रक्तदान से डरते थे ग्रामीण, तो साइकिल से ही नाप डाले 40 गांव, जानें इस रक्तवीर की जिद और जुनून की कहानी
साइकिल के साथ सुनील दे और अन्य (फाइल फोटो).
जमशेदपुर के सुनील दे ने 29 साल पहले साइकिल पर सवार होकर ग्रामीण इलाकों में रक्तदान की अलख जगाई. डर और भ्रांतियों के बीच उन्होंने 40 गांवों में जाकर लोगों को जागरूक किया.
जमशेदपुर : आज ग्रामीण इलाकों में रक्तदान शिविर लगना और लोगों का स्वेच्छा से रक्तदान के लिए आगे आना सामान्य बात लग सकती है. लेकिन करीब तीन दशक पहले तस्वीर ऐसी नहीं थी. गांवों में रक्तदान को लेकर लोगों के मन में डर और कई तरह की भ्रांतियां थीं. ऐसे समय में पोटका के नुआग्राम निवासी सुनील दे ने एक ऐसी मुहिम शुरू की, जिसने धीरे-धीरे ग्रामीण समाज की सोच बदल दी. उनके पास न कोई बड़ा संसाधन था, न प्रचार का आधुनिक माध्यम. थी तो सिर्फ एक साइकिल, लोगों को समझाने का जुनून और रक्तदान के जरिए किसी की जिंदगी बचाने का संकल्प.
29 सालों से जारी है यात्रा
साल 1997 में शुरू हुई उनकी यह यात्रा आज 29 साल बाद भी जारी है. सुनील कुमार दे की प्रेरणा और मार्गदर्शन में ग्रामीण क्षेत्रों में 60 से अधिक रक्तदान शिविर आयोजित हो चुके हैं. कभी रक्तदान के नाम से झिझकने वाले गांवों में आज लोग स्वेच्छा से रक्तदान करने के लिए आगे आते हैं. यही वजह है कि कई लोग उन्हें ग्रामीण क्षेत्र में रक्तदान की मुहिम का जनक और प्रेरणास्रोत मानते हैं.
जमशेदपुर से मिली प्रेरणा, गांव में शुरू हुआ अभियान
पोटका के नुआग्राम निवासी स्वर्गीय मोहिनी मोहन दे और स्वर्गीय बेला रानी दे के पुत्र सुनील कुमार दे साहित्य, संस्कृति, धर्म और समाजसेवा से लंबे समय से जुड़े रहे हैं. करीब 45 वर्षों से वे विभिन्न समितियों, संगठनों और आश्रमों के माध्यम से जनजागरण और जनकल्याण के कार्यों में सक्रिय हैं. 1997 में सुनील दे जमशेदपुर के दूरसंचार विभाग में कार्यरत थे. जनवरी 1997 में उनकी मुलाकात वीबीडीए के सुनील मुखर्जी से हुई. बातचीत के दौरान रक्तदान को लेकर चर्चा हुई.

साइकिल रैली निकालकर ग्रामीणों को किया जागरूक
उस समय नुआग्राम में विवेकानंद युवा समिति काफी सक्रिय थी. सुनील दे ने समिति के सदस्यों से रक्तदान शिविर आयोजित करने को लेकर चर्चा की. इसके बाद वे टेल्को रिक्रिएशन क्लब पहुंचे. रक्तदान से संबंधित प्रशिक्षण लिया. उन्होंने वीबीडीए की सदस्यता भी ली. यहीं से उनके जीवन की एक नई सामाजिक यात्रा शुरू हुई. विवेकानंद युवा समिति के सदस्यों के साथ उन्होंने साइकिल रैली निकाली. करीब 40 गांवों में घूम-घूमकर लोगों को रक्तदान के बारे में जानकारी दी. ग्रामीणों के बीच बैठकर उन्होंने रक्तदान की जरूरत और इसके महत्व को समझाया.
लाेगों का डर और भ्रम दूर करना बड़ी चुनौती
लोगों के मन में मौजूद डर और भ्रम को दूर करना सबसे बड़ी चुनौती थी. लेकिन सुनील दे और उनकी टीम लगातार लोगों से संवाद करती रही. धीरे-धीरे ग्रामीणों का भरोसा बढ़ने लगा. इसके बाद 8 मई 1997 को लगातार प्रचार और जागरूकता अभियान के बाद वह दिन आया, जिसका इंतजार सुनील दे और उनकी टीम कर रही थी. इस दिन नुआग्राम में ग्रामीण अंचल का पहला रक्तदान शिविर आयोजित किया गया.

पहले शिविर में 63 लोगों ने किया था रक्तदान
शिविर में 63 लोगों ने स्वेच्छा से रक्तदान किया. इनमें नुआग्राम के ही 33 लोग शामिल थे. खास बात यह रही कि रक्तदान करने वालों में 11 महिलाएं भी थीं. शिविर में सुनील कुमार दे के अलावा शंकर चंद्र गोप, सावित्री गोप, तरुण दे, निर्मला दे, प्रशांत दे, शैलेन्द्र प्रामाणिक और नारायण चटर्जी समेत समिति के कई सदस्यों ने रक्तदान किया. वहीं, यह सफर आज भी जारी है. अब तक विभिन्न शिविर में हजारों यूनिट रक्त संग्रह किया जा चुका है.
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