सीवान के भीखाबांध का भैया-बहिनी मंदिर क्यों है खास? भाई-बहन के प्रेम की अनोखी कहानी
एतिहासिक भईया-बहनी का मंदिर
बिहार के भीखाबांध गांव में स्थित भैया-बहिनी मंदिर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का अनूठा प्रतीक है. दो विशाल बरगद के पेड़, जो एक-दूसरे से जुड़े हैं, सदियों से इस प्रेम और विश्वास की कहानी बयां कर रहे हैं. रक्षाबंधन से एक दिन पहले यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.
Bhai Bahini Mandir: अनुमंडल मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर दारौंदा प्रखंड के भीखाबांध गांव स्थित ऐतिहासिक भैया-बहिनी मंदिर भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक बना हुआ है. यहां चार बीघे में फैले दो विशाल बरगद के पेड़ लोगों के आकर्षण और आस्था का केंद्र हैं. दोनों पेड़ एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं, जैसे भाई-बहन एक-दूसरे की रक्षा कर रहे हों.
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सावन पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन से एक दिन पहले यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. खासकर स्वर्णकार और कुम्हार समाज के लोग इस पूजा में बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. इस वर्ष भी 28 अगस्त को मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटी और लोगों ने श्रद्धा के साथ पूजा कर मन्नतें मांगीं.
मुगल काल से जुड़ी है मंदिर की कहानी
ग्रामीणों के अनुसार, भैया-बहिनी मंदिर की ऐतिहासिक कहानी मुगल काल से जुड़ी हुई है. बताया जाता है कि भभुआ से एक भाई अपनी बहन को रक्षाबंधन के दिन घर लेकर आ रहा था. इसी दौरान दरौंदा थाना क्षेत्र के भीखाबांध गांव के समीप गश्त कर रहे सिपाहियों ने बहन के साथ दुर्व्यवहार का प्रयास किया.
भाई ने इसका विरोध किया, लेकिन सिपाहियों की संख्या अधिक होने के कारण भाई-बहन खुद को असहाय महसूस करने लगे. मान्यता है कि बहन ने भगवान से अपनी इज्जत बचाने की प्रार्थना की. इसके बाद अचानक धरती फटी और भाई-बहन उसी में समा गये.
बताया जाता है कि डोली लेकर चल रहे कुम्हारों ने भी पास के कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी. कुछ समय बाद उसी स्थान पर दो बरगद के पेड़ उग आये.
भाई-बहन की तरह एक-दूसरे से जुड़े हैं बरगद
ग्रामीणों के अनुसार, समय के साथ दोनों बरगद के पेड़ कई बीघे में फैल गये. इनकी बनावट ऐसी है कि दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं. इसी वजह से लोगों ने इन्हें भाई-बहन के प्रतीक के रूप में मानना शुरू कर दिया.
रास्ते से गुजरने वाले लोगों की नजर इन विशाल बरगद के पेड़ों पर बरबस पड़ती है. धीरे-धीरे यहां पूजा-अर्चना की परंपरा शुरू हुई और ग्रामीणों के सहयोग से भाई-बहन के पिंड के रूप में मंदिर का निर्माण कराया गया.
रक्षाबंधन से एक दिन पहले होती है विशेष पूजा
इस स्थल पर प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन से एक दिन पहले विशेष पूजा-अर्चना होती है. इस दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं और श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं. बहनें यहां पूजा कर अपने भाइयों की सलामती, उन्नति और लंबी उम्र की कामना करती हैं.
मंदिर में नहीं है किसी देवी-देवता की प्रतिमा
भैया-बहिनी मंदिर की खासियत यह है कि यहां किसी देवी-देवता की प्रतिमा या तस्वीर नहीं है. मंदिर के बीच में मिट्टी का एक पिंड बना हुआ है, जिसे भाई-बहन के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है. मंदिर के बाहर लगे विशाल बरगद के पेड़ों की भी श्रद्धालु पूजा करते हैं.
भाई-बहन के रिश्ते की अनूठी मिसाल
रक्षाबंधन पर बहनों द्वारा भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उनकी रक्षा और लंबी उम्र की कामना करने की परंपरा सदियों पुरानी है. वहीं भीखाबांध का भैया-बहिनी मंदिर भाई की सलामती, उन्नति और दीर्घायु के लिए बहनों की आस्था का अनूठा केंद्र है. यह स्थल भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, प्रेम और विश्वास की अलग पहचान बन चुका है.
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