19.40 करोड़ के वाहनों में लगा जंग

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 Nov 2019 8:36 AM

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धनबाद : चार माह से खड़ा है 60 लाख का गारबेज ठेला नगर निगम के गारबेज ठेले में भी जंग लगने लगा है. छह माह पहले डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन के लिए 60 लाख की लागत से 200 पीस गारजेब ठेला खरीदा गया. मुश्किल से चार माह भी नहीं चला और एक के बाद एक गारबेज […]

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धनबाद : चार माह से खड़ा है 60 लाख का गारबेज ठेला नगर निगम के गारबेज ठेले में भी जंग लगने लगा है. छह माह पहले डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन के लिए 60 लाख की लागत से 200 पीस गारजेब ठेला खरीदा गया. मुश्किल से चार माह भी नहीं चला और एक के बाद एक गारबेज ठेला बंद हो गया. पिछले चार माह से माडा परिसर के पीछे गारबेज ठेला खड़ा है. कुछ ठेला का पहिया गायब हो गया है तो कुछ में जंग लगना शुरू हो गया है.

किसी बस का पहिया गायब तो किसी की सड़ गयी बॉडी
पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देेने के लिए 2010 में 14 करोड़ में 70 सिटी बसें खरीदी गयीं. लेकिन कभी भी सभी बस सड़कों पर नहीं उतरी. जिसने भी बसों का संचालन किया, सिर्फ कमाई की. कभी मेंटेनेंस नहीं किया. लिहाजा एक के बाद एक बस खराब होती चली गयी. स्थिति यह है कि कुछ का पहिया गायब है तो कुछ की बॉडी सड़ गयी है.
कई बसों की बैटरी नहीं है. कुछ माह तक भूतपूर्व सैनिक संघ ने सिटी बसों का परिचालन कराया. इसके बाद झारखंड टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (जेटीडीसी) को संचालन का जिम्मा मिला. तीन साल तक जेटीडीसी ने बसों का परिचालन कराया. 2014 में निगम को हैंड ओवर किया गया. लाखों रुपये खर्च कर 15 बसों की मरम्मत करायी गयी. पांच बसों को महिला समूह व 10 बसों को ट्रांसपोर्टर को चलाने को दिया गया है.
मुख्य बिंदु
2010 में उतारी गयीं सिटी बस
भूतपूर्व सैनिक संघ व जेटीडीसी ने बसें तो चलायीं, लेकिन मेंटेनेंस नहीं किया
70 में कभी भी 40 से अधिक बसों का परिचालन नहीं हुआ
2014 में नगर निगम को हैंड ओवर हुआ
चार से पांच हजार मासिक पर 15 बसों का हो रहा परिचालन
विवाद की भेंट चढ़ गया 4.75 करोड़ का टिपर
ए टू जेड के साथ निगम का 2014 से कोर्ट में मामला चल रहा है. पांच साल से बरटांड़ बस डिपो में टिपर खड़ा है. सभी टिपर की बॉडी सड़ गयी है. किसी का पहिया नहीं है तो किसी का स्टियरिंग. कुछ टिपर का बोनट व आगे का शीशा टूटा हुआ है. ए टू जेड की गवाही के बाद अब नगर निगम की गवाही शुरू हुई है. फैसला जिसके भी पक्ष में आये. टिपर की जो स्थिति है उसे कबाड़ में ही बेचना पड़ेगा.
मुख्य बिंदु
सफाई के लिए ए टू जेड व निगम के बीच हुआ था 30 वर्षों का करार
इसके लिए 35 करोड़ ग्रांड राशि थी निर्धारित
टिपर खरीदने के लिए निगम ने ए टू जेड को दिया था 4.70 करोड़
2013 से शुरू हुआ विवाद
2014 में ए टू जेड ने हाई कोर्ट में रिट फाइल की
2015 से मामला आर्बिटेशन में चल रहा है.
2015 से बरटांड़ बस परिसर में खड़े हैं 70 टिपर
हाल यह कि कबाड़ में बेचना पड़ेगा
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