बाहुबली सूरजभान सिंह की पूरी कहानी: पिता चाहते थे कि बेटा बने फौजी, फिर जुर्म की दुनिया में रखा कदम और ऐसे बदल गई पूरी जिंदगी
सूरजभान सिंह की कहानी
Surajbhan Singh Story: मोकामा के बाहुबली से सांसद बनने तक सूरजभान सिंह का सफर काफी दिलचस्प और विवादों से भरा रहा है. अपराध की दुनिया में नाम आने से लेकर जेल में रहते हुए चुनाव जीतने और फिर संसद पहुंचने तक की कहानी में कई बड़े मोड़ आए. आइए जानते हैं, कैसे बदली सूरजभान सिंह की जिंदगी की पूरी कहानी.
Surajbhan Singh Story: बिहार की सियासत में कुछ नाम ऐसे रहे हैं, जिनकी कहानी राजनीति से ज्यादा उनके बाहुबल और अपराध की चर्चाओं से जुड़ी रही. सूरजभान सिंह भी ऐसा ही एक नाम हैं. कभी मोकामा और आसपास के इलाकों में दबदबे के लिए चर्चित रहे सूरजभान ने बाद में चुनावी राजनीति में कदम रखा और सांसद तक का सफर तय किया.
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उनकी जिंदगी में अपराध के आरोप, गैंगवार, जेल, चुनावी राजनीति और सत्ता के गलियारों तक पहुंचने की कहानी एक साथ दिखाई देती है. बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड से लेकर उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला से उनके संबंधों तक की चर्चा लंबे समय तक होती रही. हालांकि, बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में सूरजभान सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था.
अब जब उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर सामने आई है, तो एक बार फिर सूरजभान सिंह चर्चा में हैं. करीब एक सप्ताह पहले पटना स्थित आवास पर सीने में तेज दर्द के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसके बाद उन्हें दिल्ली ले जाया गया और अब चेन्नई रेफर किए जाने की जानकारी सामने आई है.
लेकिन उनकी कहानी सिर्फ आज की खबर तक सीमित नहीं है. आइए जानते हैं मोकामा के एक किसान परिवार के इस लड़के के बाहुबली बनने और फिर सांसद की कुर्सी तक पहुंचने की पूरी कहानी.
पिता चाहते थे बेटा फौज में जाए
सूरजभान सिंह का जन्म 5 मार्च 1965 को पटना जिले के मोकामा के शंकरबाग टोले में हुआ था. परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. उनके पिता एक स्थानीय कारोबारी की दुकान पर काम करते थे.
सूरजभान के बड़े भाई CRPF में भर्ती हो गए. इसके बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर हुई. पिता चाहते थे कि छोटा बेटा भी सेना में जाए.
बताया जाता है कि एक दिन पिता ने सूरजभान से कहा कि उनकी लंबी कद-काठी है और वह दौड़-भाग भी कर लेते हैं. इसलिए उन्हें सेना की तैयारी करनी चाहिए. लेकिन सूरजभान का मन कुछ और करने का था. उन्होंने सेना में भर्ती होने की बजाय अपनी अलग राह चुन ली.
यहीं से उनकी जिंदगी धीरे-धीरे उस रास्ते पर बढ़ने लगी, जिसने आगे चलकर उन्हें बिहार के चर्चित बाहुबलियों में शामिल कर दिया.
18 साल की उम्र से पहले अपराध की दुनिया में कदम
सूरजभान के बारे में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, कम उम्र में ही उनका नाम छोटे-मोटे अपराधों में आने लगा था. बाद में वह मोकामा के प्रभावशाली नेता और बाहुबली दिलीप सिंह के संपर्क में आए.
उस दौर में मोकामा की राजनीति और अपराध की दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी हुई मानी जाती थी. जमीन विवाद, रंगदारी और वर्चस्व की लड़ाई आम चर्चा का हिस्सा थे. सूरजभान भी इसी माहौल में आगे बढ़ते गए. धीरे-धीरे उनका प्रभाव बढ़ा और मोकामा में उनका नाम दबदबे के साथ लिया जाने लगा.
परिवार उनके रास्ते से परेशान था
सूरजभान के अपराध की दुनिया में बढ़ते कदमों का असर उनके परिवार पर भी पड़ा. एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक बार उनके पिता के परिचित और कारोबारी से रंगदारी मांगे जाने की बात सामने आई. कहा जाता है कि वह कारोबारी सूरजभान के पिता के पास पहुंचे और बेटे को समझाने की गुहार लगाई. पिता ने बेटे से नाराजगी जताई और उसे इस रास्ते से लौटने को कहा.
