पारा लुढ़का : बढ़ी कंपकंपी, घरों में दुबके लोग

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पारा लुढ़का : बढ़ी कंपकंपी, घराें में दुबके लोगस्टेशन पर जैसे-तैसे गुजरती है उनकी रात दो दिन से अचानक ठंड बढ़ गयी है. कल तक हाफ स्वेटर व हाइनेक से ठंड को मात दे रहे लोग अचानक ठंड बढ़ने से फूल स्वेटर व जैकेट पहनने लगे हैं. स्कूली बच्चों को भी स्वेटर पहन कर ही […]

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पारा लुढ़का : बढ़ी कंपकंपी, घराें में दुबके लोगस्टेशन पर जैसे-तैसे गुजरती है उनकी रात दो दिन से अचानक ठंड बढ़ गयी है. कल तक हाफ स्वेटर व हाइनेक से ठंड को मात दे रहे लोग अचानक ठंड बढ़ने से फूल स्वेटर व जैकेट पहनने लगे हैं. स्कूली बच्चों को भी स्वेटर पहन कर ही आने की हिदायत दी गयी है. ठंड से उन दुकानदारों की चांदी कटने लगी है जो ऊनी कपड़े, रजाइ व कंबल बेचते हैं. फोटो नंबर-16 से 18 तक स्टेशन पर लोगों की ऐसे गुजरती है रात, 19 कुहासे में ऐसी दिखती है सुबह, 20 रात में स्टेशन पर कुत्ते मचाते हैं उत्पात सीतामढ़ी. कहा जाता है कि गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है. पेट की खातिर लोगों को कितनी मेहनत व सितम उठानी पड़ती है, यह अन्य जगहों के अलावा रात में सीतामढ़ी रेलवे स्टेशन पर देखा जा सकता है. खुद व बाल-बच्चों की पेट की खातिर कैसे कोई रिक्शा चालक दिन भर रिक्शा चलाता है और स्टेशन परिसर में जैसे-तैसे सो कर रात बिता लेता है. पसीज जाता है दिल स्टेशन के प्लेटफॉर्म व बाहर में यात्री व मजदूर वर्ग के लोग जिस हालात में सोये रहते हैं, वह देख पत्थर दिल भी पसीज जाता है और तब लोगों को लगता है कि वास्तव में रिक्शा चलाने वाले व मजदूरी कर पेट भरने वाले न जाने कितनी मेहनत करते हैं और कैसे धूप, बारिश व ठंड में अपने शरीर को कष्ट देते हैं. सुरसंड प्रखंड के रधाउर गांव का रिक्शा चालक सुधीर कहता है कि पेट की खातिर शरीर को कष्ट देना लाजिमी है. घरारी को छोड़ खेती के लिए जमीन नहीं हैं. आय का एक मात्र साधन रिक्शा ही है. इससे उतनी आय नहीं हो पाती है कि स्टेशन परिसर को छोड़ किसी बेहतर ठौर पर रात गुजारे. इसी तरह की बातें और रिक्शा चालकों ने कही. पुल के नीचे गुजारते हैं रात रात में स्टेशन पर यात्रियों को सोने के लिए भी जगह नहीं मिल पाती है. रात में ट्रेनें कम चलती है. ट्रेन के इंतजार में यात्री स्टेशन पर रात गुजारने को विवश होते हैं. अधिकांश रात में देखा जाता है कि यात्रियों से प्रतीक्षालय भर जाता है और शेष यात्रियों को एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर जाने के लिए बनाये गये पुल के नीचे रात गुजारनी पड़ती है. गरम कपड़े की मांग बढ़ी ठंड के चलते गरम कपड़े की भी मांग बढ़ गयी है. रजाइ बनाने वालों का भी भाव बढ़ गया है. समाहरणालय के समीप रजाइ बना रहे कारीगर मो इदरिस ने बताया कि काम ठीक-ठाक चल रहा है. रेडिमेड कपड़ों के चलते उनके काम पर थोड़ा प्रभाव पड़ा है. मो महफूज बताते हैं कि पूर्व के वर्षों में रजाइ की मांग अधिक थी. ऑर्डर देने के चार दिन बाद ग्राहक को रजाइ दे पाते थे. अब हाथों-हाथ दे देते हैं. महंगाई बढ़ी है, पर मजदूरी नहीं. बच्चों व बुजुर्गों का बचाव जरूरी ठंड में विशेष कर बच्चों व बुजुर्गों को कुछ अधिक परेशानी होती है. इन्हें किस तरह से ठंड से बचाव किया जायेगा, को लेकर शहर के वरीय चिकित्सक डाॅ युगल किशोर प्रसाद से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ठंड के मौसम में श्वसन तंत्र से संक्रमण होने की अधिक संभावना रहती है. बच्चे अधिक प्रभावित होते हैं. इन दिनों वायरल इंफेक्शन की शिकायतें ज्यादा मिल रही है. बच्चों की नियमित सफाई व गरम कपड़ों से ढक कर रखने की जरूरत है. छह माह से कम उम्र के बच्चों को मां का दूध जरूरी है. वैसे भी स्तनपान से बच्चों में कई बीमारियां नहीं आती है. किसी भी तरह की शिकायत पर बच्चों को सबसे पहले ओआरएस का घोल दें और फिर चिकित्सक से सलाह लें. बुजुर्गों में लकवा, ब्रेन हेमरेज व हर्टअटैक आदि का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में बुजुर्गों को सुबह में टहलने से बचना चाहिए. गरम कपड़ा पहन कर ही उन्हें बाहर निकलना चाहिए. नमक की मात्रा कम लेनी चाहिए. फल व सब्जी की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए.

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