चंपारण सत्याग्रह के सौ साल : धरती पे लड़ी तूने अजब ढंग की लड़ाई, दागी न कहीं तोप, न बंदूक चलायी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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यह कहानी चंपारण की 19 लाख प्रजा के दुख-दर्द की है, जिनकी पीढ़ियां ब्रिटिश नील प्लांटरों की तिजोरियां भरने में तबाह होकर रह गयी थीं. जिनके घरों में अनाज का एक दाना भी नहीं होता, फिर भी वे अपने खेतों में धान-चावल के बदले इन परदेसी साहबों के लिए बहुत कम मेहनताने पर नील की फसल उगाते थे. इतने पर भी उनके शोषकों का मन नहीं भरता, वे बात-बात पर उन पर टैक्स लगाते और लगान न चुकाने पर उनकी खाल उधेड़ डालते. यह कहानी शेख गुलाब, शीतल राय, खेनहर राय, संत भगत और पीर मोहम्मद मूनिस जैसे अल्पज्ञात योद्धाओं की तो है ही, जिन्होंने अपना जीवन चंपारण के लोगों को इस शोषण से मुक्ति दिलाने में होम कर दिया. यह कहानी राजकुमार शुक्ल की है, जिन्हें मालूम था कि इस कष्ट से उन्हें एक ही व्यक्ति निजात दिला सकता है, उसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी है. और जिन्होंने गांधी को चंपारण बुलाने को ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया. अंततः यह कहानी उस महामानव की है, जिसने दुनिया को अहिंसा और सत्याग्रह जैसे हथियार दिये और इन हथियारों का आविष्कार इसी चंपारण की धरती पर हुआ. आज उस आविष्कार के सौ साल पूरे होने पर यह गाथा आपके
लिए प्रस्तुत है
चंपारण और नील के धब्बे
पुष्यमित्र
वैसे तो यूरोपियन नील प्लांटर 18वीं सदी के आखिर से ही पूरे बंगाल प्रेसिडेंसी में (जिसमें बिहार के इलाके भी आते थे) नील की खेती शुरू कर दी थी. मगर 1857 की क्रांति के बाद चंपारण नील प्लांटरों का सबसे बड़ा ठिकाना बन गया, जब गांधी जी यहां पहुंचे, तो यहां 70 से अधिक नील की फैक्टरियां संचालित हो रही थीं. इस जिले के 2,220 गांवों में से 1,938 गांवों में अंगरेज प्लांटर नील की खेती करवाते थे. हर जगह तिनकठिया प्रणाली लागू थी और हर किसान को एक बीघा जमीन में से तीन कट्ठे पर इन प्लांटरों के लिए नील की खेती करनी पड़ती थी.
अपने इलाके के मालिक-मुख्तार होते थे नील प्लांटर
नील प्लांटर एक तरह से उस इलाके के मालिक मुख्तार हुआ करते थे. उन्होंने कर्ज में डूबे बेतिया राज से जमीन ठेके पर ले रखी थीं और जिस इलाके में वे खेती करवाते, वहां के राजा की हैसियत में रहते. ब्रिटिश सरकार ने भी इन्हें ऑनरेरी मजिस्ट्रेट का दर्जा दे रखा था. लिहाजा वे इन खेतों से अधिकतम फायदा निकालने की कोशिश करते और अपने फायदे के लिए किसानों की आमदनी में से एक-एक पाई वसूल लेते. उन पर तरह-तरह के टैक्स लगाते. जबरन नील की खेती करवाना. नील के बदले दूसरे फसल की खेती करवाना. मारपीट करना. जीरात जमीन पर मुफ्त में मजदूरी करवाना वगैरह तो नील प्लांटरों और उसके सिपाहियों के रोज के काम में शामिल थे. इससे तो लोग परेशान होते ही थे. इनके द्वारा साल भर तरह-तरह के अबवाब (टैक्स) वसूलने का सिस्टम कभी पहले से गरीब रैयतों की हड्डी पर मांस नहीं चढ़ने देता था. डॉ राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं कि चम्पारण में नील की खेती करनेवाले किसानों से 40 तरह के टैक्स वसूले जाते थे और अगर जुर्मानों की संख्या जोड़ दी जाये, तो यह संख्या 50 के पार चली जाती है.
