::: खुली आंखों से महामाया मां को नहीं देख सकते
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 20 Oct 2015 6:33 PM
::: खुली आंखों से महामाया मां को नहीं देख सकते प्रतिनिधि, गुमलागुमला से 26 किमी दूर घाघरा प्रखंड में हापामुनी गांव है. यहां अति प्राचीन महामाया मंदिर है, जो हापामुनी गांव के बीच में है. इस मंदिर से हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है. यह अपने अंदर कई इतिहास समेटे हुए है. महामाया मां की […]
::: खुली आंखों से महामाया मां को नहीं देख सकते प्रतिनिधि, गुमलागुमला से 26 किमी दूर घाघरा प्रखंड में हापामुनी गांव है. यहां अति प्राचीन महामाया मंदिर है, जो हापामुनी गांव के बीच में है. इस मंदिर से हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है. यह अपने अंदर कई इतिहास समेटे हुए है. महामाया मां की मूर्ति होने के कारण दुर्गापूजा में इसका महत्व बढ़ जाता है. इस मंदिर की स्थापना आज से 11 सौ साल (विक्रम संवत 965 में) पहले हुआ था. मंदिर के अंदर में महामाया की मूर्ति है. परंतु महामाया मां को मंजुषा (बक्सा) में बंद करके रखा जाता है. क्योंकि महामाया मां को खुले आंख से देख नहीं सकते हैं. चैत कृष्णपक्ष परेवा को जब डोल जतरा का महोत्सव होता है, तब मंजुषा को डोल चबूतरा पर निकाल कर मंदिर के मुख्य पुजारी द्वारा खोल कर महामाया की पूजा की जाती है. पूजा के दौरान पुजारी आंख में काले रंग का पट्टी लगा लेता है. ऐसे मंदिर के बाहर में एक दूसरे महामाया मां की प्रतिमा स्थापित की गयी है. भक्तजन उसी में पूजा-अर्चना करते हैं. मंदिर के मुख्य पुजारी दीवाकरमणी पाठक विशेष अवसरों पर यहां संपूर्ण पूजा पाठ कराते हैं. इस मंदिर से लरका आंदोलन का भी इतिहास जुड़ा हुआ है. बाहरी लोगों ने यहां आक्रमण कर बरजू राम की पत्नी व उसके बच्चे की हत्या कर दी. उस समय बरजू राम महामाया मां की पूजा में लीन था. बरजू राम का सहयोगी राधो राम था, जो दुसाध जाति का था. राधो राम ने बरजू को उसकी पत्नी व बच्चे की हत्या की जानकारी दी. इसके बाद मां की शक्ति से राधो राम आक्रमणकारियों पर टूट पड़ा. इस दौरान मां ने कहा कि तुम अकेले सबसे लड़ सकते हो, लेकिन जैसे ही पीछे मुड़ कर देखोगे, तुम्हारा सिर धड़ से अलग हो जायेगा. मां की कृपा से राधो तलवार लेकर आक्रमणकारियों से भिड़ गये और सभी का सिर काटने लगे. पर, राधो जैसे ही पीछे मुड़ कर देखा. उसका सिर धड़ से अलग हो गया. आज भी हापामुनी में बरजू व राधो की समाधि स्थल व जिस स्थान पर वह बैठ कर पूजा करता था, आज भी विद्यमान है. मुख्य मंदिर खपड़ा का बना हुआ है.
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