Explainer : संयुक्त राष्ट्र का दक्षिण सूडान मिशन क्या है, क्यों होती है फोर्स कमांडर की नियुक्ति

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 06 Jul 2022 1:55 PM

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1 जनवरी, 1956 को ब्रिटेन और मिस्र से आजादी मिलने के बाद सूडान में सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हो गया. इस संघर्ष के बाद सूडान की सत्ता सेना के हाथ में आने के बाद वर्ष 1965 में सूडान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव कराए गए. इसके तहत एक मुस्लिम प्रभुत्व वाली सरकार के अधीन आ गई.

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नई दिल्ली : संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के महासचिव एंटोनियो गुटारेस ने भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल मोहन सुब्रमण्यम को दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन (यूएनएमआईएसएस) का अपना नया ‘फोर्स कमांडर’ नियुक्त किया है. वह भारतीय सेना से ही नाता रखने वाले लेफ्टिनेंट जनरल शैलेश तिनाइकर की जगह लेंगे. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटारेस ने लेफ्टिनेंट जनरल शैलेश तिनाइकर को मई 2019 में दक्षिण सूडान के लिए संयुक्त राष्ट्र के मिशन का फोर्स कमांडर नियुक्त किया था. हम सबके लिए सबसे पहले यह जानना बेहद आवश्यक है कि आखिर संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) दक्षिण सूडान में किस प्रकार का मिशन चला रहा है, जिसके लिए फोर्स कमांडर नियुक्त करने की जरूरत पड़ती है?

जुलाई 2011 में आजाद हुआ दक्षिण सूडान

दरअसल, दक्षिण सूडान या जनूब-उस-सूडान (दक्षिणी सूडान गणतंत्र) वर्ष 2005 से उत्तर-पूर्व अफ्रीका के सूडान गणतंत्र का एक हिस्सा है. इस देश की राजधानी जुबा है. यह जुबा दक्षिणी सूडान का सबसे बड़ा शहर है. इसके उत्तर में सूडान है, पूरब में इथियोपिया, दक्षिण में युगांडा, पश्चिम में मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिण-पूर्व में केन्या और दक्षिण-पश्चिम में कांगो स्थित है. 9 जुलाई 2011 को एक जनमत संग्रह के जरिए दक्षिण सूडान को आजादी मिली. आजादी के बाद अस्तित्व में आने के बाद दक्षिण सूडान दुनिया का 196वां, संयुक्त राष्ट्र में 193वां और अफ्रीका महादेश का 55वां देश बना. दक्षिण सूडान ने आजादी के करीब एक साल बाद जुलाई 2012 में जिनेवा सम्मेलन के दौरान किसी अंतरराष्ट्रीय मसले पर पहला हस्ताक्षर किया.

आजादी के बाद से ही दक्षिण सूडान में जारी है आंतरिक संघर्ष

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 9 जुलाई 2011 को सूडान से आजादी मिलने के बाद से ही दक्षिण सूडान को आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है. जनमत संग्रह के बाद सूडान गणतंत्र के टूटने पर दो देश दक्षिणी और उत्तरी सूडान अस्तित्व में आए. दक्षिणी सूडान की ज्यादातर आबादी ईसाई धर्म को मानने वाली है. वहीं, उत्तरी सूडान में मुस्लिम धर्म के अनुयायियों की संख्या अधिक है. उत्तरी सूडान के मुस्लिम समूहों द्वारा सूडान को कट्टरपंथी मुस्लिम राष्ट्र में बदलने की आशंका के मद्देनजर दक्षिणी सूडान के लोगों ने विरोध-प्रदर्शन करना शुरू दिया. इस वजह से 1956 के दौरान पूरे सूडान में गृहयुद्ध छिड़ गया और सूडान की सत्ता सेना के हाथ में आ गई.

1969 में गफर मोहम्मद ने मुस्लिम सरकार किया तख्ता पलट

बता दें कि 1 जनवरी, 1956 को ब्रिटेन और मिस्र से आजादी मिलने के बाद सूडान में सत्ता को लेकर संघर्ष शुरू हो गया. इस संघर्ष के बाद सूडान की सत्ता सेना के हाथ में आने के बाद वर्ष 1965 में सूडान में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव कराए गए. इसके तहत एक मुस्लिम प्रभुत्व वाली सरकार के अधीन आ गई, लेकिन वर्ष 1969 में इस मुस्लिम सरकार का गफर मोहम्मद अल-निमरी के नेतृत्व में तख्तापलट कर दिया गया.

1972 में खत्म हुआ सूडान का गृहयुद्ध

वर्ष 1969 में गफर मोहम्मद अल-निमरी द्वारा मुस्लिम सरकार का तख्ता पलटने के बाद सूडानी सोशलिस्ट पार्टी द्वारा एक दलीय शासन की शुरुआत की गई. इसके बाद 1972 में गफर मोहम्मद के शासनकाल में वर्ष 1972 में एक्वाटोरिया की आतंरिक स्वायत्तता के लिए आदिस अबाबा समझौता हुआ, जिससे सूडान के दक्षिणी प्रांतों में 17 वर्षों से चल रहा गृहयुद्ध समाप्त हो गया.

शरिया कानून के विरोध में दक्षिण सूडान में भड़का विद्रोह

हालांकि, वर्ष 1983 में उत्तरी सूडान में मुस्लिम ब्रदरहुड की बढ़ती ताकत को देखते हुए गफर मोहम्मद ने सूडान में कानूनों को सख्त करने तथा इस्लामी कानून संहिता ‘शरिया’ के अनुरूप लाने के लिए अपनी ही नीतियों को पलट दिया और दक्षिणी प्रांतो को केंद्रीय प्रशासन के अंतर्गत लाने के लिए इसी वर्ष आदिस अबाबा समझौते को भी निरस्त कर दिया, जिससे दक्षिण के प्रांतों में फिर से अशांति एवं विद्रोह शुरू हो गया.

