US टैरिफ बिल के बाद भारत कैसे करेगा देश की ऊर्जा सुरक्षा !

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भारत रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है और अमेरिका भारत का शीर्ष निर्यात गंतव्य. इन दोनों स्थितियों के बीच एक नया अमेरिकी कानून आ खड़ा हुआ है, जो वाशिंगटन को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है. वहीं, भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता अभी भी किसी सहमति तक पहुंचने के इंतजार में है. अगर अमेरिका रूस से तेल लेने वाले देशों पर यह टैरिफ नियम थोपता है, तो भारत कैसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करेगा, जानें ऊर्जा विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा से..

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यूएस कांग्रेस से पारित हो चुके 48 पन्नों के नये विधेयक के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल गयी, जो रूस से तेल और प्राकृतिक गैस का आयात करते हैं. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इसका निशाना कौन से देश सबसे पहले बनेंगे, लेकिन भारत और चीन रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार होने के नाते इस दायरे में सबसे ऊपर आते हैं. हालांकि, यह कानून भारतीय वस्तुओं पर स्वतः 100 प्रतिशत टैरिफ नहीं लगाता है, बल्कि ट्रंप प्रशासन को कुछ विशेष शर्तों के तहत ऐसे टैरिफ लगाने का कानूनी मार्ग प्रदान करता है. अब यह आने वाले समय में ही पता चलेगा कि क्या ट्रंप इसे वास्तव में लागू करेंगे? अगर लागू हुआ, तो टैरिफ केवल 10 से 15 प्रतिशत रहेगा या 100 प्रतिशत पूरा लागू होगा!

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ऊर्जा जरूरतों पर भारत का रुख स्पष्ट

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी तत्काल प्राथमिकता अपने 1.4 अरब नागरिकों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना और देश के व्यापार व आर्थिक हितों की रक्षा करना है. वर्तमान में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 89 प्रतिशत तेल 42 अलग-अलग देशों से आयात कर रहा है. पारंपरिक रूप से खाड़ी के देशों से कच्चे तेल और गैस का बड़ा हिस्सा आयात किया जाता था, लेकिन वहां जारी युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित है. ऐसे में भारत रूस व कुछ अन्य देशों से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है. इस लिहाज से भारत के लिए यह अमेरिकी विधेयक भारतीय निर्यात पर टैरिफ का बड़ा खतरा लेकर आया है. लेकिन, भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है. भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयुक्त स्रोतों से तेल खरीदना जारी रखेगा, क्योंकि देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा, अमेरिका की भी मुश्किलें बढ़ेंगी

  • संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुसार किसी देश पर एकतरफा व्यापारिक पाबंदी लगाना या टैरिफ के जरिये दंडित करना  गैर-कानूनी माना जाता है.
  • अमेरिका ने मुख्य रूप से भारत और चीन को रूस से तेल खरीदने से रोकने के लिए यह कदम उठाया है. यदि भारत और चीन रूस से तेल लेना बंद कर देते हैं, तो पूरे ग्लोबल सप्लाइ सिस्टम में प्रतिदिन 50 लाख बैरल तेल की किल्लत हो जायेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बहुत अधिक बढ़ जायेंगी, जो इंटरनेशनल बेंचमार्क होती हैं. इसका सीधा  और सबसे बड़ा  असर अमेरिकी उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा, क्योंकि अमेरिका दुनिया में तेल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है.
  • भारत और चीन जैसे देशों से आने वाले सामान पर अगर अमेरिका 100 फीसदी टैरिफ लगाता है, तो इससे केवल निर्यातक देशों को ही नहीं, बल्कि खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और उपभोक्ताओं को भी बड़ा नुकसान होगा, क्योंकि अमेरिका चीन और भारत से भारी मात्रा में वस्तुओं का आयात करता है. इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था गहरे संकट में आ सकती है.

ट्रेड डील में भारत को बरतनी होगी सतर्कता

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में केवल शक्ति प्रदर्शन काम नहीं आता, इसमें निगोशिएशन सबसे अहम होता है. वर्तमान में सबसे बड़ी और तात्कालिक चुनौती भारत-अमेरिका ट्रेड डील है, जो पहले से ही अमेरिका की बढ़ती मांगों के कारण विलंबित है. इस नये अधिनियम से भारतीय वार्ताकारों के सामने एक नयी मुश्किल खड़ी हो गयी है. अब हमारे राजनयिकों और अधिकारियों को समझदारी से यह तय करना होगा कि अमेरिका की कौन-सी मांगें मानी जा सकती हैं और किन चीजों पर समझौता संभव नहीं. व्यापार वार्ता में अमेरिका शुरू से ही भारत पर अपनी शर्तों के अनुसार डील करने का दबाव बनाता रहा है. इसके जवाब में भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने का रुख अपनाया है. अब  व्यापार वार्ता में अमेरिका टैरिफ कानून का एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है. ऐसे में अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए भारतीय वार्ताकारों को अतिरिक्त सतर्कता और रणनीति के साथ आगे बढ़ना होगा.

