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vishesh aalekh

  • May 26 2018 6:25AM
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मोदी सरकार के 4 साल : पीएम मोदी डॉक्ट्रिन नहीं, पर मोदी प्रभाव

मोदी सरकार के 4 साल : पीएम मोदी डॉक्ट्रिन नहीं, पर मोदी प्रभाव
आर्थिक मोर्चे पर अनेक उपलब्धियां तो मोदी सरकार के खाते में हैं ही, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने व्यक्तित्व और दृष्टिकोण से धमक दी है. देश के भीतर सामाजिक विकास को तेज करने के भी ठोस प्रयास हुए हैं. अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और समाज की बेहतरी के त्रिआयामीय कामयाबियों ने देश के भविष्य को मजबूत आधार दिया है. पर्यावरण की समस्याओं पर ध्यान दिया गया है, पर इस मुद्दे पर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. मोदी सरकार के चार साल के कामकाज के अहम आयामों की पड़ताल पर विशेष प्रस्तुति...
 
डॉ श्रीश पाठक

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार 
 
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक विदेश नीति का संचालन संस्थागत प्रयासों की तुलना में व्यक्तिगत करिश्मे से अधिक हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी में भी यह करिश्मा है और उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल भी किया है. 
 
विश्व-नेताओं को उनके पहले नाम से संबोधित करना हो या गर्मजोशी से गले लगाना हो, मोदी हमेशा विदेश नीति में व्यक्तिगत सिरा खंगालते रहे हैं. अमेरिका, फ्रांस और जापान के द्विपक्षीय संबंधों में इसका असर भी महसूस किया गया है. मोदी सरकार से विदेश नीति से जुड़ी अपेक्षाओं के दो बड़े आधार थे. 
 
एक, कांग्रेस से इतर पहली बार कोई दूसरा दल प्रचंड बहुमत से सत्तारुढ़ हो रहा था; दूसरे, प्रधानमंत्री बनने से पहले कई विदेश यात्राएं कर चुके थे. नेहरू की तरह ही, मोदी भी व्यक्तिगत तौर पर पहले से ही विदेश नीति में दिलचस्पी रखते थे.
 
भारतीय विदेश नीति को सामयिक, प्रभावी और दूरगामी बनाने के ऐतिहासिक अवसर का उन्हें भान भी था और किसी तरह की ऐतिहासिक हिचक भी उनके सामने नहीं थी.
 
चुनावी अभियान के कठोर प्रतिक्रियावादी रुख से उभरी आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध करते हुए शपथ-ग्रहण समारोह में पड़ोसी राष्ट्रों के प्रमुखों को आमंत्रित कर नयी सरकार ने उम्मीदों के पर लगा दिये थे. इराक से बचायी गयीं 46 नर्सों ने आश्वस्त किया कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के साथ टीम मोदी सशक्त, सक्षम और स्पष्ट है. फिर शुरू हुआ मोदी की विदेश यात्राओं का लगातार सिलसिला. लगभग 36 विदेश यात्राओं में प्रधानमंत्री मोदी 56 देशों की जमीन पर पांव रख चुके हैं. 
 
इनमें कई देश ऐसे हैं, जहां अरसे बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री पहुंचा या फिर मोदी पहली बार गया. विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी यह ‘जुड़ाव’ का मौका था और इससे देश को 'सॉफ्ट पॉवर' के रूप में भी स्थापित करने में मदद मिली है. ठिठकी पड़ी अनेक द्विपक्षीय वार्ताएं फिर से शुरू हुई हैं.
 
हालांकि, आर्थिक क्षमता, सांस्कृतिक प्रभाव और वैश्विक सक्रियता से अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की अहमियत पहले से ही थी, पर मोदी की नीतिगत तेवर ने दुनिया को यह जरूर दिखलाया कि भारत अपनी वैश्विक भूमिका को गंभीरता से समझता है. 
 
बीते चार साल वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद अनिश्चित रहे हैं, किसी खास पैटर्न के आधार पर इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है. चीन, रूस, जापान, जर्मनी जैसे दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में शक्तिशाली नेतृत्व है और दुनिया द्विपक्षीयता से बहुपक्षीयता के मध्य हिचकोले खाती रही है. 
 
रूस ने चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के साथ अपनी संगति बिठाई, तो जापान की पहल पर अमेरिका ने भारत और आस्ट्रेलिया को हिंद-प्रशांत क्षेत्र की जिम्मेदारी दी. डोनाल्ड ट्रम्प का अमेरिका अपनी नीतियों में इतना मोलतोल वाला और चौंकाऊ रहा कि भारत सहित उसके साथी देश अपनी नीतियों में सुसंगतता स्थापित ही नहीं कर सके.
 
