मैं धरती मां, मुङो माफ कर दो
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :30 Apr 2015 2:17 AM (IST)
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शैलेश कुमार प्रभात खबर, पटना तुम क्या समझते हो, केवल तुम्ही रो रहे हो? मैं नहीं रो रही? मुङो दु:ख नहीं हो रहा? मेरी वजह से इतनी जानें चली गयीं और मैं न रोऊं, ऐसा हो सकता है क्या? माफी तो मुझे ही मांगनी पड़ेगी कि मैं इतनी जोर से हिली कि तुम सब हिल […]
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शैलेश कुमार
प्रभात खबर, पटना
तुम क्या समझते हो, केवल तुम्ही रो रहे हो? मैं नहीं रो रही? मुङो दु:ख नहीं हो रहा? मेरी वजह से इतनी जानें चली गयीं और मैं न रोऊं, ऐसा हो सकता है क्या? माफी तो मुझे ही मांगनी पड़ेगी कि मैं इतनी जोर से हिली कि तुम सब हिल गये. पर क्या करती मैं? तुम लोगों ने खुदाई कर-कर के मेरे शरीर पर इतने जख्म दिये, फिर भी मैं सहती गयी.
लेकिन कितना सह पाती? बहुत कोशिश की कि न तड़पूं दर्द से, लेकिन अंत में दर्द जवाब दे गया. पीड़ा इतनी असहनीय हो गयी कि न चाह कर भी मैं तड़प उठी. शरीर में कंपन हो गया. इधर मैं दर्द से तड़पी और उधर तुम लोग तड़पने लगे. तुम्हारे मकान ढहने लगे.
सड़कें फटने लगीं. भूस्खलन होने लगे. पहाड़ों की बर्फ भरभरा कर गिरने लगी. मैं कोशिश करती रही कि खुद को संभाल लूं, लेकिन तुम्हारे दिये जख्म इतने गहरे हो गये हैं कि दर्द थमने का नाम ही नहीं ले रहा. दर्द नहीं थम रहा, तो मेरे शरीर में बार-बार बेचैनी हो रही है. मेरी बेचैनी के साथ तुम भी बेचैन हो रहे हो.
तुम न ऑफिस में ठीक से काम कर पा रहे हो, न घर में ही चैन से सो पा रहे हो.थोड़ी देर ऑफिस में बैठते हो नहीं कि मेरी हल्की से बेचैनी से तुम सब बाहर भागते हो. तुममें से हर कोई सबसे पहले बाहर निकल जाना चाहता है. उस समय तुम सारे रिश्ते-नाते भी भूल जाते हो. यह अलग बात है कि उस समय भी तुम अपने स्मार्टफोन को साथ लेना नहीं भूलते. ऐसा नहीं है कि मैं अपने दर्द को सहने की कोशिश नहीं कर रही हूं, पर यह दर्द ही इतना ज्यादा है कि शरीर को स्थिर रख पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है.
इधर मेरा शरीर दर्द से कराह कर तड़प रहा है और उधर तुम्हारे दिल की धड़कन बढ़ती जा रही है. घर पर होकर भी तुम खुद को सुरिक्षत नहीं महसूस कर रहे हो. कभी इस रिश्तेदार, तो कभी उस रिश्तेदार की खबर फोन पर ले रहे हो. रात को ठीक से सो भी नहीं पा रहे हो.
एक तो वैसे ही मैं दर्द से कराह रही हूं और ऊपर से तुम इनसानों के मरने की वजह से मेरा दु:ख और ज्यादा बढ़ता जा रहा है. आखिर तुम संतान तो मेरी ही हो न. तुम चाहे मेरे साथ जो भी करो. मेरी खुदाई करो. मुझसे मेरे सारे संसाधन छीन लो. मुङो बंजर बना दो.
मेरी हरियाली छीन लो. फिर भी मैं कुछ नहीं बोलनेवाली. चुपचाप सह रही हूं. मां के हिस्से में दर्द सहने के सिवा आता ही क्या है. बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें स्वार्थ में मां कहां दिखती है.
जो भी मेरी संपत्ति पर हक तो तुम्हारा ही है न. देखो न! मैं तो अब भी तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती, लेकिन तुम्हारा दिया दर्द ही इतना ज्यादा है कि मेरा खुद पर नियंत्रण नहीं रह गया है. अब तो लगता है कि मरने के बाद ही मुङो मुक्ति मिलेगी, लेकिन मैं मर गयी, तो तुम कहां रहोगे और कैसे जिंदा रह पाओगे? क्या मंगल-चांद तुम्हारे काम आयेंगे?
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