PM Modi @ 76: महिलाओं के लिए मोदी सरकार की योजनाओं और चुनौतियों की पूरी कहानी

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Cchavi Vasisht on PM Modi: Birthday Special

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मोदी सरकार के ‘विकसित भारत @2047’ विजन में महिलाओं की भूमिका को केवल कल्याणकारी योजनाओं की लाभार्थी तक सीमित न रखकर उन्हें आर्थिक गतिविधियों, उद्यमिता और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आगे लाने पर जोर दिया गया है. पिछले एक दशक में इस दिशा में कई योजनाएं शुरू हुईं या उनका विस्तार हुआ. लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, रोजगार की गुणवत्ता और बिना वेतन वाले घरेलू काम जैसे मोर्चों पर अभी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.

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भारत के विकास की कहानी में महिलाओं की भूमिका को लेकर नीति का फोकस पिछले कुछ वर्षों में बदला है. पहले सवाल मुख्य रूप से यह था कि महिलाओं तक सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे पहुंचे. अब इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया है कि महिलाएं कमाने वाली, उद्यमी, किसान, तकनीकी कामगार और राजनीतिक निर्णयकर्ता कैसे बनें.

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इसी सोच को केंद्र में रखते हुए सरकार ‘Women-Led Development’ को Viksit Bharat @2047 के बड़े लक्ष्यों से जोड़ती है. यानी 2047 तक विकसित भारत की कल्पना में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक भागीदारी को एक अहम घटक माना जा रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

बेटी के जन्म से शुरू होती है कहानी

इस मॉडल की शुरुआत बालिका के जन्म और शिक्षा से होती है. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना जनवरी 2015 में शुरू हुई थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर जन्म के समय लिंगानुपात 2014-15 के 918 से बढ़कर 2024-25 में 929 हो गया. इसी अवधि में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का सकल नामांकन अनुपात 75.51% से बढ़कर 80.2% हुआ.

इसी तरह सुकन्या समृद्धि योजना ने बेटियों के लिए छोटी बचत को दीर्घकालीन वित्तीय सुरक्षा से जोड़ने की कोशिश की. नवंबर 2024 तक इस योजना के तहत 4.2 करोड़ से अधिक खाते खोले जा चुके थे.

यानी नीति का पहला लक्ष्य यह है कि बेटी का जन्म, शिक्षा और भविष्य परिवार के लिए निवेश का विषय बने.

स्वास्थ्य: मातृत्व से आगे बढ़ती तस्वीर

महिला सशक्तीकरण का दूसरा आधार स्वास्थ्य है. भारत का मातृ मृत्यु अनुपात यानी Maternal Mortality Ratio (MMR) 2014-16 में प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 130 था, जो 2019-21 में घटकर 93 हो गया.

यह बदलाव केवल एक योजना का परिणाम मानना उचित नहीं होगा. मातृ स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव, पोषण, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं और राज्यों में स्वास्थ्य प्रणालियों के संयुक्त प्रभाव से ऐसे संकेतकों में बदलाव आता है.

लेकिन 93 का आंकड़ा यह भी बताता है कि लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है. भारत ने 2030 तक MMR को 70 से नीचे लाने का SDG लक्ष्य स्वीकार किया है.

शिक्षा से Skill तक: अगली चुनौती रोजगार की

महिलाओं के लिए शिक्षा के बाद अगला सवाल रोजगार और कौशल का है.

PLFS 2024 के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की महिलाओं का Labour Force Participation Rate यानी श्रमबल भागीदारी दर 41.7% थी. 2025 के वार्षिक PLFS में यह दर 40% दर्ज हुई.

इससे तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है. महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ी है, लेकिन केवल श्रमबल में शामिल होना पर्याप्त नहीं है. किस तरह का रोजगार मिल रहा है, आय कितनी है, नौकरी कितनी सुरक्षित है और सामाजिक सुरक्षा कितनी उपलब्ध है- ये सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

यही वजह है कि Skill India, PMKVY और महिला-केंद्रित कौशल पहलों को रोजगार की वास्तविक मांग से जोड़ना आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती होगी.

Lakhpati Didi: महिला SHG से महिला उद्यमी तक

ग्रामीण भारत में महिला आर्थिक सशक्तीकरण की सबसे बड़ी कहानियों में से एक Self-Help Groups यानी SHGs की है.

DAY-NRLM के तहत करोड़ों ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं. जून 2026 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, SHG नेटवर्क में 10 करोड़ से अधिक महिलाएं संगठित थीं.

इसी नेटवर्क को Lakhpati Didi अभियान से जोड़ा गया है. इसका उद्देश्य ऐसी ग्रामीण महिलाओं की संख्या बढ़ाना है जिनकी वार्षिक घरेलू आय में उनकी आजीविका से कम से कम एक लाख रुपये की स्थायी आय का योगदान हो.

सरकार ने दिसंबर 2025 तक 3 करोड़ Lakhpati Didis का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की. अब लक्ष्य 2029 तक इसे बढ़ाकर 6 करोड़ करने का है.

यहां बदलाव केवल आय का नहीं है. SHG मॉडल के जरिए बैंकिंग, ऋण, कौशल, बाजार और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश भी की जा रही है.

Cchavi Vasisht
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Drone Didi से Digital Didi तक

महिला उद्यमिता को पारंपरिक कामों से आगे ले जाने की कोशिश भी दिखाई देती है.

