आधुनिक स्वरूप कर रहा आकर्षित

By Prabhat Khabar Digital Desk
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बोकारो: बोकारो में आम तौर पर मंदा रहने वाला खादी का बाजार स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस व गांधी जयंती के मौके पर चमक जाता है. खादी का तिरंगा, खादी टोपी, खादी कुरता-पजामा की बिक्री बढ़ जाती है. लिनेन व सिंथेटिक्स के जमाने में खादी को अपना अस्तित्व बचाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ रहा है. खादी उद्योग सरकारी अनुदान पर निर्भर है.

खादी ने बदला स्वरूप : बाजार में कई देशी-विदेशी ब्रांड के कपड़े उपलब्ध है, जो खादी की तुलना में सस्ते व टिकाऊ कपड़े ग्राहकों तक पहुंचाते हैं. इन सब चुनौतियों के बावजूद खादी भी खुद को बाजार में बनाये रखने में सफल है. आजादी की लड़ाई में एक विचार बन चुकी खादी ने अपना स्वरूप बदल दिया है. पहले खादी के कपड़े कुछ चुनिंदा लोग ही इस्तेमाल करते थे, लेकिन जब से खादी ने अपना स्वरूप बदला है, तब से युवा भी इसे अपना रहे हैं. खादी को लिनेन के रूप में लाया जा रहा है. रेडिमेड बाजार में भी खादी निर्मित कपड़े उपलब्ध हैं.

छूट का फायदा उठा रहे बोकारोवासी

फिलवक्त खादी के कपड़ों पर मिल रही 10 फीसदी छूट का फायदा भी लोग उठा रहे हैं. लगभग पूरे साल बोकारो में खादी कपड़ों की बिक्री औसतन 35,000 से 45,000 रुपये हर महीने होती है. बोकारो में खादी की चार दुकानें हैं. इसमें एक सरकारी व तीन निजी है. इस वर्ष 14 अगस्त तक बोकारो में 22,000 रुपये की खादी के कपड़े बिक चुके है. बाजार में 70 रुपये प्रति मीटर से लेकर 500 मीटर तक के खादी के विभिन्न वैराइटी उपलब्ध हैं.

क्या है परेशानी

काफी लोगों को इस खादी की याद स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या गांधी जयंती में ही आती है. खादी के कपड़े अन्य कपड़ों की तुलना में महंगे होते है, इसके अलावा इनकी लाइफ भी अन्य कपड़ों की तुलना में कम होती है.

आरामदेह कपड़ों के शौकीन लोग खादी को अपनाते है. खादी अपना पहचान विदेशों में बना रहा है, पर भारतीय बाजार में विदेशी अतिक्रमण के कारण अपने ही देश में खादी की चमक फीकी पड़ रही है. आजादी के दिन ही लोगों को खादी की याद आती है.

ललन प्रसाद सिंह, प्रबंधक, जोहार खादी ग्राम उद्योग

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