लखनऊ का ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस बंद: गुम हुई राजनीति और साहित्य की अनूठी महफिल
लखनऊ का ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस बंद
UP News: लखनऊ का दिल हजरतगंज स्थित मशहूर इंडियन कॉफी हाउस पिछले तीन महीनों से बंद है. यह वो जगह थी जहाँ राजनीति, साहित्य और कला पर बेझिझक बहस होती थी. जानिए इस सांस्कृतिक धरोहर के बंद होने की कहानी.
UP News: लखनऊ के दिल हजरतगंज में स्थित मशहूर इंडियन कॉफी हाउस पर पिछले लगभग तीन महीनों से ताला लटक रहा है. यह स्थान दशकों तक उत्तर प्रदेश की राजनीति, समाज, कला और साहित्य पर जीवंत चर्चाओं का प्रमुख अड्डा रहा है. यहाँ कॉफी की चुस्कियों के साथ देश और राज्य की भावी नीतियों पर विचार-विमर्श किया जाता था. आंतरिक कर्मचारी विवाद के कारण बंद हुए इस ऐतिहासिक केंद्र के दोबारा खुलने को लेकर फिलहाल कोई स्पष्टता नहीं है.
ब्रिटिश काल से जुड़ा सहकारी आंदोलन का गौरवशाली इतिहास
इस संस्थान की जड़ें ब्रिटिश शासनकाल के कॉफी बोर्ड से जुड़ी हैं. जब 1950 के दशक में देश भर के कई कॉफी हाउस बंद होने लगे, तब वामपंथी नेता ए.के. गोपालन और श्रमिक आंदोलनों के प्रयास से एक नया सहकारी मॉडल विकसित किया गया. इसके बाद 1957 में पहली सहकारी संस्था और दिल्ली में नया कॉफी हाउस शुरू हुआ. लखनऊ में 1930 के दशक के उत्तरार्ध से मौजूद यह केंद्र 1945 में आधिकारिक तौर पर सहकारी ढांचे में ढल गया.
विधानसभा के फैसलों और राजनीतिक दिग्गजों का गवाह
इतिहासकारों और वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, यह स्थान कभी किसी पार्टी विशेष के दायरे में नहीं बंधा. पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राम मनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर और मुलायम सिंह यादव जैसे दिग्गजों का यहाँ नियमित आना-जाना था. विधानसभा सत्र से पहले और बाद में यहाँ नेताओं की रणनीतिक बैठकें जमती थीं. विचारधाराओं से परे रहकर यहाँ सत्ता, लोकतंत्र और आम जनता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर निर्भीक बहस और स्वस्थ चर्चाएँ हुआ करती थीं.
हिंदी-उर्दू साहित्य और पत्रकारिता का अनौपचारिक दफ्तर
राजनीति के अलावा, यह स्थान हिंदी और उर्दू साहित्यकारों की विचार-शाला भी रहा है. यशपाल, अमृतलाल नागर, भगवती चरण वर्मा और मजाज़ लखनवी जैसे महान लेखकों की यहाँ अपनी मेजें तय थीं, जहाँ नए लेखक अपनी रचनाएँ बेझिझक सुनाते थे. इसके अलावा, पुराने समय में पत्रकारों के लिए यह एक अनौपचारिक कार्यालय की तरह कार्य करता था. औपचारिक प्रेस वार्ताओं से इतर, यहाँ की अनौपचारिक बहसों से पत्रकारों को अक्सर सबसे महत्वपूर्ण और निष्पक्ष खबरें मिल जाया करती थीं.
उपेक्षित शटर के बाहर पसरा सन्नाटा और बदलता दौर
आज जब सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने संवाद के पुराने तरीकों को पीछे छोड़ दिया है, तब इस कॉफी हाउस का बंद होना एक सांस्कृतिक क्षति की तरह देखा जा रहा है. स्थानीय व्यापारियों और पुराने आगंतुकों के मन में वह दौर आज भी तरोताजा है, जब पूरी गली में बौद्धिक हलचल बनी रहती थी. जिस दरवाजे पर कभी दिग्गज हस्तियों और चिंतकों का तांता लगा रहता था, आज वहाँ रात में बेघर लोग आश्रय लेने को मजबूर हैं.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए