पॉटी और सीमेंट मिलाकर ज्यादा मजबूत बनाया जा सकता है घर? जानिए इस अनोखी रिसर्च का पूरा विज्ञान

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जयपुर के वैज्ञानिकों ने मानव पॉटी से बने बायोचार का उपयोग करके कंक्रीट को पहले से कहीं ज्यादा मजबूत बनाने का तरीका खोज निकाला है. जानें कैसे यह तकनीक सीमेंट की खपत कम कर सकती है और इससे ज्यादा मजबूत बनाया जा सकता है घर

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पॉटी को कचरा समझकर फेंकने के बजाय अगर उससे कंक्रीट को मजबूत करने वाला पदार्थ बनाया जा सके तो? घर कितना मजबूत हो सकता है. सुनने में अजीब जरूर लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इसी आइडिया को लैब में टेस्ट किया है. जयपुर की मणिपाल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने फीकल स्लज से बना बायोचार कंक्रीट में मिलाकर देखा और कुछ मिश्रणों में मजबूती बढ़ती हुई पाई. यह शोध सितंबर 2026 में साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुआ है.

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पहले समझिए, फीकल स्लज से बायोचार बनता कैसे है?

फीकल स्लज यानी सेप्टिक टैंक और सैनिटेशन सिस्टम से निकलने वाला मानव मल-मिश्रित ठोस अवशेष. शोध में इस्तेमाल सामग्री फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट से ली गई.

फीकल स्लज को आसान भाषा में सेप्टिक टैंक या शौचालय से निकलने वाला गाढ़ा मानव अपशिष्ट हैं. यानी जब घर के शौचालय का कचरा सीवर लाइन में जाने के बजाय सेप्टिक टैंक में जमा होता है, तो उसमें पॉटी, पानी और दूसरे पदार्थ मिलकर जो गाढ़ा कचरा बनाते हैं, उसे फीकल स्लज कहा जाता है.
सैनिटेशन सिस्टम यानी शौचालय और मानव मल-मूत्र को सुरक्षित तरीके से इकट्ठा करके, उसका निपटारा करने और उसे साफ करने की पूरी व्यवस्था.

इसे सुखाने के बाद बहुत कम ऑक्सीजन वाले माहौल में करीब 350 से 450 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म किया गया. इस प्रक्रिया को पायरोलिसिस कहते हैं. इससे कार्बन से भरपूर और छिद्रयुक्त पदार्थ तैयार हुआ, जिसे बारीक पाउडर में बदलकर कंक्रीट में इस्तेमाल किया गया.

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कंक्रीट में मिलाने पर क्या हुआ?

  • शोधकर्ताओं ने सीमेंट के एक हिस्से की जगह 5%, 10% और 15% बायोचार इस्तेमाल किया और अलग-अलग परीक्षण किए.
  • 91 दिन तक क्योरिंग के बाद 5% बायोचार वाले मिश्रण में कम्प्रेसिव स्ट्रेन्थ करीब 20% और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ करीब 36% ज्यादा दर्ज हुई. 10% बायोचार वाले मिश्रण में कम्प्रेसिव स्ट्रेन्थ करीब 21% और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ 42% तक बढ़ी.
  • इसके पीछे एक वजह बायोचार की छिद्रयुक्त संरचना हो सकती है. इसके छोटे-छोटे छेद पानी को अपने अंदर रोक सकते हैं और बाद में धीरे-धीरे छोड़ सकते हैं.
  • इससे सीमेंट के हाइड्रेशन यानी मजबूती पैदा करने वाली रासायनिक प्रक्रिया को मदद मिल सकती है. बायोचार में मौजूद सिलिका भी अतिरिक्त बंधनकारी यौगिक बनने में भूमिका निभा सकती है.

तो क्या अब इससे घर और पुल बनने लगेंगे?

  • अभी नहीं, रिसर्च फिलहाल प्रयोगशाला स्तर का अध्ययन है. 15% बायोचार पर मजबूती घटने और ज्यादा छिद्र व माइक्रो-क्रैक जैसी समस्याएं भी देखी गईं.
  • असल निर्माण में इस्तेमाल से पहले लंबे समय की टिकाऊपन, तापमान, नमक के संपर्क, अलग-अलग मौसम, पानी के असर और संभावित भारी धातुओं के रिसाव जैसे पहलुओं की और जांच जरूरी होगी.

फिर भी आइडिया अहम है. अगर आगे के परीक्षण सफल रहे तो एक तरफ सीमेंट की खपत और उससे जुड़े पर्यावरणीय दबाव को कुछ हद तक कम करने का रास्ता खुल सकता है, वहीं मानव अपशिष्ट के सुरक्षित प्रबंधन के लिए भी एक नया उपयोग सामने आ सकता है. फिलहाल इसे संभावनाओं वाली तकनीक कहना ज्यादा सही है, तैयार निर्माण सामग्री कहना नहीं.

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