NaMo Drone Didi जैसी पहल में महिला SHGs को कृषि में ड्रोन सेवाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया. सरकार ने 15,000 चयनित महिला SHGs को ड्रोन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा था.

इसका प्रतीकात्मक महत्व भी है—ग्रामीण महिला को केवल स्वयं सहायता समूह की सदस्य नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी आधारित सेवा देने वाली उद्यमी के रूप में देखने की कोशिश.

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बैंक खाता, ऋण और आर्थिक पहचान

महिला सशक्तीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वित्तीय समावेशन है. बैंक खाता, डिजिटल भुगतान, SHG बैंक क्रेडिट और छोटे कारोबार के लिए ऋण महिलाओं को आर्थिक निर्णयों में अधिक स्वतंत्रता दे सकते हैं.

DAY-NRLM से जुड़े SHGs ने अब तक ₹12 लाख करोड़ से अधिक बैंक क्रेडिट तक पहुंच बनाई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 50 हजार से अधिक प्रशिक्षित Bank Sakhis ग्रामीण महिलाओं को बैंकिंग सेवाओं और ऋण तक पहुंच में मदद कर रही हैं.

इसका असर केवल एक महिला की आय तक सीमित नहीं रहता. जब महिला की अपनी आर्थिक पहचान मजबूत होती है तो परिवार के खर्च, बच्चों की शिक्षा और स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी उसका प्रभाव बढ़ सकता है.

सुरक्षा और गरिमा भी विकास का हिस्सा

महिला-नेतृत्व वाले विकास का अर्थ केवल रोजगार नहीं है. सुरक्षा, कानूनी अधिकार और गरिमा भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं.

Mission Shakti के तहत One Stop Centres, Women Helpline और अन्य सहायता तंत्र चलाए जा रहे हैं. इसी व्यापक नीति ढांचे में महिलाओं की सुरक्षा और सहायता को जोड़ा गया है.

2019 में मुस्लिम महिलाओं के लिए instant triple talaq की प्रथा को कानूनी रूप से अपराध घोषित करने वाला कानून भी लागू हुआ. सरकार इसे महिलाओं के अधिकार और गरिमा से जुड़ा सुधार बताती है.

राजनीति में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व: लेकिन लागू होने की तारीख अभी बाकी

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के बाद सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का है.

2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया. इसके तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान है.

हालांकि यह प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू नहीं हुआ. कानून के अनुसार इसका क्रियान्वयन संबंधित जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा है.

इसलिए महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में अगला बड़ा पड़ाव कानून का वास्तविक क्रियान्वयन होगा.

लेकिन असली चुनौती यहीं से शुरू होती है

महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े बढ़ने के बावजूद कुछ बुनियादी समस्याएं अभी बनी हुई हैं.

  1. सबसे पहला सवाल रोजगार की गुणवत्ता का है. श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में महिलाएं अनौपचारिक, अस्थायी या कम सामाजिक सुरक्षा वाले कामों में रहती हैं.
  2. दूसरा सवाल है—कौशल और नौकरी के बीच का अंतर. प्रशिक्षण तभी प्रभावी होगा जब वह बाजार की वास्तविक मांग, बेहतर वेतन और करियर की संभावनाओं से जुड़ा हो.
  3. तीसरी और अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली चुनौती है unpaid care work.

भारत के Time Use Survey 2019 के अनुसार घरेलू सदस्यों के लिए बिना भुगतान वाले घरेलू कामों में महिलाओं का समय पुरुषों की तुलना में काफी अधिक था. खाना बनाने और भोजन प्रबंधन जैसे कामों में भी महिलाओं का औसत समय पुरुषों से कहीं अधिक दर्ज किया गया.

यानी यदि महिला के पास नौकरी है, तब भी उसके घर के भीतर काम का बड़ा हिस्सा अक्सर बना रहता है.

अगला चरण: योजना से परिणाम तक

इसलिए 2047 की महिला-नेतृत्व वाली विकास यात्रा का अगला सवाल केवल यह नहीं होगा कि कितनी महिलाओं को योजना का लाभ मिला?

सवाल यह होगा—

कितनी महिलाएं स्थायी आय अर्जित कर रही हैं? कितनी महिलाएं formal jobs में पहुंच रही हैं? कितनी महिला उद्यमी बाजार से जुड़ पा रही हैं? कितनी महिलाओं के पास सामाजिक सुरक्षा है? और कितनी महिलाएं परिवार से लेकर संसद तक वास्तविक निर्णय लेने की स्थिति में पहुंच रही हैं?

यही वह अंतर है जो women-centric welfare और women-led development के बीच है.

प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर ‘नारी शक्ति’ और ‘विकसित भारत 2047’ की चर्चा इसलिए केवल योजनाओं की सूची नहीं है. यह भारत की विकास रणनीति के उस बदलाव को समझने का अवसर है जिसमें महिला को विकास की लाभार्थी के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की भागीदार के रूप में देखा जा रहा है.

आने वाले वर्षों में इस दृष्टिकोण की वास्तविक परीक्षा योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि महिलाओं की आय, रोजगार की गुणवत्ता, आर्थिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और निर्णय लेने की शक्ति में होने वाले ठोस बदलाव से होगी.

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