30 दिन की सैलरी 10 दिन में खत्म? 50/30/20 फॉर्मूले से ऐसे सेट करें अपना मंथली बजट

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जार में सिक्के डालता एक हाथ (Photo: Freepik)

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क्या आपकी 30 दिन की सैलरी 10 दिन में खत्म हो जाती है? जानिए 50/30/20 फॉर्मूला और खर्च, बचत व निवेश को सही तरीके से मैनेज करने का तरीका.

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Budgeting Tips: आज के दौर में महंगाई और तेजी से बदलते लाइफस्टाइल के बीच महीने के आखिर तक सैलरी बचाना एक बड़ा चैलेंज बन चुका है. चाहे आप दिल्ली-मुंबई जैसे मेट्रो शहर में रहते हों या रांची और पटना जैसे टियर-2 शहरों में, बिना सही फाइनेंशियल प्लानिंग के पैसे पानी की तरह बह जाते हैं.

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ऐसे में '50/30/20 बजटिंग रूल' एक आसान और सबसे कारगर रास्ता है. यह फार्मूला बताता है कि आपको अपनी मंथली इन-हैंड सैलरी को तीन हिस्सों में कैसे बांटना चाहिए, ताकि आपकी जरूरतें भी पूरी हों और बचत भी बनी रहे.

क्या है 50/30/20 रूल और यह कैसे काम करता है?

50/30/20 रूल एक पर्सनल फाइनेंस फ्रेमवर्क है, जिसे हार्वर्ड की बैंकरप्सी एक्सपर्ट और यूएस सेनेटर एलिजाबेथ वारेन ने अपनी किताब ऑल योर वर्थ: द अल्टीमेट लाइफटाइम मनी प्लान (Elizabeth Warren, All Your Worth: The Ultimate Lifetime Money Plan) में पॉपुलर किया था. इस नियम के मुताबिक आपको अपनी नेट (टैक्स कटने के बाद) सैलरी को 3 हिस्सों में बांटना होता है:

  • 50% जरूरतें (Needs): सैलरी का आधा हिस्सा उन चीजों पर खर्च होता है जिनके बिना काम नहीं चल सकता. जैसे घर का किराया, राशन, बिजली-पानी के बिल, बच्चों की फीस और इंश्योरेंस.
  • 30% चाहतें (Wants): यह हिस्सा आपकी खुशियों और लाइफस्टाइल के लिए है. जैसे वीकेंड पर बाहर खाना, फिल्में, शॉपिंग, ओटीटी सब्सक्रिप्शन या घूमना-फिरना.
  • 20% बचत और निवेश (Savings): यह हिस्सा आपके भविष्य को सुरक्षित करता है. इससे इमरजेंसी फंड बनाएं, पीपीएफ (PPF), एसआईपी (SIP/Mutual Funds) या एफडी (FD) में इन्वेस्ट करें, और पुराने लोन की किस्तों का भुगतान करें.

टियर-2 और मेट्रो शहरों में यह रूल अलग कैसे हो जाता है?

मेट्रो और टियर-2 शहरों में रहन-सहन का खर्च बिल्कुल अलग होता है. इसलिए 50/30/20 रूल को अपने शहर के हिसाब से थोड़ा एडजस्ट करना पड़ता है:

खर्च का हिस्सामेट्रो शहर (जैसे- मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु)टियर-2 शहर (जैसे- रांची, पटना, लखनऊ)
जरूरतें (Needs)55-60%: मेट्रो में रेंट और ट्रैवल कॉस्ट काफी ज्यादा होती है.40-45%: यहां रेंट और लोकल ट्रांसपोर्ट सस्ता होता है.
चाहतें (Wants)20-25%: ज्यादा फिक्स्ड खर्चों के कारण यहां लाइफस्टाइल खर्च कम करना पड़ता है.30-35%: जरूरतें कम होने से यहां गैर-जरूरी या शौक के खर्चों का दायरा ज्यादा रहता है.
बचत (Savings)20% (न्यूनतम): मेट्रो में कम से कम 20% बचाना जरूरी है.25-30%: कम लिविंग कॉस्ट का फायदा उठाकर ज्यादा इन्वेस्ट किया जा सकता है.

कैसे करें इस रूल की शुरुआत अपने डेली रूटीन में?

इस रूल को फॉलो करना बेहद आसान है. बस इन तीन स्टेप्स से शुरुआत करें:

  1. इन-हैंड सैलरी कैलकुलेट करें: सबसे पहले अपनी इन-हैंड सैलरी देखें (टैक्स और पीएफ कटने के बाद मिली राशि).
  2. फिक्स्ड खर्चों की लिस्ट बनाएं: अपने महीने के फिक्स्ड खर्चों (जरूरतों) को अलग करें. अगर मेट्रो में रेंट की वजह से यह 50% से ऊपर जा रहा है, तो बचत से समझौता न करें, बल्कि अपनी चाहतों (शॉपिंग/घूमने) वाले हिस्से में कटौती करें.
  3. पहले बचत, फिर खर्च: सैलरी आते ही सबसे पहले 20% हिस्सा एसआईपी या सेविंग्स अकाउंट में भेज दें, उसके बाद बाकी 80% में महीने का खर्च चलाएं.

यह रूल आपको बिना किसी तनाव के पैसे मैनेज करने और एक मजबूत फाइनेंशियल सिक्योरिटी बनाने में मदद करता है.

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