ज्योतिग्राम योजना : 2477 बिजली आपूर्ति

Updated at : 03 Jul 2014 6:48 AM (IST)
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ज्योतिग्राम योजना : 2477 बिजली आपूर्ति

।। अंजनी कुमार सिंह ।। गुजरात एक मात्र राज्य, 70 फीसदी सूखा क्षेत्र फिर भी भू-जल का स्तर धनात्मक सोच दूरगामी व सकारात्मक हो, मन में आत्मविश्वास हो, तो जनहित में नेतृत्व द्वारा लिए गये कड़े फैसले रोशनी तो देते ही हैं. कुछ ऐसी ही दास्तां है ज्योतिग्राम योजना की. आज गुजरात के 1800 गांवों […]

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।। अंजनी कुमार सिंह ।।

गुजरात एक मात्र राज्य, 70 फीसदी सूखा क्षेत्र फिर भी भू-जल का स्तर धनात्मक

सोच दूरगामी व सकारात्मक हो, मन में आत्मविश्वास हो, तो जनहित में नेतृत्व द्वारा लिए गये कड़े फैसले रोशनी तो देते ही हैं. कुछ ऐसी ही दास्तां है ज्योतिग्राम योजना की. आज गुजरात के 1800 गांवों के प्रत्येक घर में सप्ताह में सातों दिन थ्री फेज बिजली की आपूर्ति हो रही है. 2004 में जहां देश भर में किसानों को मुफ्त में बिजली देने और पॉवर सब्सिडी की चर्चा चल रही थी, तब गुजरात सरकार ने पॉवर सप्लाई पर शुल्क लगाया और आपूर्ति को नियंत्रित किया. विरोध हुआ, पर कंगाल राज्य विद्युत बोर्ड के साथ ही जनता को भी अंधेरे से मुक्ति मिली. ‘राहें और भी हैं’ की श्रृंखला में आज पढ़ें इसी ‘ज्योतिग्राम’ योजना की यात्रा .

भारत के लगभग छह लाख गांवों की तरह ही हैं गुजरात के 1800 गांव, लेकिन एक बात है, जो औरों से अनोखा बनाती है इन्हें. वह है प्रत्येक घर में सप्ताह भर 24 घंटे थ्री फेज बिजली की आपूर्ति. यह सब संभव हुआ है ज्योतिग्राम परियोजना की वजह से. बिजली की उपलब्धता व भू-जल के स्तर में सुधार लाने की दिशा में ‘ज्योतिग्राम’ योजना अन्य राज्यों के लिए मील का पत्थर साबित होसकता है.

हाल ही में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने यह घोषणा की है कि मंत्रालय ज्योतिग्राम योजना को पूरे देश में लागू करने का इच्छुक है. योजना की सफलता को देखते हुए स्टॉकहोम इंटरनेशनल वाटर इंस्टिटय़ूट ने भी इसकी सराहना की थी. योजना को कई पुरस्कार भी मिले हैं, जिनमें सार्वजनिक श्रेणी में इनोवेशन फॉर इंडिया 2010 भी शामिल है.

सफर पर एक नजर

जब पूरा देश किसानों को मुफ्त में बिजली देने और पॉवर सब्सिडी के चक्र व्यूह में फंसा था, तब गुजरात सरकार ने उस चक्र व्यूह को तोड़ते हुए पॉवर सप्लाई पर शुल्क लगाते हुए आपूर्ति को नियंत्रित किया. चूंकि राज्य की बिजली का 85 फीसदी कृषि पर खर्च होता था, इसलिए घरेलू व औद्योगिक उपयोग के लिए बहुत कम बिजली बच पाती थी. पॉवर सब्सिडी की वजह से राज्य विद्युत बोर्ड कंगाल बन गया था. परंपरागत तौर पर बिजली एक ही यूनिट श्रेणी में कृषि, घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए दी जाती थी.

इसे गुजरात सरकार ने अलग-अलग करते हुए कृषि के लिए विद्युत आपूर्ति को घरेलू एवं औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखला से अलग कर दिया. इस वजह से बिजली का उपयोग समुचित ढंग से होने लगा. अब जहां गांवों में 24 घंटे बिजली रहती है, वहीं किसानों के लिए पूर्व-घोषित समय-सारिणी के अनुसार आठ घंटे हाई वोल्टेज बिजली दी जा रही है.

