते की क्या बिसात. एक काम करो. शाम को आप फिर मंदिर आओ. कोई-न-कोई जुगाड़ तो हो ही जायेगा. आज नहीं तो कल. हो सकता है आपका जूता चुरानेवाला जूता चोर रहा ही न हो, आप जैसा ही कोई भुक्तभोगी हो.
पड़ोसी मित्र की इस विपदा को सुन कर हमें अपनी विपदा याद आ गयी- हमारे भी दो जोड़ी जूते मंदिर से चोरी हो चुके हैं. अभी महीना भर भी तो नहीं हुए हैं चोरी हुए. चार दिन हुए हैं नया खरीदे.
पूरे 1495 रुपये का. गाढ़े खून-पसीने की कमाई का है.
यह कहते हुए हमने खटिया के नीचे निगाह दौड़ायी. मेरा नया जूता मौजूद है. हमारे पड़ोसी मित्र ने भी झांक कर देखा. उनकी आंखें चमकीं- कुछ-कुछ ऐसा ही था मेरा जूता भी. मगर हमारी कंपनी दूसरी थी.
बड़ी वाली. और जूता इससे महंगा भी था.
मुझे अपने मित्र की इस बात पर बहुत गुस्सा आया. अपने चोरी हो चुके जूते की कंपनी को बड़ा बता कर उसने तौहीन की थी हमारी. मानो अपने को धन्ना सेठ समझता है. लेकिन गुस्सा जताने के बजाय हम खून का घूंट पीकर रह गये. दरअसल, तसल्ली की बात यह रही कि शुक्र है मेरे नये जूते को उसने अपना नहीं बताया!
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