1989 में सेना ने एक बार फिर किया तख्तापलट

वर्ष 1989 में सूडान सरकार और दक्षिणी प्रांत के विद्रोहियों ने युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत शुरू की, लेकिन उमर अल-बशीर के नेतृत्व में सेना ने सरकार का तख्तापलट कर दिया और उमर अल-बशीर ने खुद को राष्ट्रपति घोषित किया. वर्ष 2003 में सूडान में दारफुर के पश्चिमी क्षेत्र में सूडान लिबरेशन मूवमेंट और जस्टिस एंड इक्वलिटी मूवमेंट समूहों द्वारा सूडान सरकार पर दारफुर क्षेत्र की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए विद्रोह शुरू किया.

2004 में सुरक्षा परिषद ने सूडान सरकार के खिलाफ जारी किया संकल्प पत्र

वर्ष 2004 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एक संकल्प पत्र जारी किया, जिसमें कहा गया कि सूडान सरकार ने दक्षिणी प्रांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं किया. इस संकल्प पत्र में दारफुर क्षेत्र में सैन्य समर्थित हमलों पर चिंता व्यक्त की गई. वर्ष 2009 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने अल-बशीर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया, जिस पर दारफुर क्षेत्र में मानवता एवं युद्ध अपराधों के खिलाफ अपराध का आरोप लगाया गया.

2011 में दक्षिण सूडान की आजादी के लिए कराया गया जनमत संग्रह

इन तमाम घटनाक्रमों के बाद जनवरी 2011 में दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता के लिए जनमत संग्रह कराया गया और 9 जुलाई 2011 को दक्षिण सूडान गणराज्य एक स्वतंत्र देश बन गया. उमर अल-बशीर द्वारा दक्षिणी सूडान की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन सूडान और दक्षिणी सूडान गणराज्य द्वारा अब्येई क्षेत्र पर दावा किये जाने के कारण दोनों देशों के बीच विवाद शुरू हो गया.

आजादी के बाद से ही नस्लीय और राजनीतिक अस्थिरता का शिकार

आजादी के बाद से दक्षिण सूडान नस्लीय संकट और राजनीतिक अस्थिरता का शिकार है. ठोस आर्थिक नीतियों के नहीं होने की वजह से सत्ता संघर्ष और आंतरिक हिंसा ने वैश्विक संकट का रूप ग्रहण कर लिया. संयुक्त राष्ट्र महासचिव के दफ्तर से जारी बयान में कहा गया है कि महासचिव दक्षिण सूडान में एक खास समुदाय को निशाना बनाए जाने को लेकर बेहद चिंतित हैं. दक्षिण सूडान में छोटे सशस्त्र विद्रोही लड़ाकों के गुट में वर्चस्व और नस्ल को लेकर संघर्ष लगातार जारी है.

सशस्त्र विद्रोहियों के संघर्ष में पलायन शुरू

दक्षिण सूडान में दिसंबर 2013 के बाद से छोटे सशस्त्र विद्रोही लड़ाकों के गुट में वर्चस्व को लेकर शुरू हुए टकराव में और तेजी आ गई. उसके बाद से लाखों लोग अपना घर-बार छोड़कर पलायन करके दूसरे देशों में शरण लिये हुए हैं. देश में गृह-युद्ध की स्थिति है जहां बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का हनन हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र को क्यों देना पड़ा दखल

सशस्त्र विद्रोहियों के गुटों में वर्चस्व की लड़ाई, नस्लीय हिंसा, सत्ता संघर्ष और गृहयुद्ध की वजह से दक्षिण सूडान में मानवीय संकट पैदा हो गया. लाखों लोगों के पलायन, लाखों लोगों की मौत और कमजोर आर्थिक नीतियों के चलते पैदा हुई भुखमरी की वजह से संयुक्त राष्ट्र को दक्षिण सूडान में एक मिशन की शुरुआत करनी पड़ी. संयुक्त राष्ट्र ने दक्षिण सूडान में वर्ष 2011 में ही एक मिशन की शुरुआत की थी. दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन ( यूएनएमआईएसएस) एक शांति मिशन है. संयुक्त राष्ट्र के दक्षिण सूडान मिशन की स्थापना 8 जुलाई 2011 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संकल्प 1996 (2011) द्वारा की गई थी. दिसंबर 2016 से संयुक्त राष्ट्र दक्षिण सूडान मिशन का नेतृत्व महासचिव के विशेष प्रतिनिधि, दक्षिण अफ्रीकी वकील और राजनयिक निकोलस हेसोम ने किया है. हेसम ने जनवरी 2021 में डेविड शियरर का स्थान लिया.

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संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में दूसरे स्थान पर भारत

भारत संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में सबसे अधिक योगदान देने वाले देशों में से एक है. दक्षिण सूडान में संयुक्त राष्ट्र मिशन में नवंबर 2021 तक 17,982 कर्मी तैनात थे. भारत यूएनएमआईएसएस में दूसरा सबसे बड़ा सैन्य-योगदान करने वाला देश है. मिशन में 2385 शांतिरक्षकों के साथ भारत दूसरे स्थान पर है. सबसे अधिक शांतिरक्षक रवांडा के हैं. भारत के वर्तमान में यूएनएमआईएसएस में 30 पुलिस कर्मी तैनात हैं. दक्षिण सूडान में शांति मिशन को जारी रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र की ओर से फोर्स कमांडर नियुक्त किए जाते हैं.

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