UP की सियासत का वो चुनावी सफर, जिसने हर दौर में बदली सत्ता की तस्वीर, 1952 से 2026 तक जानें पूरी कहानी
1952 से 2026 तक यूपी की सियासी कहानी
UP Assembly Election: उत्तर प्रदेश की राजनीति ने 1952 से 2022 तक कई करवटें बदली हैं. कभी कांग्रेस का दबदबा रहा, तो कभी क्षेत्रीय दलों और भाजपा का उदय हुआ. जानिए इस 75 साल के चुनावी सफर की पूरी कहानी.
UP Assembly Election: जिस उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कभी कांग्रेस का दशकों तक दबदबा रहा, उसी राज्य ने बाद में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतों का उभार देखा और फिर भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता तक पहुंचाया. 1951-52 के पहले विधानसभा चुनाव से 2022 तक यूपी की सियासत ने कई बार करवट बदली—कहीं मंडल ने सामाजिक समीकरण बदले तो कहीं कमंडल ने चुनावी राजनीति की दिशा तय की. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवाल है कि करीब 75 साल में यूपी की सत्ता की यह तस्वीर आखिर कैसे बदली? जानिए 1952 से 2026 तक उत्तर प्रदेश की सियासत का पूरा चुनावी सफर.
1952 में गठित हुई पहली विधानसभा
आजाद भारत के पहले आम चुनाव के साथ उत्तर प्रदेश में 1951-52 में विधानसभा चुनाव हुए. इसके बाद 8 मार्च 1952 को पहली उत्तर प्रदेश विधानसभा का गठन हुआ. उस समय प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था और गोविंद बल्लभ पंत मुख्यमंत्री बने. शुरुआती दशकों में कांग्रेस प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी रही. उस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा का स्वरूप आज से अलग था. 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में विधानसभा के 430 निर्वाचन क्षेत्र थे. 1967 में यह संख्या घटकर 425 हो गई. इसके बाद परिसीमन और राज्य के पुनर्गठन के साथ विधानसभा के निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में बदलाव होता रहा.
1967 के बाद कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती
1967 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है. कांग्रेस को चुनौती देने के लिए कई गैर-कांग्रेसी दल एक साथ आए और प्रदेश में पहली बार गठबंधन की राजनीति का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया. इसके बाद उत्तर प्रदेश में सरकारों के बनने और बदलने का सिलसिला तेज हुआ. 1977 में आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और जनता पार्टी सत्ता में आई. हालांकि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी. इसके बाद 1980 में कांग्रेस ने फिर सत्ता में वापसी की. 1980 के दशक में कांग्रेस का प्रभाव बना रहा, लेकिन इसी दौरान भाजपा और दूसरे राजनीतिक दलों ने प्रदेश में अपना आधार मजबूत करना शुरू कर दिया.
मंडल-कमंडल से बदले राजनीतिक समीकरण
1989 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. इसके बाद सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीति का प्रभाव बढ़ा. 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों और राम जन्मभूमि आंदोलन ने प्रदेश की राजनीति को और प्रभावित किया. इसी दौर में भाजपा का प्रभाव तेजी से बढ़ा और समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी भी मजबूत राजनीतिक ताकत बनकर उभरीं. 1991 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. 1993 के चुनाव के बाद सपा और बसपा ने गठबंधन कर सरकार बनाई और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. बाद में सपा-बसपा गठबंधन टूट गया. इसके बाद भाजपा और बसपा के बीच भी अलग-अलग समय पर सत्ता के समीकरण बने. 1990 का दशक उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन, सत्ता परिवर्तन और बदलते सामाजिक समीकरणों के लिए जाना गया. इसी दौरान कांग्रेस का पुराना राजनीतिक वर्चस्व लगातार कमजोर होता गया.