बढ़ते गैर-पारंपरिक असुरक्षाओं के युग में भी पारंपरिक हथियारों की खरीदारी में यूपीए सरकार की तरह ही मोदी सरकार अव्वल रही और यूरोपीय संघ, फ्रांस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि से व्यापारिक-सामरिक समझौते भी संपन्न हुए. 
 
चाबहार परियोजना, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में दलवीर भंडारी की जीत, शस्त्र व तकनीक नियंत्रण की चार वैश्विक समितियों में से तीन की सदस्यता, कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक, कई देशों से परमाणु करार, मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर, चागोस प्रायद्वीप मुद्दे पर ब्रिटेन के विरुद्ध और मॉरीशस के पक्ष में मतदान करना, आसियान राष्ट्रप्रमुखों को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित करना आदि मोदी सरकार की उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं.
 
भारतीय विदेश नीति की सर्वाधिक विफलता अपने पड़ोस में दिखाई देती है. भूटान को छोड़कर कहीं और भारत अपने संबंध संजो नहीं पाया है. आक्रामक चीन के सापेक्ष हमारी तैयारी बेहद शिथिल है. 
 
नौकरशाही पर नकेल कसने में असफल मोदी सरकार की विदेश नीति में रचनात्मक दृष्टि और तारतम्यता की कमी रही है. तारतम्यता के अभाव ने ही मोदी डॉक्ट्रिन जैसी कोई 
 
चीज स्थापित नहीं करने दिया है. इस कार्यकाल के आखिरी महीनों में मोदी कुछ उल्लेखनीय बटोरने की हड़बड़ी में फिर चीन और रूस से संपर्क साध रहे हैं.
 
शहरों को बेहतर बनाने की तैयारी
 
भारत में शहरीकरण की गति को तेज करने और इन्हें बेहतर बनाने के लिए बीते चार वर्षों में मोदी सरकार ने स्मार्ट सीटिज, अमृत, स्वच्छ भारत अभियान, हृदय, प्रधानमंत्री आवास योजना, समेत अनेक योजनाओं की शुरुआत की है. इन कार्यक्रमों के व्यवस्थित रूप से संचालित होने के लिए मौजूदा वित्त वर्ष में आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय के बजट में 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गयी है. जानते हैं इन योजनाओं के बारे में संक्षेप में :
 
स्मार्ट सिटी योजना 
 
इस योजना के तहत करीब सौ शहरों का चयन किया गया है. इन शहरों के विकास पर कुल 2,01,981 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान है. इस योजना का उद्देश्य उन शहरों को प्रोत्साहित करना है, जो मुख्य अवसंरचना मुहैया कराने के साथ ही अपने नागरिकों को बेहतर जीवन स्तर व स्वच्छ वातावरण प्रदान करते हैं.

अमृत 
 
अटल मिशन फॉर रीजुविनेशन एंड अर्बन ट्रांसफॉर्मेशन नामक इस कार्यक्रम के तहत सभी लोगों को जलापूर्ति, सीवेज, शहरी परिवहन, पार्क समेत आधारभूत नागरिक सुविधाएं मुहैया कराने व इन्हें बेहतर बनाने के लिए शुरू की गयी. आगामी पांच वर्षों के दौरान इस कार्यक्रम पर 50,000 करोड़ रुपये की राशि खर्च किया जाना प्रस्तावित है.
 
स्वच्छ भारत अभियान  
 
इस अभियान के तहत वर्ष 2019 तक 66.42 लाख घरेलू शौचालय, 2.52 लाख सामुदायिक शौचालय और 2.56 लाख सार्वजनिक शौचालय बनाने और ठोस कचरा प्रबंधन समेत अन्य कई उपायों के साथ शहरी इलाकों को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य तय किया गया है.
हृदय 
 
हेरिटेज सिटी डेवलपमेंट एंड अग्मेंटेशन नामक इस योजना को ऐतिहासिक महत्व के शहरों यानी हेरिटेज सीटिज को संरक्षित करने और पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से शुरू की गयी. इस योजना के तहत मार्च, 2017 तक 500 करोड़ रुपये की लागत से पहचान किये गये 12 शहरों का पुनरुद्वार किया जा चुका है.
 
