वोट देने से पहले प्रत्याशी को तोलें

Published at :09 Dec 2014 2:09 AM (IST)
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वोट देने से पहले प्रत्याशी को तोलें

झारखंड विधानसभा की 33 सीटों के लिए मतदान हो चुका है. आज (मंगलवार को) तीसरे चरण में 17 सीटों के लिए वोट डाले जायेंगे. ये सीटें उत्तरी और दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र की हैं. तीसरे चरण के साथ ही 50 सीटों पर मतदान संपन्न हो जायेगा. लेकिन, क्या इन तीन चरणों के चुनाव प्रचार में जनता […]

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झारखंड विधानसभा की 33 सीटों के लिए मतदान हो चुका है. आज (मंगलवार को) तीसरे चरण में 17 सीटों के लिए वोट डाले जायेंगे. ये सीटें उत्तरी और दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र की हैं. तीसरे चरण के साथ ही 50 सीटों पर मतदान संपन्न हो जायेगा. लेकिन, क्या इन तीन चरणों के चुनाव प्रचार में जनता के मुद्दों पर चर्चा दिखायी पड़ी? सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा पर बात होती दिखी? शायद ही कोई शख्स होगा जो इन सवालों का जवाब ‘हां’ में दे.

हर तरफ सिर्फ हालात बदलने, तसवीर संवारने, विकास के नारे उछाले जा रहे हैं, लेकिन इसकी कोई ठोस रूपरेखा दिखायी नहीं देती. विकास बहुत लुभावना, लेकिन अस्पष्ट शब्द है. समाज के उच्च वर्ग और मध्य वर्ग के लिए विकास की जो अवधारणा है, वही अवधारणा गरीबों, किसानों, मजदूरों, आदिवासियों, दलितों के लिए नहीं हो सकती. झारखंड में धान लगभग कट चुका है, लेकिन उसकी सरकारी खरीद का इंतजाम नहीं हो पा रहा है. क्या चुनाव में इस मुद्दे को कोई नेता उठा रहा है? पहले लोकसभा चुनाव में और अब विधानसभा चुनाव में किसानों और खेती के हालात बदलने की खूब बातें हुईं.

कहा गया कि लागत मूल्य का अध्ययन कर फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जायेगा. क्या ऐसा हुआ? जवाब है, ‘नहीं’. पिछले दिनों केंद्र सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया. लागत वगैरह की गणना किये बगैर, मनमाने ढंग से सिर्फ 50 रुपये क्विंटल की बढ़ोतरी कर दी गयी. साफ है कि हमारे नेता वोट लेने के लिए झूठे वादे करते हैं. सत्ता में बैठते ही उनकी भाषा बदल जाती है.

हर सरकार कुरसी मिलते ही ‘यू-टर्न सरकार’ हो जाती है. यह बात किसी एक राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं है, बल्कि यही हमारी व्यवस्था बन गयी है. सत्ता पक्ष की भाषा अलग और विपक्ष की भाषा अलग. सिर्फ दलों के नाम और नेताओं के चेहरे बदलते हैं, व्यवस्था नहीं बदलती. आज जब आप मतदान करने निकलें, तो इन बातों पर विचार जरूर करें. जरूर सोचें कि कहीं आप लुभावने वादों के जाल में तो फंस रहे हैं? जाति-धर्म, भीतरी-बाहरी जैसे भावनात्मक मुद्दों पर बहकाये तो नहीं जा रहे हैं? वोट देने से पहले हर प्रत्याशी की बारहों महीने की भूमिका पर जरूर ध्यान दें.

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