लेकिन सूरजभान नहीं माने.
रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस घटना का उनके पिता पर गहरा असर पड़ा और बाद में उन्होंने आत्महत्या कर ली. उनके बड़े भाई भी इस घटना और परिवार की परिस्थितियों से बेहद परेशान थे. कुछ समय बाद उनके बड़े भाई की भी आत्महत्या की खबर सामने आई. यह सूरजभान की जिंदगी का बेहद दुखद दौर था.
मोकामा में बढ़ता गया दबदबा
1990 के दशक में मोकामा की राजनीति में बड़े बदलाव हो रहे थे. दिलीप सिंह ने चुनाव जीतकर राजनीति में मजबूत जगह बनाई और सरकार में मंत्री बने. इसके बाद उनके लिए सीधे तौर पर अपराध की दुनिया में सक्रिय रहना मुश्किल था. ऐसे में उनके पुराने सहयोगी सूरजभान का प्रभाव और बढ़ा.
इसी दौर में सूरजभान का नाम कई आपराधिक मामलों में सामने आया. हालांकि, हर मामले में आरोप साबित नहीं हुए और कई मामलों में उन्हें अदालतों से राहत भी मिली. उनका नाम जमीन विवाद से लेकर हत्या और अन्य आपराधिक मामलों में सामने आता रहा.
श्रीप्रकाश शुक्ला से जुड़ा नाम
सूरजभान सिंह की कहानी का एक बड़ा अध्याय उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला से उनके संबंधों को लेकर है. पूर्व IPS अधिकारी राजेश पांडेय ने एक इंटरव्यू में सूरजभान और श्रीप्रकाश शुक्ला के संबंधों के बारे में कई बातें बताई थीं. उनके मुताबिक, रेलवे ठेकों को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में सूरजभान की दिलचस्पी थी.
राजेश पांडेय के मुताबिक, सूरजभान की मुलाकात श्रीप्रकाश शुक्ला से इसी दौर में हुई. दोनों के बीच नजदीकी बढ़ी और हथियारों को लेकर भी चर्चा हुई.
पांडेय के अनुसार, सूरजभान ने श्रीप्रकाश शुक्ला को एक नहीं बल्कि दो AK-47 देने की बात कही थी. बदले में वीरेंद्र प्रताप शाही को रास्ते से हटाने की बात कही गई थी. बाद की घटनाओं में शाही पर हमला हुआ, जिसमें उनका गनर मारा गया और शाही घायल हुए. यह पूरा घटनाक्रम पूर्व IPS अधिकारी के बयानों और उनकी किताब वर्चस्व में भी लिखा गया है.
यही वह दौर था जब उत्तर भारत की अपराध की दुनिया में AK-47 का इस्तेमाल भी चर्चा में आने लगा था. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के हवाले से रिपोर्टों में सूरजभान को श्रीप्रकाश शुक्ला तक हथियार पहुंचाने वाले प्रमुख लोगों में बताया गया है.
पुलिस से मुठभेड़ और पैर में लगी गोली
1997 के आसपास मोकामा में पुलिस की एक कार्रवाई के दौरान सूरजभान और पुलिस के बीच गोलीबारी की घटना भी सामने आई थी. इस दौरान सूरजभान के पैर में गोली लगी थी. इलाज के लिए उन्हें छिपते हुए अलग-अलग जगहों पर जाना पड़ा.
बताया जाता है कि पटना में इलाज के बाद भी उनका पैर पूरी तरह ठीक नहीं हुआ. संक्रमण बढ़ने की वजह से उनकी हालत बिगड़ती गई. इलाज के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश ले जाया गया. वहां भी पुलिस को उनके ठिकाने की जानकारी मिल गई. पुलिस की कार्रवाई की खबर मिलते ही उन्हें अस्पताल से निकाल दिया गया.
इसके बाद वह कुछ समय तक फरार रहे और नेपाल तक चले गए. आखिरकार बिहार पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. गिरफ्तारी के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. यहीं से उनकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ आया.

जेल से शुरू हुई राजनीति की तैयारी
साल 2000 का बिहार विधानसभा चुनाव सूरजभान के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. उस समय वह जेल में थे. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक उनके खिलाफ बिहार और उत्तर प्रदेश में कई आपराधिक मामले दर्ज थे. इसके बावजूद उन्होंने मोकामा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया.
