रांची : 129 करोड़ की स्वर्णरेखा परियोजना की लागत बढ़ कर 15 हजार करोड़ हो गयी

Updated at : 15 Oct 2018 8:21 AM (IST)
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रांची : 129 करोड़ की स्वर्णरेखा परियोजना की लागत बढ़ कर 15 हजार करोड़ हो गयी

मनोज सिंह रांची : वर्ष 1977 में 129 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना अब 15 हजार करोड़ रुपये में पूरी होगी. 41 साल (1977 से 2018) में परियोजना की लागत 116 गुना बढ़ गयी. परियोजना का 75 फीसदी काम हाे चुका है. इस पर अब तक करीब छह हजार करोड़ […]

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मनोज सिंह
रांची : वर्ष 1977 में 129 करोड़ रुपये की लागत से शुरू हुई स्वर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना अब 15 हजार करोड़ रुपये में पूरी होगी. 41 साल (1977 से 2018) में परियोजना की लागत 116 गुना बढ़ गयी. परियोजना का 75 फीसदी काम हाे चुका है. इस पर अब तक करीब छह हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं.
वहीं 25 फीसदी बचे काम पर नौ हजार करोड़ रुपये खर्च होना बाकी है. केंद्र व राज्य सरकार ने दिसंबर 2019 तक परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य रखा है. नयी भूमि अधिग्रहण व पुनर्वास नीति के कारण परियोजना की लागत करीब पांच हजार करोड़ बढ़ गयी है. इस परियोजना से करीब 3.31 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होगी. परियोजना को लेकर केंद्र, बंगाल, ओड़िशा व झारखंड सरकार में समझौता हो चुका है.
पश्चिम बंगाल और ओड़िशा को चांडिल, गालूडीह, ईचाडैम और खरकई बांध से जलापूर्ति की जायेगी. चांडिल और गालूडीह डैम परियोजना का काम पूरा हो चुका है. ईचाडैम का काम करीब 30% हुआ है. खरकई के एक कनाल (नहर) का काम चल रहा है. एक कनाल का निर्माण विभाग ने कम उपयोगिता को देखते हुए बंद कर दिया है. अभी 60 हजार हेक्टेयर में हो रही सिंचाई : परियोजना के तहत डैमों के साथ कनाल (नहर) का काम भी होना है. चारों डैमों में काम चल रहा है.
इसके अतिरिक्त सभी डैमों से जोड़नेवाले कनाल का काम भी चल रहा है. अभी करीब 60 हजार हेक्टेयर में सिंचाई का लाभ किसानों को मिल रहा है. इससे कुल 3.31 लाख हेक्टेयर में सिंचाई होने का लक्ष्य है. इस परियोजना के गालूडीह से ओड़िशा को पानी देने की योजना है. ओड़िशा को करीब 90 हजार हेक्टेयर में सिंचाई के लिए पानी देने की शर्त है. पश्चिम बंगाल की करीब पांच हजार हेक्टेयर के लिए पानी देना है.
28 मार्च 2017 को केंद्र ने दिया था 254 करोड़ : 28 मार्च 2017 को केंद्र सरकार ने परियोजना के लिए पहली किस्त के रूप में 254 करोड़ रुपये प्रदान किया था. वहीं उपयोगिता प्रमाण पत्र देने पर दूसरी किस्त की राशि देने को कहा था. वित्तीय वर्ष की समाप्ति से दो दिन पहले मिली राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं दिये जाने के कारण दूसरे किस्त की राशि नहीं मिल पायी .
सिंचाई के साथ पेयजलापूर्ति की भी योजना : इस परियोजना का लाभ पेयजलापूर्ति के लिए मानगो, आदित्यपुर, चाईबासा, राजनगर व अन्य को मिलना है. वहीं, सिंचाई का लाभ झारखंड के 2.36 लाख हेक्टेयर भूमि, ओड़िशा को 90 हजार हेक्टेयर व पश्चिम बंगाल को पांच हजार हेक्टेयर को मिलना है. चांडिल नहर से आठ मेगावाट की पनबिजली उत्पादन की योजना भी है. इससे झारखंड के जमशेदपुर, प बंगाल के मिदनापुर व ओड़िशा के बारीपदा जिले के बाढ़ नियंत्रण भी करना है.
भारत सरकार से एकरारनामा के तहत परियोजना को वर्ष 2019-20 तक पूरा करना है. झारखंड सरकार परियोजना को शीघ्र पूरा करना चाहती है. परियोजना में विलंब होने का मुख्य कारण केंद्र सरकार द्वारा समय पर राशि नहीं मिलना है. भारत सरकार की नयी भू-अर्जन नीति के कारण परियोजना की लागत बढ़ गयी है. यह भार केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए.
चंद्र प्रकाश चौधरी,
जल संसाधन मंत्री, झारखंड
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