दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइए, सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक इन दिनों Gen Z ट्रेंड में हैं. सोशल मीडिया हो, न्यूज़ चैनल हों या फिर सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन, हर जगह इसी पीढ़ी की बात हो रही है.दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के हालिया प्रदर्शन के बाद भारत में Gen Z की सामाजिक और राजनीतिक भूमिका पर बहस हो रही है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या आने वाले वर्षों में यह पीढ़ी देश की राजनीति की दिशा तय करेगी? क्या Gen Z सिर्फ सोशल मीडिया और सड़क तक सीमित रहेगा या अब सत्ता और नीतियों पर भी उसका प्रभाव पड़ने वाला है?ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प है कि दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल भारत में Gen Z की मौजूदा राजनीतिक भागीदारी कितनी है. संसद और राज्यों की विधानसभाओं में उनकी मौजूदगी कितनी है, और क्या यह पीढ़ी भारतीय राजनीति का नया चेहरा बनने की ओर बढ़ रही है?भारत की राजनीति में युवाओं की कितनी है हिस्सेदारी?सोचिए, अगर देश की सबसे बड़ी आबादी युवाओं की हो, लेकिन संसद और विधानसभाओं में उनकी मौजूदगी गिनती की हो, तो क्या उनके मुद्दों को उतनी ही गंभीरता मिलेगी जितनी मिलनी चाहिए?बीते कुछ वर्षों में देश की सड़कों पर होने वाले विरोध-प्रदर्शनों, सोशल मीडिया अभियानों, स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल इनोवेशन और नए सामाजिक विमर्शों में युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी है.हालिया विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी यह बदलाव दिखाई दिया है कि लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी अभियानों का केंद्र युवाओं को बनाया.लेकिन जब बात संसद और राज्य विधानसभाओं की आती है, तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आती है. एक ओर देश की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, वहीं दूसरी ओर कानून और नीतियां बनाने वाली संस्थाओं में उनकी मौजूदगी बेहद सीमित है.संसद और विधान सभा में कितनी है युवाओं खासकर Gen Z की हिस्सेदारी...निर्वाचन आयोग और जनसंख्या आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश की 25.8% आबादी वाले Gen Z युवाओं की राजनीति में हिस्सेदारी मात्र 1.6% है.क्या सिर्फ बड़ी आबादी होने से राजनीति में ताकत मिल जाती है?Gen Z की संख्या लगातार बढ़ रही है और यह पीढ़ी अब सिर्फ वोट डालने तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, हर बड़े मुद्दे पर उसकी मौजूदगी साफ दिखाई देती है. लेकिन क्या सिर्फ आबादी ज्यादा होने से संसद और विधानसभाओं में भी उनकी हिस्सेदारी बढ़ जाएगी?इसका जवाब है,यह इतना आसान नहीं है.राजनीति में जगह बनाने के लिए सिर्फ वायरल होना या लाखों फॉलोअर्स होना काफी नहीं होता. बल्कि चुनाव जीतने के लिए मजबूत संगठन, जमीनी पकड़, वर्षों का काम, संसाधन और सबसे जरूरी है लोगों का भरोसा.राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत की राजनीति आज भी काफी हद तक अनुभव और जीतने की क्षमता पर चलती है. इसलिए पार्टियां अक्सर उन्हीं उम्मीदवारों को टिकट देती हैं जिनकी इलाके में मजबूत पकड़ हो या जिनका चुनावी रिकॉर्ड बेहतर हो.लेकिन तस्वीर भी बदल रही है...पिछले कुछ वर्षों में कई राजनीतिक दलों ने अपने युवा संगठनों को मजबूत किया है और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नए चेहरों को आगे लाने की कोशिश की है. वहीं छात्र राजनीति, पंचायत, नगर निकाय और स्थानीय निकायों में भी युवाओं की भागीदारी पहले के मुकाबले बढ़ी है. यही मंच आगे चलकर विधानसभा और संसद तक पहुंचने की सीढ़ी बन सकते हैं.राजनीति में Gen Z की एंट्री मुश्किल क्यों है?जब देश में युवाओं की आबादी इतनी बड़ी है, तो फिर संसद और विधानसभाओं में उनकी संख्या इतनी कम क्यों दिखती है? इसका कोई एक जवाब नहीं है. इसके पीछे कई वजहें हैं.पहला कारण तो नियम है जो रास्ता रोक देते हैंभारत में लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 25 साल की उम्र होना जरूरी है. यानी Gen Z का एक बड़ा हिस्सा अभी चुनाव लड़ने के लिए पात्र ही नहीं है. ऐसे में उनकी संख्या कम दिखना स्वाभाविक है.सिर्फ वायरल होने से चुनाव नहीं जीते जातेसोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होना एक बात है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए जमीनी नेटवर्क, संगठन, कार्यकर्ताओं की टीम और मेहनत चाहिए होती है. राजनीति में एंट्री सिर्फ लोकप्रियता से नहीं, बल्कि लगातार लोगों के बीच काम करने से मिलती है. यही वजह है कि ज्यादातर युवाओं के लिए यह सफर आसान नहीं होता.पार्टियां भी सेफ खेलती हैंभले ही पार्टीयों द्वारा युवाओं को लेकर तमाम तरह की बात कही जाती हों, लेकिन जब टिकट बांटने की बात आती है तो वो ऐसे उम्मीदवारों पर दांव लगाते हैं जिनकी जीत की संभावना ज्यादा हो. इसलिए अक्सर अनुभवी नेताओं या पहले से पहचान बना चुके चेहरों को प्राथमिकता मिलती है. और नए और युवा चेहरों को मौका मिलने की संभावना कम होती है.राजनीति में कनेक्शन भी मायने रखते हैंभारतीय राजनीति में परिवारवाद पर लंबे समय से बहस होती रही है. कई युवा नेता ऐसे हैं जिनके परिवार पहले से राजनीति में रहे हैं. इससे उन्हें पहचान, संगठन और संसाधनों का फायदा मिल जाता है. हालांकि यह तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है.तो आने वाले समय में क्यों बढ़ सकती है Gen Z की हिस्सेदारी?असल में Gen Z का बड़ा हिस्सा अभी राजनीति की शुरुआती दहलीज पर है. कई युवा हाल के वर्षों में ही वोटर बने हैं और आने वाले समय में ये 25 साल की उम्र पूरी करेंगे, यानी चुनाव लड़ने के योग्य हो जाएंगे. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनकी राजनीतिक दावेदारी भी बढ़ेगी.दूसरी ओर, रोजगार, बेहतर शिक्षा, स्टार्टअप, AI, डिजिटल इकॉनमी, क्लाइमेट चेंज और मेंटल हेल्थ जैसे मुद्दे अब चुनावी बहस का हिस्सा बन चुके हैं. जो दिखाता है कि राजनीतिक दल भी समझ चुके हैं कि युवाओं को नजरअंदाज करना आसान नहीं है.हालांकि यह बदलाव कितनी तेजी से होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि राजनीतिक दल नए चेहरों को कितना मौका देते हैं, चुनाव लड़ना कितना सुलभ बनता है और मतदाता युवा उम्मीदवारों पर कितना भरोसा जताते हैं.फिलहाल जो तस्वीर है उसका संकेत ये है कि Gen Z का राजनीतिक प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है. लेकिन आबादी के मुकाबले संसद और विधानसभाओं में उनकी मौजूदगी अभी भी काफी कम है.