1867 से ही संघर्षरत थे चंपारण के किसान : यही वजह है कि व्यावसायिक फसल होने के बावजूद यहां के किसान नील की खेती नहीं करना चाहते थे. 1867 से ही यहां के किसानों ने नील की खेती का विरोध करना शुरू कर दिया था. मगर वे सफल नहीं हो पाये. कभी अंगरेज नील का मेहनताना बढ़ा देते, तो कभी बल प्रयोग के जरिये विद्रोह को दबा देते. 1908 में चंपारण के किसानों ने एकजुट होकर बड़ा विद्रोह किया. शेख गुलाब और शीतल राय इस विद्रोह के नायक थे. उन लोगों ने पूरे इलाके में घूम-घूम कर रात में बैठकें की और किसानों को तैयार किये कि वे नील की खेती नहीं करेंगे.
बल प्रयोग से कुचल दिये गये कई आंदोलन
मगर इस मौके पर ब्रिटिश प्रशासन ने अपने स्वजातीय नील प्लांटरों का साथ दिया. इलाके में भारी फौज तैनात कर आंदोलन को कुचल दिया गया. इस विद्रोह की जांच करने चंपारण पहुंचे एक अंगरेज अधिकारी गोरले ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा है, इस विद्रोह से संबंधित 57 मामले बेतिया सब डिवीजन में दर्ज किये गये. 366 अभियुक्तों में से 266 किसानों को दोषी पाया गया. इनमें से 180 लोगों को दंगा या गैरकानूनी गतिविधि के लिए बैठक करने का दोषी करार दिया गया. 31 को आपराधिक गतिविधियों के लिए, 51 को भयादोहन के लिए, 15 लोगों को दूसरों को अपराध करने के लिए उकसाने और 10 को हत्या के प्रयास का दोषी पाया गया. एक यूरोपियन इंस्पेक्टर, 4 सब इंस्पेक्टर, 24 हेड कांस्टेबल और 240 कांस्टेबल की तैनाती बेतिया में की गयी और इनकी तैनाती के खर्च के रूप में 29,332 रुपये की वसूली किसानों से सामूहिक दंड के रूप में की गयी. ऐसे में चंपारण के किसानों को लगने लगा कि जब तक यहां का मुद्दा राष्ट्रीय फलक पर नहीं छायेगा, उन्हें इस दुष्चक्र से मुक्ति नहीं मिलेगी. इसी कोशिश में राजकुमार शुक्ल जैसे नेता अस्तित्व में आये. उन्होंने इस मामले को अदालतों, राजकीय परिषदों और अखबारों में पहुंचाया और अंत में गांधी जैसे नेता को यहां खींच लाये, जिनकी वजह से चंपारण को तिनकठिया प्रथा से मुक्ति मिली.
गांधी को महात्मा बनाने व चंपारण लानेवाले शुक्ला जी
भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना मजहरूल हक और ब्रजकिशोर प्रसाद जैसे नेताओं का जिक्र तो खूब करता है, मगर उस व्यक्ति का उल्लेख एक लाइन में करके भूल जाता है, जो भारत में इन तमाम बड़े नेताओं के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के लिए जिम्मेवार है. वे चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल ही थे, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका से लौट कर स्वदेश आये एक अल्पज्ञात भारतीय राजनेता को लगभग जबरदस्ती चंपारण बुलाया और उन्हें इस खेतिहर आंदोलन से जोड़ा. इसी के बाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का जुड़ाव आम लोगों और खास तौर पर ग्रामीण जनता से हुआ. उससे पहले कांग्रेस का काम सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करना और क्रिसमस की छुट्टियों में राष्ट्रीय अधिवेशन कर लेना भर था.
