सुवर्णरेखा में आज भी मिलता है सोना, दिनभर की तलाश से चलता है इन परिवारों का चूल्हा
नदी घाट से सोना निकालते ग्रामीण
झारखंड की सुवर्णरेखा नदी से सोना निकालने वाले गरीब परिवारों की संघर्ष भरी कहानी. जानिए कैसे दिनभर की मेहनत के बाद चंद कणों से चलता है इनका चूल्हा.
चांडिल: सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र की पहचान पहाड़, जंगल और नदियों से है. यहां की सुवर्णरेखा नदी सिर्फ जल का स्रोत नहीं, बल्कि कई ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी का सहारा भी है. कभी ‘सोने की चिड़िया’ कही जाने वाली सुवर्णरेखा में आज भी कुछ गरीब आदिवासी परिवार सोने के कण तलाशते हैं. सुबह से शाम तक मिट्टी और बालू धोने के बाद जो कुछ कण मिलते हैं, उन्हें बेचकर परिवार का खर्च चलता है.
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कुदाल, खुरपी और टोकरी लेकर सुबह ही नदी पहुंच जाते हैं ग्रामीण
सुबह होते ही सोना तलाशने वाले परिवार कुदाल, खुरपी और टोकरी लेकर सुवर्णरेखा नदी के किनारे पहुंच जाते हैं. नदी की धार के आसपास से पत्थर, मिट्टी और बालू निकालकर उसे थाली में जमा किया जाता है. इसके बाद नदी के पानी से मिट्टी और बालू को बार-बार धोया जाता है.
घंटों की मेहनत और धैर्य के बाद जब मिट्टी और रेत अलग होती है, तो उसमें सोने के छोटे-छोटे कण दिखाई देते हैं. यही कच्चा सोना इन परिवारों की दिनभर की कमाई का आधार बनता है. स्थानीय लोगों के अनुसार ईचागढ़ क्षेत्र में नदी से सोना निकालने का काम वर्षों पुराना है. कई परिवारों की कई पीढ़ियां इस परंपरागत रोजगार से जुड़ी रही हैं. सुवर्णरेखा के अलावा बामनी नदी और आसपास के अन्य नदी क्षेत्रों में भी ग्रामीण सोने के कण तलाशते हैं.
किसी दिन 200, तो किसी दिन 500 रुपये तक की कमाई
गर्मी की तपती धूप हो, बरसात का मौसम या कड़ाके की ठंड, इन परिवारों की मेहनत नहीं रुकती. रोजगार का कोई दूसरा स्थायी साधन नहीं होने के कारण नदी ही इनके लिए रोजी-रोटी का बड़ा सहारा बनी हुई है.
सोना निकालने वाले ग्रामीणों के मुताबिक दिनभर कमरतोड़ मेहनत के बाद भी आमदनी तय नहीं होती. किसी दिन करीब 200 रुपये मिलते हैं, तो किसी दिन 300 से 350 रुपये. बेहतर दिन रहा तो 400 से 500 रुपये तक की कमाई हो जाती है. नदी से मिलने वाले सोने की मात्रा नदी की धार, मौसम और मेहनत पर निर्भर करती है.
चांडिल बाजार में बेचते हैं सोने के कण

दिनभर नदी किनारे सोना तलाशने के बाद ग्रामीण मिले हुए कणों को चांडिल बाजार में बेचते हैं. इसी से मिलने वाली रकम से परिवार का दैनिक खर्च चलता है. कई लोग सुबह घर से खाना लेकर नदी किनारे पहुंचते हैं और शाम तक इसी काम में जुटे रहते हैं. इस मेहनत में पुरुषों के साथ महिलाएं भी बराबर हाथ बंटाती हैं.
करीब 60 साल से नदी से सोना निकाल रहा परिवार
एक ग्रामीण ने बताया कि करीब 60 साल से उनके परिवार के लोग नदी से सोना निकालकर गुजारा करते आ रहे हैं. उन्होंने बताया कि सुबह से शाम तक कुदाल और थाली लेकर मेहनत करनी पड़ती है. कभी 200 रुपये मिलते हैं, तो कभी 300-400 रुपये. दूसरा रोजगार नहीं होने के कारण हर मौसम में इसी काम के भरोसे रहना पड़ता है.
सोना मिलता है, लेकिन जिंदगी में नहीं आती समृद्धि
सुवर्णरेखा नदी के नाम में भले ही ‘सोना’ जुड़ा है, लेकिन इसके किनारे रहने वाले कई परिवार आज भी आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं. नदी से निकलने वाला सोना इनके लिए संपत्ति या समृद्धि का जरिया नहीं, बल्कि पेट पालने का साधन है. दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद मिलने वाले चंद रुपये से ही इन परिवारों के घर का चूल्हा जलता है.

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