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रांची में दम तोड़ रहा फुटबॉल, चार साल से नहीं हुई कोई लीग, फुटबॉलर खस्सी टूर्नामेंट में उलझे

By Prabhat Khabar Print Desk
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फुटबॉल
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संकेतिक तस्वीर, Twitter

रांची में फुटबॉल दम तोड़ रहा है. इसके साथ ही युवा खिलाड़ियों का सपना भी. लीग के इंतजार में यहां की एक पीढ़ी बर्बाद हो गयी. राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करने का सपना पूरा नहीं हो पाया. यहां पिछले चार साल से लीग ही आयोजित नहीं हो सकी. ऐसे में करीब 10 हजार खिलाड़ी बेकार हो गये और उनके चार साल बर्बाद हो गये. इसकी सुध लेनेवाला भी कोई नहीं है. इसके संचालन के लिए बनी छोटानागपुर एथलेटिक्स एसोसिएशन (सीएए) की एडहॉक कमेटी भी पूरी तरह फेल हो गयी है. होनहार फुटबॉलर खस्सी टूर्नामेंट व इनामी टूर्नामेंट खेलने को विवश हैं.

लीग नहीं होने से निकलती जा रही उम्र : रांची में पिछले चार साल से फुटबॉल लीग का आयोजन नहीं हुआ है. शहर में लीग का आयोजन सीएए करती है. लीग में 125 क्लब के लगभग 2500 खिलाड़ी शामिल होते हैं. लीग के तहत सुपर डिवीजन, ए डिवीजन और बी डिवीजन का आयोजन होता है, लेकिन पिछले चार साल से लीग नहीं होने से लगभग 10 हजार खिलाड़ी न केवल निराश हो गये हैं, बल्कि उनकी उम्र भी निकलती जा रही है. लीग बंद होने से फुटबॉलरों का राज्य या भारतीय टीम तक पहुंचने का रास्ता भी बंद हो गया है. हालांकि कुछ क्लब खस्सी और इनामी टूर्नामेंट आयोजित कर फुटबॉल के जुनून को जिंदा रखने की कोशिश कर रहे हैं.

2012 से चल रही एडहॉक कमेटी : वर्ष 2012 में फुटबॉल संचालन के लिए छोटानागपुर एथलेटिक्स एसोसिएशन (सीएए) की एडहॉक कमेटी गठित की गयी. छह माह के लिए कमेटी बनायी गयी थी. केएम सहाय कमेटी के चेयरमैन, केसी रवि प्रेसीडेंट व मोहम्मद हलीमुद्दीन महासचिव बनाये गये थे, लेकिन नौ वर्ष बीत गये और अब भी एडहॉक कमेटी के हाथों में ही फुटबॉल संचालन की कमान है. एडहॉक कमेटी बनने के बाद से सीएए की न तो वार्षिक आमसभा (एजीएम) हुई और न ही खर्च का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया.

बी डिवीजन हुआ, पर फाइनल नहीं : सीएए ने 2018-19 में किसी तरह बी डिवीजन फुटबॉल लीग कराया, लेकिन ए डिवीजन व सुपर डिवीजन नहीं कराया गया. तब बी डिवीजन में 96 टीमों ने भाग लिया, लेकिन इस लीग के मैच भी आधे में ही बंद कर दिये गये.

खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर : सीएए के फ्लॉप होने के कारण राजधानी के प्रतिभावान खिलाड़ियों का भविष्य दांव पर लग गया है. लीग हो नहीं रहा और उनकी उम्र बढ़ती जा रही है. इस कारण जूनियर स्तर पर वे राज्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रहे हैं. अखिल भारतीय फुटबॉल संघ ने चार साल पहले ही सेंट्रल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) सभी क्लबों व खिलाड़ियों के लिए अनिवार्य कर दिया था, लेकिन सीएए ने लीग खेलनेवाली किसी भी टीम का सीआरएस नहीं कराया. सूत्रों की मानें, तो यहां के कुछ खिलाड़ियों का फर्जी टीम के नाम से सीआरएस कराकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए भेजा जाता है.

कॉरपोरेट टीमों का भविष्य भी अधर में : लीग नहीं होने से मेकन जैसी कॉरपोरेट कंपनियां भी अब सुस्त पड़ गयी हैं और फुटबॉल टीम को बंद कर सकती है. मेकन हर साल खिलाड़ियों का चयन कर उन्हें हर माह कुछ राशि देती है, लेकिन जब लीग ही नहीं होगा, तो कंपनी टीम के खिलाड़ियों को बैठाकर पैसे क्यों देगी.

posted by: Pritish Sahay

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