तुरंत सजा ही उपाय
Updated at : 14 May 2018 7:08 AM (IST)
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तीन माह की बच्ची से बलात्कार और फिर उसकी हत्या जैसा अपराध वही कर सकता है, जो मनुष्य होने के लिए जरूरी न्यूनतम गुणों से वंचित हो. निश्चित रूप से इन अपराधों के लिए विशेष न्याय होना चाहिए, जो समाज के लिए एक ठोस उदाहरण सिद्ध हो. इंदौर की एक फास्ट-ट्रैक अदालत ने इसी तर्ज […]
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तीन माह की बच्ची से बलात्कार और फिर उसकी हत्या जैसा अपराध वही कर सकता है, जो मनुष्य होने के लिए जरूरी न्यूनतम गुणों से वंचित हो.
निश्चित रूप से इन अपराधों के लिए विशेष न्याय होना चाहिए, जो समाज के लिए एक ठोस उदाहरण सिद्ध हो. इंदौर की एक फास्ट-ट्रैक अदालत ने इसी तर्ज पर काम करते हुए इस मामले में महज 23 दिन की सुनवाई में आरोपी को सजा सुनायी है. लेकिन फास्ट-ट्रैक कोर्ट में पहुंचे हर मामले के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है.
देश में ऐसी अदालतों की तादाद 400 से ज्यादा है, पर इनमें मामलों का निबटारा अपेक्षित तेजी से नहीं हो रहा है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के 2016 के आंकड़ों को आधार मानें, तो बलात्कार के सिर्फ 10 फीसदी मामलों में फैसला एक साल या इससे कम अवधि में हो पाता है. ज्यादातर मामलों में दो से तीन साल का समय लग जाता है.
इंदौर में तुरंत इंसाफ हो पाया है, तो इसके पीछे वजह रही स्थानीय प्रशासन, पुलिस और अदालत का आपसी सहयोग तथा इस सहयोग का प्रेरक बना घटना से उपजा जनाक्रोश! सो, इस कार्रवाई को एक सीख के रूप में भी लिया जाना चाहिए. त्वरित न्याय के लिए पुलिस की सक्रियता, स्थानीय प्रशासन का सहयोगी रुख, न्याय प्रक्रिया के निर्बाध जारी रहने के लिए समुचित बुनियादी ढांचा तथा जागरूक नागरिक समाज की भूमिका अहम है. अफसोस की बात है कि इन जरूरी तत्वों को मुहैया कराने में हम एक व्यवस्था के तौर पर असफल रहे हैं.
देश में पुलिस की स्थिति पर आयी हालिया रिपोर्ट ने ध्यान दिलाया है कि कुछ राज्यों में फोरेंसिक लैब कर्मचारियों के अभाव में काम नहीं कर रहे हैं. कई राज्यों में पुलिस के आधुनिकीकरण के मद में दी गयी राशि में से 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खर्च नहीं हो पा रहा है.
फौजदारी के मुकदमों की बढ़ती संख्या, जजों के खाली पड़े पद और अपेक्षित पुलिस बल के अभाव जैसी समस्याएं सालों से चली आ रही हैं. इनसे न्याय प्रक्रिया में विलंब होता है. आश्चर्य नहीं कि समाज के सबसे कमजोर तबके पहले की तुलना में आज ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
बच्चों के खिलाफ होनेवाले अपराधों में एक साल (2015-2016) के भीतर 11 फीसदी के इजाफे जैसे भयावह आंकड़े हमारे सामने हैं. ऐसे अपराधों में एक दशक के भीतर 500 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. विधि-व्यवस्था की खामियों के चलते कमजोर और असहाय अपराधों का सबसे पहले और सबसे ज्यादा निशाना बनते हैं. इससे भी ज्यादा चिंताजनक है अपराधों में फैसला देर से आना या किन्हीं कारणों से अपराधियों को सजा नहीं मिलना.
एक लोकतांत्रिक और विधि-व्यवस्था से संचालित होनेवाले देश में यह हालत व्यापक सुधारों की मांग करती है, जो सरकार और प्रशासन की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए. घोषणाओं और कागजी बातों को अमली जामा पहनाये बगैर समाज, खासकर बच्चों और महिलाओं, को चैन से जीने का माहौल मुहैया नहीं कराया जा सकता है.
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