सामने थे उनके पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी दिलीप सिंह. सूरजभान निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे. चुनाव परिणाम आया तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई.
सूरजभान सिंह ने 1,02,499 वोट हासिल किए. उनके प्रतिद्वंद्वी दिलीप सिंह को 43,028 वोट मिले. यानी सूरजभान ने करीब 59 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. जेल में रहते हुए एक बाहुबली का विधायक बन जाना बिहार की राजनीति की बड़ी घटनाओं में गिना गया.
2004 में सांसद बने सूरजभान
विधायक बनने के बाद सूरजभान सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाया.
साल 2004 में उन्होंने रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का दामन थामा. इसी साल उन्होंने बलिया लोकसभा सीट से LJP के टिकट पर चुनाव लड़ा. वह चुनाव जीत गए. इस तरह मोकामा के बाहुबली के तौर पर चर्चित सूरजभान सिंह अब संसद तक पहुंच चुके थे. उनका सफर बेहद तेजी से बदला था. कुछ साल पहले तक जिनका नाम पुलिस और अपराध की खबरों में आता था, वही अब संसद में बैठ रहे थे.

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बृजबिहारी प्रसाद हत्याकांड में आया नाम
सूरजभान सिंह के राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित मामला पूर्व मंत्री बृजबिहारी प्रसाद की हत्या से जुड़ा रहा. 13 जून 1998 को पटना के IGIMS परिसर में बृजबिहारी प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. उनके बॉडीगार्ड की भी मौत हुई थी.
जांच के दौरान सूरजभान समेत कई लोगों के नाम सामने आए. निचली अदालत ने 2009 में कई आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. हालांकि, 2014 में पटना हाईकोर्ट ने सबूतों के आधार पर सभी आरोपियों को बरी कर दिया था.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपियों की सजा बरकरार रखी, जबकि सूरजभान सिंह समेत अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किए जाने के फैसले को कायम रखा.
उम्रकैद की सजा ने रोक दी चुनावी पारी
सूरजभान सिंह की राजनीतिक पारी हालांकि लंबी नहीं चल सकी. बेगूसराय के किसान रामी सिंह की हत्या के मामले में उन्हें निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई. इसके बाद चुनाव लड़ने पर कानूनी रोक लग गई. इस वजह से वह खुद चुनाव नहीं लड़ पाए. लेकिन राजनीति से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ.
पत्नी और भाई ने संभाली राजनीतिक विरासत
सूरजभान के चुनाव नहीं लड़ पाने के बाद उनकी पत्नी वीणा देवी ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई. 2014 में उनकी पत्नी मुंगेर लोकसभा सीट से सांसद बनीं. इसके बाद परिवार की राजनीतिक पकड़ बनी रही.
2018 में सूरजभान के बड़े बेटे की सड़क हादसे में मौत हो गई. इस दुखद घटना के बाद कई बड़े नेता उनके घर पहुंचे थे.
2019 में उनके भाई चंदन सिंह नवादा से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने. यानी जिस परिवार की पहचान कभी मोकामा के बाहुबली परिवार के रूप में होती थी, वही परिवार धीरे-धीरे संसद और चुनावी राजनीति में भी अपनी जगह बना चुका था.
LJP टूटने के बाद बदला राजनीतिक ठिकाना
2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में टूट हुई. चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस अलग-अलग गुटों में चले गए. सूरजभान सिंह ने पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व वाले गुट का साथ दिया. वह राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी से जुड़े रहे. बिहार की राजनीति में उनकी भूमिका पर्दे के पीछे से सक्रिय मानी जाती रही.

2025 में फिर मोकामा पर नजर
साल 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में सूरजभान सिंह की राजनीति एक बार फिर मोकामा पहुंची. उन्होंने अपनी पत्नी वीणा देवी आरजेडी के टिकट पर मोकामा से चुनाव मैदान में उतारा. हालांकि, वह चुनाव जीत नहीं सकीं. मोकामा से अनंत सिंह ने जीत दर्ज की.
यह चुनाव सूरजभान के लिए एक तरह से उस इलाके में अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को वापस पाने की कोशिश के तौर पर देखा गया.
सूरजभान सिंह की कहानी बिहार की उस राजनीति को भी दिखाती है, जिसमें 1990 और 2000 के दशक में बाहुबलियों का प्रभाव बेहद मजबूत था. मोकामा की गलियों से शुरू हुआ उनका सफर अपराध की दुनिया की चर्चाओं से होता हुआ विधानसभा और फिर लोकसभा तक पहुंचा.
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