मानहानि का मामला नहीं करेंगे जस्टिस गांगुली, कहा प्रताड़ना से तंग आकर इस्तीफा दिया

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कोलकाता: पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके गांगुली ने अपने खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले की जांच के लिए तीन न्यायाधीशों की समिति गठित करने के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि उनके साथ ‘बहुत खराब और अन्यायपूर्ण’ बर्ताव किया गया. जस्टिस गांगुली ने दावा किया […]

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कोलकाता: पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके गांगुली ने अपने खिलाफ यौन उत्पीड़न के मामले की जांच के लिए तीन न्यायाधीशों की समिति गठित करने के लिए बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की है. उन्होंने कहा कि उनके साथ ‘बहुत खराब और अन्यायपूर्ण’ बर्ताव किया गया.

जस्टिस गांगुली ने दावा किया कि उन्होंने ‘खिन्न होकर’ राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया. उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि वह लॉ इंटर्न के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करने की बजाय जेल जाना पसंद करेंगे क्योंकि वह उनकी छात्रा थी. लॉ इंटर्न ने गांगुली पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाये थे. यह पूछे जाने पर कि क्या वह इंटर्न के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे तो गांगुली ने संवाददाताओं से कहा : मैं ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कभी कुछ नहीं करूंगा जो मेरी छात्रा रही हो, मैं बल्कि जेल जाऊंगा.

कहा- कुछ भी गलत नहीं किया
जस्टिस गांगुली ने कुछ भी गलत करने से इनकार किया और आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सही अवसर नहीं दिया. न्यायमूर्ति (सेवानिवृत) गांगुली ने उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की समिति द्वारा दोषारोपित किये जाने के बाद दबाव बढ़ने के मद्देनजर पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया.

उन्होंने कहा : इंटर्न ने उच्चतम न्यायालय से कभी शिकायत नहीं की, तब समिति क्यों गठित की गयी, मैं नेकनीयती से न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ. उच्चतम न्यायालय की समिति ने बिना अधिकार क्षेत्र और बिना आधार के मेरे खिलाफ कार्रवाई की. मैं उच्चतम न्यायालय में अपने साथी न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठा रहा हूं. उनकी तरफ से ‘अशोभनीय आचरण’ किये जाने की समिति के निष्कर्षों पर जस्टिस गांगुली ने पलटकर कहा : किसके साथ अशोभनीय आचरण. उन्होंने कहा: मैंने उसे अपने साथ ठहरने के लिए मजबूर नहीं किया.

न तो मैंने उसे शराब पीने को मजबूर किया. अगर कोई लेने का इच्छुक नहीं हो तो क्या मैं किसी को मजबूर कर सकता हूं. अगर उसने पसंद नहीं किया तो वह रात का खाना खाने से पहले भी जा सकती थी. उच्चतम न्यायालय की ओर से गठित तीन न्यायाधीशों की समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इंटर्न के लिखित और मौखिक बयान से प्रथम दृष्टया न्यायाधीश द्वारा 24 दिसंबर 2012 को ली मेरिडियन होटल के कमरे में इंटर्न के साथ ‘अशोभनीय आचरण करने’ का खुलासा होता है. यह पूछे जाने पर कि क्या यह उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश थी तो इसपर न्यायमूर्ति गांगुली ने कहा: मैं यह नहीं कह सकता कि यह राजनीतिक साजिश थी या नहीं. पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर मुङो कभी पसंद नहीं किया.