प्रभावित होंगे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंध

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है.  देश में प्रतिदिन लगभग 58 लाख बैरल तेल की खपत होती है, जिसमें करीब 52 लाख बैरल यानी लगभग 89 प्रतिशत तेल हमें आयात करना पड़ता है. चूंकि, हमारे पास पर्याप्त घरेलू तेल संसाधन नहीं हैं, इसलिए अपनी अर्थव्यवस्था को गतिमान रखने के लिए हमें हर हाल में कहीं-न-कहीं से तेल का आयात करना ही होगा. ऐसे में यदि अमेरिका भारत पर भारी टैरिफ लगाता है, तो इससे भारत की ऊर्जा जरूरतें तो प्रभावित होंगी ही और दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में भी कड़वाहट आयेगी.

तेल आयात के सुरक्षित विकल्प तलाशना जरूरी

भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की सख्त जरूरत है, लेकिन इसके व्यावहारिक पहलू को समझना भी जरूरी है. प्रकृति ने भारत को पर्याप्त तेल व प्राकृतिक गैस के भंडार नहीं दिये हैं. हालांकि, देश  में नवीकरणीय और वैकल्पिक ऊर्जा का विकास तेजी से हो रहा है, लेकिन अभी यह खनिज तेल का पूर्ण विकल्प नहीं बन सकते. इसलिए अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियां बनाते समय इस वास्तविकता को ध्यान में रखना होगा कि अगले 15-20 वर्षों तक तेल और गैस का पूरी तरह से कोई विकल्प संभव नहीं है. भारत को नवीकरणीय ऊर्जा के बुनियादी ढांचे को तेजी से मजबूत करना होगा, साथ ही तेल आयात के विविध और सुरक्षित विकल्प बनाये रखने होंगे.

ऐसा है भारत का वर्तमान ऊर्जा आयात ढांचा

  • दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कच्चे तेल के कुल निर्यात का लगभग आधा हिस्सा चीन ने खरीदा. इसके बाद 37 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत दूसरे स्थान पर रहा, जबकि तुर्की और यूरोपीय संघ ने क्रमश: 5  प्रतिशत तेल रूस से लिया सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के मुताबिक.
  • कतर की जगह अब अमेरिका भारत का सबसे बड़ा एलएनजी आपूर्तिकर्ता बन गया है. अगस्त 2026 में अमेरिका ने 0.859 एमएमटी यानी लगभग 35 प्रतिशत एलएनजी की आपूर्ति की, कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के अनुसार. अन्य आपूर्तिकर्ता नाइजीरिया, ओमान, यूएइ, मोजाम्बिक और ऑस्ट्रेलिया हैं. जुलाई में रिकॉर्ड 0.893  एमएमटी के बाद अगस्त में अमेरिका से 0.719 एमएमटी एलपीजी भारत पहुंची. सऊदी अरब से आपूर्ति लगातार दूसरे महीने ठप रहने के चलते भारत ने अल्जीरिया और अर्जेंटीना से स्पॉट-कॉन्ट्रैक्ट कार्गो खरीदकर इस कमी को पूरा किया.
  • अगस्त 2026 में रूस 2.08 मिलियन बैरल प्रति दिन आपूर्ति के साथ भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल निर्यातक बना रहा. इसके बाद यूएइ दूसरे और वेनेजुएला तीसरे स्थान पर रहे, जहां से भारत ने तेल आयात किया.

समझें नये अमेरिकी टैरिफ कानून की बारिकियां

यूक्रेन के कड़े समर्थक व रूस पर सख्त पाबंदियाें के पक्षधर रहे दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर बनाया गया 'लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल व गैस आयात करने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है.

पुतिन व रूसी अर्थव्यवस्था पर सीधा वार : इसमें केवल रूस से ऊर्जा आयात करने वाले देश ही निशाने पर नहीं, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, रूस के शीर्ष अधिकारियों, प्रमुख बैंकों और वित्तीय तंत्र पर सीधे कड़े प्रतिबंध लागू किये गये हैं.

'शैडो फ्लीट' पर नकेल : पिछले प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस जिन संदिग्ध शैडो फ्लीट (जहाजों का गुप्त नेटवर्क) का इस्तेमाल करता रहा है, उन पर भी इसके जरिये पूरी तरह पाबंदी लगा दी गयी है.

किन देशों को मिलेगी राहत : रूस से 15 प्रतिशत से कम प्राकृतिक गैस खरीदने वाले और रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम करने वाले देशों को इस टैरिफ से छूट मिल सकती है.

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