प्रण लिया कि खत्म करवा कर रहेंगे नील की खेती
यह चंपारण सत्याग्रह ही था कि राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद और मजहरूल हक जैसे नामी-गिरामी वकीलों का जुड़ाव स्वतंत्रता आंदोलन से हुआ और उनका पूरा जीवन बदल गया. अगर राजकुमार शुक्ल जबरन गांधी को चंपारण लेकर नहीं आये होते, तो यह सब होता भी तो किसी और रूप में होता. सतवरिया गांव के किसान राजकुमार शुक्ल स्वतंत्र व्यक्तित्व के स्वामी थे और यह बात उस इलाके के नील प्लांटर एसी एम्मन को खटकती थी. वे कई तरीके से राजकुमार शुक्ल को दबाने की कोशिश करते थे. उन्होंने शुक्ला जी की आलू की खेती उजाड़ दी. उन पर झूठा इल्जाम लगा कर तीन हफ्ते के लिए जेल की सजा करवा दी. इसके बाद राजकुमार शुक्ल ने प्रण कर लिया कि वे चंपारण से नील की खेती खत्म करवा कर ही दम लेंगे.
आंदोलन को राष्ट्रीय मंच पर लाने की करते रहे कोशिश
1908 के दमदार विद्रोह की असफलता ने उनके मन में यह बात डाल दी थी कि अगर नील की खेती को खत्म करावाना है, तो इसके लिए उन्हें चंपारण के किसानों के दुख-दर्द को राष्ट्रीय सवाल बनाना होगा. इसके लिए उन्होंने पहले किसानों की शिकायतों को मुकदमे का स्वरूप देकर मोतिहारी और पटना के अदालतों में केस दायर करवाना शुरू किया. इसमें उन्हें ब्रजकिशोर प्रसाद और राजेंद्र प्रसाद जैसे वकीलों का सहयोग मिलता था. मोतिहारी के वकील गोरख बाबू जो बिहारी अखबार के स्थानीय संवाददाता भी थे के जरिये उन्होंने किसानों के दुख-दर्द की बातों को अखबारों तक पहुंचाया. इसी क्रम में उनका परिचय कानपुर से प्रकाशित होनेवाले अखबार प्रताप के स्थानीय संवाददाता पीर मोहम्मद यूनिस से हुआ और उनके जरिये वे प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी तक पहुंचे.
गणेश शंकर विद्यार्थी ने बताया था गांधी के बारे में
कहते हैं, गणेश शंकर विद्यार्थी ही वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने राजकुमार शुक्ल को गांधी जी के बारे में बताया था और गांधी जी के बारे में जान कर उन्होंने तय कर लिया था कि वे हर हाल में उन्हें चंपारण बुला कर रहेंगे. राजकुमार शुक्ल ने गांधी जी को चंपारण लाने की कोशिश 1915 से ही शुरू कर दी थी, जिस साल गांधी भारत आये थे. पहले उन्होंने अहमदाबाद के आश्रम की यात्रा की, फिर 1916 के कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में जाकर उन्हें अपनी व्यथा सुनायी. गांधी जी का पीछा उन्होंने कानपुर तक किया. वहां गांधी जी ने स्वीकृति दी कि वे चंपारण के किसानों और नील प्लांटरों के विवाद की जांच करने तीन-चार दिनों के लिए चंपारण जायेंगे.
गांधी को शुक्ला जी ने ही कहा था महात्मा
इसके बाद भी राजकुमार शुक्ल लगे रहे. एक बार मार्च में गांधी जी ने स्वीकृति दी, तो राजकुमार शुक्ल समय से उपस्थित नहीं हो पाये. आखिरकार 10 अप्रैल को वे गांधी जी को बिहार लाने में सफल हो ही गये. उन्होंने तीन-चार दिनों का वक्त दिया था, मगर इतिहास गवाह है कि गांधी जी को यहां लगभग एक साल रहना पड़ा और उसके बाद तो न सिर्फ चंपारण बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम की दुनिया ही बदल गयी थी. हमें अहिंसा और सत्याग्रह के रूप में एक नया और कारगर हथियार मिल गया था. यह शुक्ला जी ही थे, जिन्होंने सबसे पहले गांधी को महात्मा कह कर संबोधित किया था, जो बाद में उनके नाम के साथ जुड़ गया.