बंगाल में किसी भी असहमति की अनुमति नहीं है. यह सबको पता है.’ उन्होंने कहा : मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसपर शर्मिंदा महसूस करुं. इंटर्न ने घटना के 11 महीने बाद आरोप लगाये थे. यह मुङो बदनाम करने का प्रयास था. पश्चिम बंगाल सरकार मेरे राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद पर रहने से काफी असहज थी. उन्होंने कहा कि पहले मुख्यमंत्री उन्हें अशोक दा बुलाती थीं, लेकिन अब उन्हें नहीं मालूम क्या कहती हैं. उन्होंने कहा कि शिलादित्य चौधरी पर दिये गये उनके सुझाव के बाद सुश्री बनर्जी ने विधानसभा में खुली आलोचना की थी, लेकिन मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कभी भी किसी का अनुगत स्वीकार नहीं किया, वरन अपने कर्तव्य का पालन किया. जस्टिस गांगुली ने दावा किया कि उन्हें लॉ इंटर्न द्वारा उच्चतम न्यायालय की ओर से गठित समिति को दिये गये बयान की प्रति इस आधार पर नहीं सौंपी गयी कि यह ‘गोपनीय’ है. उन्होंने कहा कि यह उनका अपमान है.उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि उन्होंने प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम को इस संबंध में विस्तृत पत्र लिखा था लेकिन उन्हें इसका कोई जवाब नहीं मिला. जस्टिस गांगुली ने कहा कि वह इंटर्न को शुभकामना देते हैं.

उन्होंने कहा कि मैं उसकी भलाई की कामना करता हूं. वह काफी सक्षम इंटर्न थी. जीवन में वह जो भी चुने उसमें उसकी सफलता की मैं कामना करता हूं. उन्होंने कहा कि 24 दिसंबर 2012 को दिल्ली के होटल में हुई कथित घटना के बाद से वह उससे नहीं मिले हैं.अपने खिलाफ लगे सभी आरोपों का खंडन करते हुए गांगुली ने कहा कि उनके खिलाफ कोई आरोप नहीं है. जस्टिस गांगुली ने कहा : मुङो हटाने की मांग करने का राज्य सरकार और केंद्र का यह एकतरफा प्रयास था. वे राष्ट्रपति के उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने की हद तक इसे ले गये. इस्तीफा देने के कारण के बारे में पूछे जाने पर श्री गांगुली ने कहा कि ऐसी स्थिति में उनके लिए काम करना काफी मुश्किल हो रहा था.

उन्होंने कहा : मैंने अपने परिवार की खुशी और मानवाधिकार आयोग की गरिमा और सम्मान के लिए इस्तीफा दिया. मैं लगाये गये आरोपों से टूटा हुआ महसूस करता हूं. वे बेहद अतर्कसंगत थे. उन्होंने यह भी कहा कि विशाखा दिशा-निर्देश भी इस मामले में लागू नहीं होते, क्योंकि लड़की उनके साथ इंटर्नशिप नहीं कर रही थी.

महिलाओं पर अत्याचार के खिलाफ अनेक मामलों में खुद की कार्रवाई करने की बात करते हुए जस्टिस गांगुली ने कहा कि वह इस बात से बेहद दुखी हुए जब यह कहा गया कि उनके मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष बने रहने से पद की बदनामी हो रही है. उन्होंने कहा : मैंने महिलाओं के मुद्दों पर बेहद सक्रियता दिखायी है और तत्काल आदेश दिये हैं. महिला निकायों से इस बारे में पूछें.

उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनका इस्तीफा देना अपराध की स्वीकारोक्ति है. यह पूछे जाने पर कि इस्तीफा देने के बाद वह राहत महसूस कर रहे हैं या निराश महसूस कर रहे हैं तो जस्टिस गांगुली ने कहा : यह निराशा नहीं थी. मैं मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए लड़ाई को छोड़ने नहीं जा रहा हूं. यह पूछे जाने पर कि आगे का जीवन वह कैसे बितायेंगे तो उन्होंने कहा कि वह अपने मानवाधिकारों को बहाल करने के लिए काम करेंगे और आम जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के लिए उनकी लड़ाई में कोई बाधा नहीं आयेगी. उन्होंने कहा : इंटर्न के साथ फिर काम करने के लिए मैं तैयार हूं.

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