झारखंड के डैम में तैरेंगे हाउसबोट और फ्लोटिंग रिसॉर्ट? केरल मॉडल से खुला वाटर टूरिज्म का रास्ता

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कोच्चि वाटर मेट्रो

झारखंड के पर्यटन को मिलेगी नई रफ्तार, पतरातू से मैथन डैम तक केरल की तरह शुरू हो सकती है हाउसबोट और फ्लोटिंग रिसॉर्ट की सुविधा. जानें पूरी योजना.

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केरल के केट्टुवल्लम से बिपिन सिंह की रिपोर्ट

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केरल: केरल के पारंपरिक ‘केट्टुवल्लम’ यानी हाउसबोट ने अलाप्पुझा (एलेप्पी) और कुमारकोम जैसे बैकवाटर क्षेत्रों को दुनिया के पर्यटन मानचित्र पर अलग पहचान दिलायी है. इसी सफल मॉडल से सीख लेकर झारखंड के जलाशयों में भी वाटर टूरिज्म की नयी संभावनाएं तलाशने की जरूरत है. पतरातू, चांडिल, तिलैया, मैथन, मसानजोर, गेतलसूद, रुक्का और धुर्वा डैम जैसे जलस्रोतों में स्थानीय जरूरत और पर्यावरणीय क्षमता के अनुसार हाउसबोट, क्रूज, फ्लोटिंग कैफे और रिसॉर्ट विकसित किये जा सकते हैं.

इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. खासकर ग्रामीण और जलाशय से जुड़े इलाकों में नाव संचालन, खान-पान, हस्तशिल्प, गाइड, होम स्टे और स्थानीय उत्पादों से जुड़े रोजगार विकसित किये जा सकते हैं. यदि इन परियोजनाओं को स्थानीय समुदाय की भागीदारी के साथ आगे बढ़ाया जाये, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बन सकती हैं.

झारखंडी संस्कृति से जोड़कर विकसित हो हाउसबोट

झारखंड को केरल की हूबहू नकल करने के बजाय वहां के मॉडल से सीख लेकर अपनी अलग पहचान बनानी होगी. यहां हाउसबोट और क्रूज को झारखंड की जनजातीय कला और संस्कृति से जोड़ा जा सकता है. सोहराय और कोहबर कला, जनजातीय शिल्प, स्थानीय खान-पान और पारंपरिक संगीत को इसका हिस्सा बनाया जा सकता है.

पतरातू और चांडिल जैसे बड़े जलाशयों में सूर्यास्त क्रूज, स्थानीय व्यंजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम, फ्लोटिंग कैफे और रिसॉर्ट जैसी सुविधाएं पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं. वहीं गेतलसूद, रुक्का और अन्य जलाशयों में उनकी क्षमता तथा पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए छोटे स्तर पर बोटिंग और हाउसबोट गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं.


कोच्चि वाटर मेट्रो
कोच्चि वाटर मेट्रो

पानी पर दौड़ता परिवहन मॉडल है कोच्चि वाटर मेट्रो

केरल में पर्यटन के साथ जल परिवहन को भी आधुनिक रूप दिया गया है. कोच्चि वाटर मेट्रो इसका बड़ा उदाहरण है. यह बैटरी आधारित पर्यावरण-अनुकूल परिवहन मॉडल है, जो कोच्चि और आसपास के जलक्षेत्र को जोड़ता है. आधुनिक टिकटिंग और संचालन व्यवस्था के साथ यह स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए सुविधाजनक परिवहन का विकल्प बनकर उभरा है.

कोच्चि वाटर मेट्रो का मॉडल यह बताता है कि जलमार्ग को केवल पर्यटन तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय परिवहन का हिस्सा भी बनाया जा सकता है. झारखंड में भी बड़े जलाशयों और संभावित जलमार्गों का अध्ययन कर पर्यटन और परिवहन की संयुक्त संभावनाओं पर काम किया जा सकता है.

‘थिंक ब्लू-गो ग्रीन’ से पर्यावरण का संदेश

कोच्चि वाटर मेट्रो का ‘थिंक ब्लू-गो ग्रीन’ का संदेश पर्यावरण-अनुकूल जल परिवहन की अवधारणा को सामने रखता है. कम किराये में बड़ी संख्या में लोग इसका उपयोग करते हैं. झारखंड में भी यदि जल पर्यटन को बढ़ावा दिया जाता है, तो सौर ऊर्जा, बैटरी चालित नाव और पर्यावरण-अनुकूल निर्माण जैसी तकनीकों को प्राथमिकता दी जा सकती है.

हालांकि, झारखंड में किसी भी जलाशय में हाउसबोट या क्रूज संचालन शुरू करने से पहले जल स्रोत की सुरक्षा, पेयजल उपयोग, जैव विविधता, जलस्तर, प्रदूषण और स्थानीय पर्यावरण पर संभावित प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा.

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निजी निवेश और सरकार की साझेदारी से खुल सकता है रास्ता

केरल का वाटर टूरिज्म मॉडल सरकारी पहल, तकनीकी सहयोग और वित्तीय संस्थानों की भागीदारी से विकसित हुआ है. झारखंड में भी सरकार निजी निवेशकों और स्थानीय उद्यमियों के साथ साझेदारी कर ऐसी परियोजनाओं को आगे बढ़ा सकती है. पर्यटन विभाग, स्थानीय निकाय और जलाशय प्रबंधन से जुड़े विभागों के बीच समन्वय से इसके लिए स्पष्ट नीति तैयार की जा सकती है.

फ्लोटिंग रिसॉर्ट के साथ कॉरपोरेट मीटिंग, डिजिटल वर्कस्पेस और ‘वर्क फ्रॉम वाटर’ जैसी सुविधाएं भी विकसित की जा सकती हैं. इससे स्थानीय पर्यटन के साथ कॉरपोरेट और डेस्टिनेशन इवेंट बाजार को भी आकर्षित किया जा सकता है.

बंद खदानों के जलाशयों में भी संभावनाएं

झारखंड की एक अलग विशेषता यहां की बंद कोयला खदानों में बने जलाशय हैं. विशेषज्ञ अध्ययन और सुरक्षा मानकों के अनुरूप कुछ उपयुक्त जलाशयों को पर्यटन गतिविधियों के लिए विकसित किया जा सकता है. हालांकि, ऐसे स्थानों पर किसी भी गतिविधि से पहले जल की गुणवत्ता, गहराई, ढलान, जमीन की स्थिरता और सुरक्षा का विस्तृत आकलन आवश्यक होगा.

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केरल से सीख, झारखंड की अपनी पहचान

केरल ने अपने बैकवाटर को केवल जलस्रोत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे पर्यटन, परिवहन, रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़कर एक पूरी पर्यटन व्यवस्था विकसित की. झारखंड के पास भी बड़े जलाशय, पहाड़, जंगल और समृद्ध जनजातीय संस्कृति है. जरूरत इन संसाधनों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप जोड़ने और सुरक्षित तरीके से विकसित करने की है.

पतरातू, चांडिल, तिलैया, मैथन, मसानजोर, गेतलसूद और रुक्का जैसे जलाशयों को लेकर दीर्घकालिक योजना तैयार की जाये, तो झारखंड में वाटर टूरिज्म एक नया आकर्षण बन सकता है. हाउसबोट और क्रूज के साथ स्थानीय भोजन, संस्कृति, संगीत और हस्तशिल्प को जोड़कर ऐसा मॉडल तैयार किया जा सकता है, जो केरल की नकल नहीं बल्कि ‘झारखंड का अपना वाटर टूरिज्म मॉडल’ बने.

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