दुनिया की सप्लाई चेन बदल रही है, क्या भारत बन सकता है नया ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब?
मैन्युफैक्चरिंग हब (सांकेतिक तस्वीर)
चीन से इतर सप्लाई चेन का विस्तार हो रहा है, और भारत के पास मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी भूमिका निभाने का सुनहरा अवसर है. FDI में उछाल और निर्यात वृद्धि के आंकड़ों के बीच भारत के लिए आगे बढ़ने की राह कैसी है, जानें.
चीन पर निर्भरता कम करने और सप्लाई चेन को अलग-अलग देशों में फैलाने की कोशिशों के बीच भारत के लिए मैन्युफैक्चरिंग में बड़ी भूमिका हासिल करने का मौका बना है. UNCTAD के मुताबिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी यूरोप और मध्य अमेरिका की ओर भी शिफ्ट कर रही हैं.
2025 में वैश्विक FDI 14% बढ़कर करीब 1.6 ट्रिलियन डॉलर हुआ, लेकिन UNCTAD ने चेताया कि वास्तविक निवेश गतिविधि अभी भी कमजोर है और निवेश तेजी से रणनीतिक क्षेत्रों में केंद्रित हो रहा है.
भारत के पक्ष में क्या आंकड़े हैं?
भारत के लिए सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत FDI में तेजी है. UNCTAD की 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में भारत में FDI inflows (विदेश से आने वाला निवेश) 44% बढ़कर करीब 39 अरब डॉलर हो गए. दक्षिण एशिया में FDI 34 अरब डॉलर से बढ़कर 46 अरब डॉलर पहुंचा और इस वृद्धि की मुख्य वजह भारत रहा.
भारत का निर्यात आधार भी लगातार बड़ा हो रहा है. वाणिज्य मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 के मुताबिक 2024-25 में भारत का merchandise exports (सामान का विदेशों में निर्यात) 437.70 अरब डॉलर रहा. वहीं, सरकारी Trade Analytics के आंकड़ों में 2026 के शुरुआती महीनों में इंजीनियरिंग गुड्स के निर्यात में भी वृद्धि दर्ज की गई है. जनवरी-मई 2026 में इंजीनियरिंग गुड्स का निर्यात करीब 54.13 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल की समान अवधि से 10.87% अधिक है.
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चीन और वियतनाम से अभी कितना पीछे है भारत?
विश्व बैंक के मुताबिक भारत की Global Value Chain (GVC) से जुड़ी ट्रेड हिस्सेदारी 2022 में करीब 40% थी, जबकि वियतनाम में यह 63% थी. यानी वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में भारत की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन वह अभी वियतनाम जैसे निर्यात मैन्युफैक्चरिंग हब के स्तर पर नहीं पहुंचा है. विश्व बैंक ने भी कहा है कि भारत को GVC का अहम हिस्सा बनने के लिए चीन, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों के बराबरी के लिए सुधार तेज करने होंगे.
मैन्युफैक्चरिंग का GDP में योगदान क्या बताता है?
विश्व बैंक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार भारत की GDP में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की हिस्सेदारी करीब 13% है, जबकि चीन में यह करीब 24% है. भारत में 2025 में विनिर्माण क्षेत्र से जुड़ी कुल आर्थिक गतिविधि का मूल्य करीब 533 अरब डॉलर रहा, यानी भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार और उत्पादन क्षमता तो है, लेकिन चीन की तरह बड़ा और मजबूत उत्पादन से जुड़ा पूरा नेटवर्क अभी तैयार नहीं हुआ है.
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‘China+1’ से भारत को कितना फायदा?
दुनिया की कंपनियां अब पूरी सप्लाई चेन को एक ही देश पर निर्भर रखने के बजाय कई देशों में उत्पादन बांटने की रणनीति अपना रही हैं. यही China+1 या सामान की सप्लाई के लिए एक ही देश पर निर्भरता कम करने का आधार है. UNCTAD के अनुसार 2024 में चीन में FDI में 29% गिरावट आई, जबकि ASEAN में FDI 10% बढ़कर रिकॉर्ड 225 अरब डॉलर पहुंचा. इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनियां चीन छोड़ रही हैं, बल्कि उत्पादन और निवेश के नए केंद्र भी विकसित किए जा रहे हैं.
भारत के पास इस बदलाव का फायदा उठाने के लिए बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, तेजी से बढ़ता डिजिटल और इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तथा इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में बढ़ती क्षमता है. सरकार ने देश में उत्पादन बढ़ाने के लिए PLI जैसी योजनाएं शुरू की हैं। इसके अलावा, कई मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए पहले से सरकार की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती.
अगर भारत लागत, लॉजिस्टिक्स, कौशल, तकनीक और निर्यात प्रतिस्पर्धा में सुधार करता है, तो China+1 रणनीति भारत को सिर्फ एक वैकल्पिक बाजार नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख मैनुफैक्चर हब में से एक बना सकती है.
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