कुर्सी पर कपड़े रखने की आदत क्यों नहीं छूटती? जानिए इसके पीछे की साइकोलॉजी

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PC: कपड़ों से भरी कुर्सी (AI Generated)

Clothes on Chair Psychology: क्या आपके घर में भी कुर्सी पर कपड़ों का पहाड़ बनता है? जानिए कपड़ों को अलमारी में न रखकर टालने के पीछे इंसान के दिमाग और साइकोलॉजी से जुड़ी वजह.

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Clothes on Chair Psychology: घर में एक ऐसी कुर्सी या जगह जरूर होती है, जिस पर कपड़े जमा होते चले जाते हैं. कभी पहनी हुई जींस, कभी टी-शर्ट, कभी दुपट्टा तो कभी तौलिया. इन कपड़ों को न तो पूरी तरह गंदा मानकर लॉन्ड्री में डाला जाता है और न ही वापस अलमारी में रखा जाता है. बस कुर्सी पर रख दिया जाता है और फिर धीरे-धीरे वह कपड़ों का ढेर बन जाती है.

अगर आपके घर में भी ऐसी ‘कपड़ों वाली कुर्सी’ है, तो आप अकेले नहीं हैं. इसके पीछे हमारी रोजमर्रा की आदतों और दिमाग के काम करने के तरीके से जुड़ी कुछ दिलचस्प वजहें (Clothes on Chair Psychology) हो सकती हैं. आइए जानते हैं कि इसके पीछे साइकोलॉजी क्या है. 

PC: AI Generated
PC: AI Generated

कपड़े न साफ, न गंदे, तो कहां जाएं?

कई बार कोई कपड़ा सिर्फ कुछ घंटों के लिए पहना गया होता है और उस पर कोई दाग या गंदगी भी नहीं होती. ऐसे में उसे तुरंत धोने के लिए डालना बेकार लगता है. वहीं उसे दोबारा अलमारी में रखने में भी मन नहीं करता. बस यहीं से कुर्सी काम आती है.

दिमाग को लगता है कि कपड़े को थोड़ी देर के लिए यहां रख देते हैं, बाद में तय करेंगे. लेकिन यही ‘बाद में’ कई दिनों तक चलता रहता है और कुर्सी पर कपड़ों का ढेर बढ़ता जाता है. 

छोटी मेहनत से बचने की आदत

कपड़े अलमारी में रखने का काम भले ही बहुत छोटा हो, लेकिन इसमें कुछ कदम शामिल होते हैं. कपड़ा उठाना, उसे तह करना और सही जगह रखना. जब हम थके हुए होते हैं या किसी दूसरे काम में व्यस्त होते हैं, तो दिमाग सबसे आसान रास्ता चुनता है. कुर्सी पर कपड़े डालना (Clothes on Chair Psychology) तुरंत हो जाता है. इसलिए उस समय यह काम आसान लगता है. समस्या तब होती है, जब ऐसे छोटे-छोटे फैसले रोज जमा होने लगते हैं. 

दिमाग कहता है ‘अभी नहीं, बाद में’ 

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में कई काम ऐसे होते हैं जिन्हें हम टालते रहते हैं. कपड़े व्यवस्थित करना भी उनमें से एक हो सकता है. जब कोई काम बहुत जरूरी नहीं लगता, तो दिमाग उसे तुरंत करने के बजाय बाद के लिए छोड़ देता है.

एक कपड़ा रखा, फिर दूसरा रखा और देखते ही देखते कुर्सी भर गई. हर बार कपड़ा रखते समय लगता है कि बाद में सब एक साथ व्यवस्थित कर देंगे. लेकिन वह ‘बाद में’ अक्सर आता ही नहीं है. 

Clothes on Chair Psychology: थकान का भी हो सकता है असर

दिनभर काम करने के बाद घर लौटने पर हर कोई कपड़ों को व्यवस्थित करने के मूड में नहीं होता. कपड़े बदलने के बाद उन्हें अलमारी में रखने के बजाय कुर्सी पर रख देना उस वक्त ज्यादा आसान ऑप्शन लगता है. खासकर जब दिन बहुत व्यस्त रहा हो, तो दिमाग छोटी-छोटी चीजों पर कम ऊर्जा खर्च करना चाहता है. इसलिए कपड़ों को वहीं छोड़ देना एक आसान शॉर्टकट बन जाता है. 

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स्मिता दे

लेखक के बारे में

By स्मिता दे

स्मिता दे प्रभात खबर में डिजिटल कंटेंट क्रिएटर के तौर पर काम कर रही हैं. बुक्स पढ़ना, डांसिंग और ट्रैवलिंग इनकी रुचि है. ये लाइफस्टाइल, फूड, हेल्थ और ट्रेंडिंग टॉपिक्स कवर करती है. रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी उपयोगी और रोचक जानकारी रीडर्स तक पहुंचाना इन्हें पसंद है.

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