योजना की खासियत

सितंबर, 2003 में इस योजना की शुरु आत गुजरात में बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ भू-जल प्रबंधन तंत्र को सुदृढ़ करने के लक्ष्य के साथ की गयी थी. गुजरात के गांवों में इस योजना से पहले भी बिजली की आपूर्ति थी, लेकिन उसका कोई निर्धारित समय नहीं होता था. जब योजना शुरू की जा रही थी, उसी दौरान राज्य सरकार ने बिजली का दाम बढ़ाया. पूरे गुजरात में इस बढ़ोतरी का विरोध हुआ. बावजूद इसके तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने योजना की शुरु आत की.

पर्यवेक्षकों के अनुसार, मोदी का यह कदम एक ‘अलोकप्रिय सुधार’(अनपॉपुलर रिफार्म) था, लेकिन यह निर्णय लेने की उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का भी परिचायक था. इसकी वजह से यह योजना नवीन समाधान का एक उदाहरण बनी. पहले चरण में इसे आठ जिलों में प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया. 2004 के नवंबर तक योजना पूरे राज्य में लागू कर दी गयी. 2006 तक यह योजना गुजरात के 90 फीसदी से अधिक गांवों में पहुंच चुकी थी.

पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक

आइडब्लूएमआइ(इंटरनेशनल वाटर मैनेजमेंट इंस्टिटय़ूट) द्वारा किये गये एक अध्ययन के मुताबिक ज्योतिग्राम योजना नरेंद्र मोदी का ‘पॉलिटिकल मास्टरस्ट्रोक’ था. शाह रिपोर्ट के अनुसार ज्योतिग्राम योजना को लगभग एक हजार दिन में पूरा किया गया. योजना के तहत पांच लाख लीटर भू-जल पुनर्भरण ढांचा तैयार किया गया. 1.13 लाख से ऊपर चेक डैम बनाये गये. 56 लाख से ज्यादा बोरवेल का निर्माण किया गया, जबकि 12.4 लाख तालाब खोदकर पानी संग्रहण प्रणाली को मजबूत किया गया. योजना की खासियत रही है कि एक ओर लोगों को जहां चौबीस घंटे बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित की गयी, वहीं ग्राउंड-वाटर को भी रिचार्ज किया गया. परिणाम यह हुआ कि कृषि वृद्धि दर चार फीसदी से बढ़कर नौ फीसदी तक पहुंच गया. गुजरात ही एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां पर भू-जल का स्तर धनात्मक रहा है, जबकि वहां के 70 फीसदी इलाके सूखा क्षेत्र है.

किसानों को फायदा

ज्योतिग्राम योजना की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें कृषि और गैर-कृषि बिजली आपूर्ति को अलग-अलग कर दिया गया और संचरण व वितरण घाटे को कम किया गया. किसानों को आवश्यकतानुसार अपने काम को योजनाबद्ध करने और पानी को जमा करने में सहायता मिली. मोटर -पंपों के रख-रखाव का खर्च कम हुआ. इस योजना के तहत बिजली पर मिलनेवाले अनुदान का तार्किक प्रबंधन किया गया और जहां संभव हो सका, वहां पर शुल्क निर्धारित किया गया.

कम हुआ घाटा, आपूर्ति सुधरा

ज्योतिग्राम में कृषि और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए अलग-अलग आपूर्ति की वजह से घाटा कम हुआ और आपूर्ति में भी बेहतरी आयी. इस कारण विद्युत बोर्ड का बचत दोहरा हो गया. तीन फेज में बिजली घरेलू काम-काज, विद्यालयों, अस्पतालों और ग्रामीण उद्योगों को भी उपलब्ध करायी जाती है. केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ने कहा है कि केंद्र सरकार उन राज्यों को 50 फीसदी का अनुदान देगी, जो ग्रामीण और कृषि आपूर्ति को अलग-अलग करना चाहते हैं. 12,000 कृषि फीडरों को डोमेस्टिक फीडर से अलग करने के लिए गुजरात सरकार ने 1,200 करोड़ रु पया खर्च किया था. इस कदम से राज्य सरकार का वितरण घाटा 35 फीसदी से घट कर 15 से 19 फीसदी के बीच आ गया था. गुजरात से ही सीख लेकर पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश भी इस दिशा में कदम उठा चुके हैं. आपूर्ति को अलग-अलग करना उन राज्यों के लिए ज्यादा जरूरी है, जहां सिंचाई में भू-जल का उपयोग ज्यादा किया जाता है.

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