मुख्तार अब्बास नकवी का हामिद अंसारी को जवाब- भारत में हिंदू बहुसंख्यक इसलिए देश सेक्यूलर, भ्रम फैलाने की कोशिश गलत
हामिद अंसारी और मुख्तार अब्बास नकवी, फोटो- एएनआई
Mukhtar Abbas Naqvi on Hamid Ansari: पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के बयान पर अब राजनीति तेज हो गयी है. भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोग यहां साथ रहते हैं और समाज में फर्क या बंटवारा पैदा करने की कोशिश सफल नहीं होगी.
Mukhtar Abbas Naqvi on Hamid Ansari: पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी के राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता को लेकर दिए बयान पर भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. नकवी ने कहा कि विभाजन के बाद भारत ने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ने का रास्ता चुना, जहां अलग-अलग धर्मों के लोग साथ रहते हैं. उन्होंने कहा कि समाज में फर्क और विभाजन पैदा करने की कोशिश करने वाले अपने मकसद में सफल नहीं होंगे. न्यूज एजेंसी एएनआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक मुख्तार अब्बास नकवी ने हामिद अंसारी के बयान पर कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग साथ रहते हैं.
विभाजन के बाद भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बना, जहां अलग-अलग धर्मों के लोग साथ रहते हैं. जो लोग समाज में फर्क और विभाजन पैदा करने की कोशिश करेंगे, वे अपने एजेंडे में सफल नहीं होंगे- भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी
हामिद अंसारी ने क्या कहा था?
इससे पहले हामिद अंसारी ने 18 सितंबर को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित तीसरे एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में हिस्सा लिया था. कार्यक्रम में उन्होंने दिवंगत संवैधानिक विशेषज्ञ और लेखक अब्दुल गफूर नूरानी के काम और उनके विचारों का जिक्र किया. अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित किताब The RSS: A Menace to India का जिक्र करते हुए नेहरू के नाम से दर्ज उस टिप्पणी को दोहराया, जिसमें भारत के लिए खतरे को साम्यवाद के बजाय हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से जोड़ा गया था.
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भी बोले अंसारी
अपने भाषण में हामिद अंसारी ने नागरिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां सामने आई हैं जो नागरिक राष्ट्रवाद के स्थापित सिद्धांत को चुनौती देती हैं. अंसारी के मुताबिक ऐसी प्रवृत्तियां चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में पेश करने, नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर अंतर पैदा करने और असुरक्षा बढ़ाने का कारण बन सकती हैं. उन्होंने कहा कि इन प्रवृत्तियों का कानूनी और राजनीतिक तरीके से मुकाबला किया जाना चाहिए.
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