चार दिनों के लिए आये
साल भर रह गये गांधी
इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि न सिर्फ गांधी ने चंपारण को तिनकठिया प्रथा से मुक्ति दिलायी, बल्कि चंपारण ने भी गांधी का जीवन बदल दिया. वे महज तीन-चार दिनों का कार्यक्रम बना कर चंपारण आये थे. उनका मकसद बस यह समझना था कि राजकुमार शुक्ल और उनके साथी किसान जो आरोप नील प्लांटरों पर लगाते हैं, वे सच हैं या झूठ. मगर ब्रिटिश अधिकारियों ने कदम - कदम पर बाधाएं खड़ी कर उन्हें यहां लंबे समय तक रुकने के लिए मजबूर कर दिया. इसकी शुरुआत मुजफ्फरपुर में ही हो गयी, जहां कमिश्नर एलएफ मोरशेड ने मुलाकात के दौरान उनसे कह दिया कि आपको यहां किसने बुलाया है. सरकार की ओर से जांच हो रही है, ऐसे में आपका यहां आना अनावश्यक है. हम आपको कोई सहायता नहीं दे सकते, हम यही सलाह देंगे की आप यहां से तत्काल लौट जाये.
इसके बाद से ही गांधी जी को लगने लगा कि मामला कुछ गड़बड़ है. उन्होंने इस सलाह को दरकिनार कर चंपारण जाने का मन बना लिया. चंपारण पहुंचने पर वहां के डीएम ने उनके खिलाफ धारा 144 का नोटिस जारी कर दिया और चंपारण छोड़ने का आदेश सुना दिया. इस आदेश की अवहेलना कर गांधी चंपारण में टिके रहे और पीड़ित किसानों की व्यथा को सुन कर उसे दर्ज करते रहे. 18 अप्रैल को मोतिहारी कोर्ट में उन पर धारा 144 के उल्लंघन का मुकदमा चला, जो ऐतिहासिक मुकदमा था. गांधी कहते हैं उसी मुकदमे में उन्हें सबसे पहले अहिंसा का साक्षात्कार हुआ और सत्याग्रह की शुरुआत हुई. इसी वजह से चंपारण को देश का इितहास सत्याग्रह की जन्मभूमि के रूप में याद करता है. यही सत्याग्रह देश की आजादी का हथियार बना.
मोतिहारी का वह ऐतिहासिक मुकदमा
भरी अदालत में गांधी ने कह दिया कि इस वक्त मैं सरकार से भी उच्चतर कानून अपनी अंतरात्मा के कानून का पालन करना उचित समझ रहा हूं. सरकार चाहे तो इस अपराध के लिए मुझे दंडित कर सकती है. मैं दंड सहने को तैयार हूं. अदालत ने उन्हें 100 रुपये के मुचलके पर जमानत लेने को कहा, तो उन्होंने इससे भी इनकार कर दिया. थक हार कर जज महोदय को खुद मुचलका भरना पड़ा. यह उस वक्त के लिहाज से ऐतिहासिक घटना थी. इसकी गूंज पूरे देश में सुनायी पड़ी और हार कर ब्रिटिश सरकार को मुकदमा वापस लेना पड़ा और गांधी जी को इस विवाद के लिए चंपारण में रह कर जांच करने की इजाजत देनी पड़ी.
तारणहार बन कर आये गांधी, घबराये नील प्लांटर
यह उनकी पहली जीत थी. उसके बाद गांधी जी ने पूरे चंपारण में घूम कर किसानों और नील प्लांटरों के बयान लिये. उनकी इस गतिविधि से प्लांटर और प्रशासन दोनों घबराये हुए थे. क्योंकि, किसानों को लगने लगा था कि उनका तारणहार आ गया है. गांधी जी की मौजूदगी और उनके सामने मोतिहारी के प्रशासन और अदालत को घुटने टेकते हुए देख कर चंपारण की रैयत का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था. प्लांटरों और प्रशासनिक अधिकारियों ने कई झूठे आरोप गढ़ कर गांधी को चंपारण से भगाने की कोशिश की. मगर उन्हें सफलता नहीं मिली. थक हार कर बिहार सरकार को चंपारण के मसले की जांच के लिए 10 जून, 1917 को सरकारी जांच समिति का गठन करना पड़ा और महात्मा गांधी को भी उस समिति का महत्वपूर्ण सदस्य बनाना पड़ा. समिति ने जांच की और किसानों के आरोप सही पाये गये. इस जांच के आधार पर कानून बना कर 4 मार्च, 1918 को तिनकठिया प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया और लगभग एक साल की कोशिशों के बाद चंपारण के किसानों को शोषण के अंतहीन चक्र से मुक्ति मिल गयी.
