बिना ‘चाणक्य’ के पहला चुनाव लड़ेगा सिंह मेंशन
Updated at : 12 Nov 2019 8:41 AM (IST)
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एस कुमार, धनबाद : रागिनी सिंह सिंह मेंशन की ऐसी दूसरी महिला हैं, जो झरिया विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. इनसे पहले उनकी सास कुंती सिंह दो बार यहां का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. रागिनी, विधायक संजीव सिंह की पत्नी हैं. दरअसल, सिंह मेंशन परिवार के सदस्यों की जीत […]
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एस कुमार, धनबाद : रागिनी सिंह सिंह मेंशन की ऐसी दूसरी महिला हैं, जो झरिया विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं. इनसे पहले उनकी सास कुंती सिंह दो बार यहां का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. रागिनी, विधायक संजीव सिंह की पत्नी हैं. दरअसल, सिंह मेंशन परिवार के सदस्यों की जीत में ‘चाणक्य’ कहे जानेवाले रामधीर सिंह की उत्कृष्ट रणनीति काफी काम आती थी.
सत्ता की सीढ़ियां चढ़ाने के प्रबंधकीय गुण की चर्चा इनके विरोधी भी करते रहे हैं. साल 1977 के बाद यह पहला मौका है, जब सिंह मेंशन अपने चाणक्य और कोयला मजदूरों के बीच चाचा के नाम से प्रसिद्ध रामधीर सिंह की अनुपस्थिति में चुनाव लड़ रहा है. रागिनी सिंह को भी अपने चाचा ससुर की कमी काफी खल रही है.
याद रहे कि जनता मजदूर संघ के अध्यक्ष रामधीर सिंह लगभग ढाई साल से रांची के होटवार जेल में बंद हैं. अप्रैल, 2015 में धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी. फरार चल रहे श्री सिंह ने 20 फरवरी, 2017 को कोर्ट में सरेंडर किया था, जहां से वे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिये गये थे.
कोयलांचल में यह चर्चित रहा है कि झरिया से सिंह मेंशन का कोई भी उम्मीदवार हो, पर असली चुनाव रामधीर सिंह ही लड़ते थे. साल 1977 से 1991 तक सूर्यदेव सिंह विधायक रहे. इनके निधन के बाद 1991 में हुए उप चुनाव एवं 1995 में हुए चुनाव में आबो देवी चुनाव जीतीं. तब एकीकृत बिहार में लालू यादव का राज था.
विरोधियाें से भी मांगते थे वाेट
विधायक सूर्यदेव सिंह के आकस्मिक निधन एवं जनता दल नेता राजू यादव की मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर हत्या होने के बाद झरिया उप चुनाव में राजू की पत्नी आबो देवी को जनता दल से टिकट मिला.
लालू प्रसाद ने चुनाव को प्रतिष्ठा का विषय बना लिया था. साल 2000 के चुनाव में बच्चा सिंह ने चुनाव जीत फिर झरिया को मेंशन के कब्जे में किया. तबसे इस सीट पर मेंशन का ही कब्जा रहा है. साल 2005 एवं 2009 में कुंती देवी यहां से विधायक बनीं, तो 2014 में संजीव सिंह. अभी संजीव कांग्रेस नेता नीरज सिंह हत्याकांड में जेल में बंद हैं. ऐसे में उनकी पत्नी रागिनी सिंह को भाजपा ने चुनावी समर में उतारा है.
मेंशन के करीबी बताते हैं कि रामधीर सिंह हर विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी से अधिक मतदाताओं के संपर्क में रहते थे. वह अलस्सुबह पांच बजे से देर रात तक चुनावी प्रचार जुटे रहते. मीटिंग या सभा करने की बजाय एक-एक मतदाता के घर जाकर संपर्क करने में विश्वास करते थे. झरिया क्षेत्र के एक मतदाता के मुताबिक, चुनाववाले दिन से पहले तक वह हर घर में संपर्क जरूर कर लेते थे.
रामधीर धुर विरोधी के घर जाकर भी वोट मांगने से परहेज नहीं करते थे. इसका उदाहरण एवं चुनावी प्रबंधन का कौशल 2010 का धनबाद नगर निगम चुनाव है. उन्होंने अपनी पत्नी इंदु देवी को नगर निगम के मेयर का चुनाव जीता कर प्रथम मेयर बनवा दिया और स्वयं यूपी के बलिया जिले में जिला परिषद अध्यक्ष बन बैठे.
- विनोद सिंह हत्याकांड में काट रहे आजीवन कारावास की सजा
- राजनीतिक तौर पर रामधीर को माना जाता है उत्कृष्ट रणनीतिकार
- चुनावी समर में हर बार दिलायी परिवार के सदस्य को जीत
विश्वस्तों ने भी मोड़ा मुंह
वैसे इस चुनाव में चाचा ही नहीं, सिंह मेंशन के विश्वस्त लोगों की कमी भी कम नहीं खलेगी. लंबे समय तक अतिविश्वस्त रहे केडी पांडेय ने ऐन चुनाव के दौरान पाला बदल लिया है. इससे सिंह मेंशन के खेमे में खलबली मची है. श्री पांडेय कभी बच्चा सिंह, कुंती देवी और संजीव सिंह के चुनाव एजेंट हुआ करते थे. अब देखना दिलचस्प होगा कि सिंह मेंशन में अध्यक्ष और चाचा की भूमिका कौन निभाता है.
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