पीएम अावास योजना 
 
एक अनुमान के मुताबिक आगामी एक दशक में मलिन बस्तियों में रहने वाले परिवारों की संख्या 1.8 करोड़ तक पहुंच जायेगी. प्रधानमंत्री अावास योजना के तहत केंद्र सरकार का उद्देश्य शहरी गरीब परिवारों को 2022 तक आवास मुहैया कराना है.
 
सभी गांवों तक पहुंची बिजली
 
4 करोड़ से अधिक गरीबों को सौभाग्य योजना के तहत बिजली की सुविधा प्रदान की गयी.
18.1 करोड़ ग्रामीण घरों में से 14.16 करोड़ (78.24 फीसदी) घरों में बिजली पहुंच गयी है.
100 फीसदी ग्रामीण विद्युतीकरण का दावा किया है केंद्र सरकार ने बीते माह.
 
जन-धन योजना से वित्तीय समावेशीकरण
 
पद संभालने के तीन महीने के भीतर सरकार द्वारा प्रधानमंत्री जन-धन योजना की घोषणा की गयी थी. इसका उद्देश्य देश की बड़ी गरीब आबादी को बैंकिग, बीमा और पेंशन प्रणाली से जोड़ना था. जनवरी, 2018 तक इस योजना के तहत करीब 31 करोड़ लाभार्थी थे और इनमें 60 फीसदी हिस्सा ग्रामीणों का था. इसमें अभी 73,690 करोड़ रुपये जमा हैं, जो कि औसतन 2,377 रुपये प्रति खाता है. देश में पहले कभी भी इतने बड़े पैमाने पर समाज के निचले तबकों को बैंक सुविधा नहीं दी गयी थी.
 
शहरी विकास व गरीबों के कल्याण के लिए योजनाएं

देश के 100 पिछड़े जिलों को विकसित करना.
 
प्रत्येक नागरिक को बिजली, पानी और शौचालय युक्त घर मुहैया कराना.
वर्ष 2022 तक प्रत्येक नागरिक को पक्का घर उपलब्ध कराना.
प्रत्येक घर के लिए नल के माध्यम से जलापूर्ति सुनिश्चित करना.
 
नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर जोर
 
दिसंबर, 2017 में सरकार ने 100 अत्यधिक पिछड़े जिलों को विकसित करने के उद्देश्य से सरकार ने काम शुरू किया और उनके त्वरित विकास के लिए संबंधित मंत्रालयों को 
 
काम सौंपा. इस परियोजना के तहत अप्रैल, 2018 से मार्च, 2019 तक इन जिलों को विकसित कर अन्य जिलों के समकक्ष लाये जाने 
की योजना है.
 
स्वच्छ भारत अभियान के तहत 2019 तक 66.42 लाख घरेलू शौचालय, 2.52 लाख सामुदायिक शौचालय और 2.56 लाख सार्वजनिक शौचालय बनाने का लक्ष्य तय किया गया है.
 
सरकार ने नये शहरों का निर्माण तो नहीं किया लेकिन स्मार्ट सिटी योजना के तहत 100 शहरों का चयन. इस वर्ष जनवरी तक 2,237 करोड़ रुपये की लागत से 189 परियोजनाओं को पूरा किया गया, जबकि 1.38 लाख करोड़ रुपये की लागत से विभिन्न चरणों में 2,984 परियोजनाओं को पूरा किया जाना है.
 
विकास में अवरोधक नहीं है पर्यावरण 

हिमांशु ठक्कर

पर्यावरणविद्
 
मौजूदा एनडीए सरकार ने पर्यावरण को कम प्राथमिकता दी है. सरकार के पास अच्छा मौका था. पर्यावरण के लिए किसी मंत्री को कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिला और चार साल में तीन पर्यावरण मंत्री बदल चुके. दूसरी बात यह कि इन मंत्रियों ने या सरकार ने पर्यावरण को विकास का अवरोधक माना है. जबकि पर्यावरण को विकास का अवरोधक मानना गलत है. पर्यावरण बड़े पैमाने पर लाेगों की आजीविका से जुड़ा होता है और उनकी मुख्य न्यूनतम जरूरतों को पूरा भी करता है. तीसरी बात यह है कि सरकार में बैठे लोगों ने पूरी कोशिश की कि पर्यावरण के मुद्दे से लोगों काे भटका दिया जाये. 
 
