क्या थमेगा ‘हर हर मोदी’ का ‘उन्माद’!

Published at :25 Mar 2014 5:46 AM (IST)
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क्या थमेगा ‘हर हर मोदी’ का ‘उन्माद’!

बाबा विश्वनाथ की पवित्र नगरी बनारस में आठों पहर गूंजनेवाले ‘हर हर महादेव’ नारे का एक विशेष संदर्भ है. दुखों से मुक्ति के लिए भगवान शिव से की जानेवाली यह अर्चना यहां परस्पर अभिवादन के लिए तो प्रयुक्त होती ही है, इस सांस्कृतिक-धार्मिक नगरी की पहचान का अप्रतिम उद्घोष भी है. भगवान शिव और बनारस […]

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बाबा विश्वनाथ की पवित्र नगरी बनारस में आठों पहर गूंजनेवाले ‘हर हर महादेव’ नारे का एक विशेष संदर्भ है. दुखों से मुक्ति के लिए भगवान शिव से की जानेवाली यह अर्चना यहां परस्पर अभिवादन के लिए तो प्रयुक्त होती ही है, इस सांस्कृतिक-धार्मिक नगरी की पहचान का अप्रतिम उद्घोष भी है. भगवान शिव और बनारस से जुड़े होने के कारण इस नारे को आम हिंदू एक पवित्र मंत्र की तरह उच्चारित करता है.

ऐसे में भाजपा द्वारा इस नारे को नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का उद्घोष बना दिये जाने से एक बड़े वर्ग में नाराजगी स्वाभाविक है. इसीलिए द्वारका के शंकराचार्य को संघ प्रमुख से यह शिकायत करनी पड़ी कि ईश्वर के लिए प्रयुक्त होनेवाले संबोधन का प्रयोग एक व्यक्ति-विशेष के लिए नहीं होना चाहिए. अच्छी बात यह है कि संघ प्रमुख ने इस शिकायत को गंभीरता से लिया और मोदी ने भी अपने समर्थकों से इस नारे का इस्तेमाल नहीं करने की अपील की है.

लेकिन, भाजपा का यह दावा सही नहीं है कि यह नारा पार्टी ने नहीं गढ़ा था, बल्कि कुछ उत्साही नेताओं-कार्यकर्ताओं की कारस्तानी थी. सच यही है कि भाजपा चुनावी रणनीति के तहत ‘हर हर महादेव’ के कई आयामों को मोदी की आक्रामक छवि के साथ जोड़ कर राजनीतिक लाभ उठाना चाह रही थी. उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की मानें तो यह नारा उन्होंने गढ़ा था, जिसे मोदी की रैलियों, बैनरों और पोस्टरों पर प्रमुखता से छापा गया. हकीकत यही है कि मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाने को बेचैन भाजपा हर दावं-पेंच आजमा रही है. दागियों-बागियों को भी टिकट बांटे जा रहे हैं और पार्टी के भीतर मोदी-विरोधी हर स्वर को हाशिये पर धकेला जा रहा है.

वैचारिक या नीतिगत आधार के बिना गठबंधन का विस्तार हो रहा है. इन सबसे ऊपर मोदी की छवि एक ‘सुपरमैन’ की बनायी जा रही है, जिसे अपने हाव-भाव और भाषणों से खुद मोदी भी सजा रहे हैं. इसके दर्शन ‘56 इंच का सीना’ से लेकर गुजरात में विकास के बड़े-बड़े दावों में होते रहते हैं. उनका प्रचार-तंत्र उनके बचपन में मगरमच्छ के बच्चे के साथ खेलने की कथाएं प्रचारित कर रहा है. ऐसे में बुद्धिजीवियों की नजर में ‘हर हर मोदी’ का उद्घोष राजनीतिक पैंतरा ही नहीं, मोदीमय हो चुकी भाजपा के ‘उन्माद’ का भी परिचायक है.

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