सरकार ही नहीं, समाज को भी बदलने की कोशिश की
महात्मा गांधी के काम करने का अपना तरीका था. वे सिर्फ राजनीतिक लड़ाइयों पर जोर नहीं देते थे, सामाजिक बदलावों को भी उतना ही महत्व देते थे. चंपारण में भी जब लगभग तय हो गया कि तिनकठिया प्रथा खत्म हो जायेगी, गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के प्रयासों पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया. वे तो चाहते थे कि इस काम में नील प्लांटर भी उनके सहयोगी बने, मगर प्लांटरों ने रुचि नहीं दिखायी. बल्कि यह कह दिया कि उनके इलाके में ये काम न हों. ऐसे में गांधी जी को उन गिने-चुने इलाकों में काम करना पड़ा, जो नील प्लांटरों के आधिपत्य में नहीं थे.
तीन स्कूल खोले और वहां से कई काम किये
इस काम के लिए गांधी जी ने तीन स्कूलों की शुरुआत की और उन स्कूलों को केंद्र बना कर वहां से स्वयंसेवकों की मदद से शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई का अभियान चलाया. मकसद यह था कि समाज बदले, लोग स्वस्थ और जागरूक हो. उनका मानना था कि अगर कोई समाज स्वस्थ और जागरूक होगा, तो वह कभी गुलाम नहीं हो सकता. गांधी जी ने समाज के लोगों की मदद से चंपारण में जो तीन स्कूल खोले वे क्रमशः बड़हरवा लखनसेन, भितिहरवा और मधुबन में खोले गये थे. यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता का प्रसार करने के लिए गांधी जी ने राज्य के बाहर से स्वयंसेवकों को बुलाया था. 21 स्वयंसेवकों की टीम में कस्तूरबा, देवदास गांधी, बबन गोखले और उनकी पत्नी अवंतिका गोखले, डॉ देव समेत कई जाने-माने लोग थे. इन लोगों ने छह महीने रह कर यहां काम किया.
इन स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया तो जाता ही था, खाली समय में ये स्वयंसेवक गांव में घूम कर साफ-सफाई का अभियान भी चलाते थे. गांव के लोग खुद सफाई करने में हिचकते, तो ये लोग खुद भिड़ जाते. इसके अलावे छोटी-मोटी दवाओं से लोगों के रोगों का उपचार भी किया जाता था. हालांकि, यह काम लंबे समय तक चल नहीं पाया, क्योंकि छह महीने के बाद अधिकांश स्वयंसेवक लौट गये और गांधी जी को स्थानीय स्वयंसेवक नहीं मिले. इसके बावजूद उन गांवों में हुए इन कार्यों का असर आज भी नजर आता है.
भितिहरवा में तो स्कूल की जगह पर शानदार संग्रहालय बन गया है, लेकिन फिर भी गांधी जी की ओर से खोला गया स्कूल संचालित हो रहा है. मधुबन का स्कूल बंद हो गया. मगर बड़हरवा, लखनसेन का स्कूल आज भी संचालित हो रहा है. गांव के लोगों ने समूह बना कर फिर से साफ-सफाई का अभियान शुरू कर दिया है. कहते हैं, यहीं स्कूल बाद में गांधीजी के बुनियादी विद्यालयों का आधार बने. इसी काम के सिलसिले में गांधी जी को वह महिला चंपारण के श्रीरामपुर में मिली, जिसके पास पहनने के लिए दूसरा कपड़ा नहीं था, वह एक कपड़े से ही काम चलाती थी. उसी महिला को देख कर गांधी जी ने आजीवन एक वस्त्र से काम चलाने का प्रण लिया.
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