सरकार ने सुब्रह्मण्यम कमेटी बनायी, जिसका काम ही यही है कि पर्यावरण की अनदेखी कर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा मिले. पर्यावरण के सामने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को रखने का मतलब ही यही है कि सरकार पर्यावरण को विकास का अवरोधक मानती है. एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) पर्यावरण समस्याओं के निराकरण के लिए एक महत्वपूर्ण संस्था है. आज स्थिति यह है कि देशभर में इसकी जितनी भी शाखाएं हैं, सब ठप्प पड़ी हुई हैं. सरकार को इसे काम करने देना चाहिए. 
 
गंगा काे पुनर्जीवित करने के लिए नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय बनाया गया और इसकी जिम्मेदार उमा भारती को दी गयी. लेकिन इतने साल बाद भी गंगा का जरा भी उद्धार नहीं हुआ. कुछ विशेषज्ञ बोल रहे हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कह रहे हैं कि निर्मल गंगा की बात बेईमानी है, जब तक अविरल गंगा की बात न की जाये. सही बात है. सरकार को अविरल गंगा पर ध्यान देना चाहिए. 
 
उमा भारती के बाद नितिन गडकरी ने गंगा संरक्षण मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली. उन्होंने शुरू में कहा कि गंगा का प्रदूषण जल्दी ही कम हो जायेगा, लेकिन अब वे कह रहे हैं कि मार्च 2019 तक सत्तर-अस्सी प्रतिशत तक कम हो जायेगा. लेकिन गडकरी जी ने यह नहीं बताया कि आखिर यह होगा कैसे? इसका कोई खाका सरकार के पास नहीं है. 
 
सरकार के मंत्री अपनी गोल-पोस्ट बदलते दिखते हैं, उनके विजन में कोई स्पष्टता नहीं होती है. सिर्फ पैसा आवंटित कर देने से गंगा साफ नहीं हो सकती. यही बात पिछले तीस-पैंतीस साल से होती चली आ रही है और गंगा दिन-प्रतिदिन मैली होती जा रही है. 
 
सरकार नदियों को जोड़ने (रीवर लिंकिंग) की बात प्राथमिकता स्तर पर करती है. जैसे केन-बेतवा लिंक. केन तो गंगा बेसिन में ही है. इसको बेतवा से जोड़ने के लिए पन्ना टाइगर रीवर को खत्म करना होगा. बीस लाख बड़े पेड़ काटे जायेंगे, यानी टाइगर रीवर और जंगल को खत्म करना होगा. छोटे पेड़ों को मिला लें, तो चालीस-पचास लाख पेड़ काटने के बाद और पन्ना टाइगर रीवर खत्म करने के बाद रीवर लिंक होगा.
 
यह एक विडंबना नहीं तो और क्या है? 
 
सरकार गंगा-जमुना या अन्य नदियों पर जो बांध या हाइड्रो पावर या फिर रीवर लिंकिंग इसलिए करती है, क्योंकि वाटरवेज उनकी बड़ी प्राथमिकता है. लेकिन, वे इस बात को नहीं समझते कि वाटरवेज तब सफल हो सकता है, जब नदी में पानी हो. नदी में पानी न हो और वाटरवेज बनाना चाहते हैं, तो यह सिर्फ बैराज बनाकर ही हो सकता है. 
 
गडकरी ने बहुत पहले मई 2014 में कहा था कि गंगा पर हर पचास किलोमीटर पर एक बैराज बनाया जायेगा. जबकि नीतीश कुमार कहते हैं कि गंगा को बरबाद करने में एक ही बैराज (फरक्का) काफी है. अब हर पचास किलोमीटर पर जब बैराज बनाया जायेगा, तो क्या हाल होगा गंगा का? जहां तक प्रदूषण का सवाल है, तो देश की राजधानी में जब इतना प्रदूषण है, जिसे अदालत ने गैस चैंबर तक की संज्ञा दे दी है और डॉक्टरों ने पर्यावरण इमरजेंसी घोषित करने की बात की, लेकिन केंद्र सरकार ने एक भी पहल इस संबंध में नहीं की. 
 
ऊर्जा क्षेत्र में सरकार ने एक अच्छा कदम जरूर उठाया है, वह है सोलर एनर्जी को बढ़ावा देना. हालांकि, इसकी पूरी तैयारी नहीं हुई है, फिर भी सोलर के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को बढ़ावा दिया है. उम्मीद है, इस क्षेत्र में कुछ ठोस तैयारी होगी. अगर इस प्रोजेक्ट को बढ़ावा दिया जाता है, तो आज जिनके पास बिजली नहीं है, उनके घर में भी बिजली पहुंच जायेगी.
 

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