2000 में अलग हुआ उत्तराखंड
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में 9 नवंबर 2000 एक बड़ा पड़ाव रहा. इसी दिन प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों को अलग करके उत्तरांचल राज्य बनाया गया, जिसे बाद में उत्तराखंड नाम दिया गया. राज्य के पुनर्गठन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा का आकार भी बदल गया. इसके बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें रह गईं. यही संख्या आज भी बनी हुई है. 2000 के दशक की शुरुआत में प्रदेश की राजनीति में सपा, बसपा और भाजपा के बीच मुकाबला जारी रहा और गठबंधन सरकारों का दौर भी देखने को मिला.
2007 में बसपा ने हासिल किया पूर्ण बहुमत
2007 का विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी के लिए ऐतिहासिक रहा. बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. इस चुनाव के बाद प्रदेश में गठबंधन की राजनीति से अलग पूर्ण बहुमत वाली सरकार का दौर देखने को मिला. इसके बाद 2012 में सत्ता का समीकरण फिर बदला. समाजवादी पार्टी ने 224 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. इस चुनाव में सपा ने बसपा सरकार को सत्ता से बाहर कर प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव किया.
2017 में भाजपा की बड़ी जीत
2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे बड़े राजनीतिक बदलावों में शामिल रहा. भाजपा ने 312 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. इसके बाद योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया. भाजपा सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचा, एक्सप्रेसवे, निवेश और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दे राजनीतिक चर्चा के प्रमुख केंद्र रहे. 2017 की जीत के बाद भाजपा प्रदेश की राजनीति में सबसे मजबूत दल के रूप में उभरी.
2022 में भाजपा ने बरकरार रखी सत्ता
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 255 सीटें जीतकर सत्ता बरकरार रखी. 2017 के मुकाबले भाजपा की सीटें कम हुईं, लेकिन पार्टी ने पूर्ण बहुमत हासिल किया. समाजवादी पार्टी ने 111 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की. 25 मार्च 2022 को योगी आदित्यनाथ ने लगातार दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इस तरह प्रदेश में लंबे समय बाद ऐसा हुआ कि कोई मुख्यमंत्री लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा.
1952 से 2026 तक ऐसे बदली सत्ता की तस्वीर
उत्तर प्रदेश की राजनीतिक यात्रा को देखें तो शुरुआती दशकों में कांग्रेस का दबदबा रहा. 1967 के बाद गैर-कांग्रेसी राजनीति मजबूत हुई और 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी. 1980 में कांग्रेस की वापसी के बाद भी प्रदेश की राजनीति में बदलाव की प्रक्रिया जारी रही. 1989 के बाद सपा, बसपा और भाजपा जैसी राजनीतिक ताकतों का प्रभाव बढ़ा. 1990 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया. इसके बाद 2007 में बसपा, 2012 में सपा और 2017 में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई. 2022 में भाजपा ने 255 सीटों के साथ सत्ता बरकरार रखी. इस तरह उत्तर प्रदेश की राजनीति कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से निकलकर क्षेत्रीय दलों के उभार, गठबंधन सरकारों और फिर पूर्ण बहुमत वाली सरकारों के दौर तक पहुंची.
2027 के चुनाव से पहले फिर बढ़ी राजनीतिक हलचल
अब 2026 में उत्तर प्रदेश की राजनीति की नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है. मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 2027 में पूरा होना है, इसलिए अगले चुनाव को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं. भाजपा के सामने लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती होगी. समाजवादी पार्टी विपक्ष की मुख्य ताकत के तौर पर अपना आधार मजबूत करने की कोशिश करेगी. वहीं बसपा और कांग्रेस के सामने भी प्रदेश में अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने की चुनौती होगी. करीब 75 साल का उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां राजनीतिक समीकरण लगातार बदलते रहे हैं. कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से लेकर सपा-बसपा के उभार और भाजपा के मजबूत होने तक प्रदेश ने कई बड़े राजनीतिक बदलाव देखे हैं. अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2027 में यूपी की जनता एक बार फिर सत्ता की तस्वीर बदलेगी या मौजूदा राजनीतिक समीकरण कायम रहेंगे.
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