भिखारी की रचनाओं में अभिव्यक्ति की आवाज मुखर

Published at :18 Dec 2016 3:38 AM (IST)
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भिखारी की रचनाओं में अभिव्यक्ति की आवाज मुखर

डॉ (प्रो.) लालबाबू यादव सारण : भो जपुरी के शेक्सपियर उत्तर बिहार के भोजपुरी क्षेत्र के नव जागरण के पुरोधा लोक कलाकार, कवि और नाटककार भिखारी ठाकुर के जन्म के 129 वर्ष पूरे होने वाले है. 18 दिसंबर 1887 को उत्तर बिहार के सारण जिले के सदर प्रखंड में स्थित गंगा नदी के दियारे कुतुबपुर […]

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डॉ (प्रो.) लालबाबू यादव

सारण : भो जपुरी के शेक्सपियर उत्तर बिहार के भोजपुरी क्षेत्र के नव जागरण के पुरोधा लोक कलाकार, कवि और नाटककार भिखारी ठाकुर के जन्म के 129 वर्ष पूरे होने वाले है. 18 दिसंबर 1887 को उत्तर बिहार के सारण जिले के सदर प्रखंड में स्थित गंगा नदी के दियारे कुतुबपुर में उनका जन्म हुआ था. समाज के जातीय व्यवस्था में अत्यंत पिछड़ी जाति नाई समाज के उत्पन्न होने के कारण उन्हें अपने पुश्तैनी पेशे के चलते सवर्ण जमींदारों से सीधा वास्ता पड़ता था.
केश काटने, न्योता संवाद पहुंचाने तथा छोटे मोटे घरेलू कार्यो में जमींदार नाइयों से नौकर जैसा व्यवहार करते थे और उन्हें अत्यंत कम मजदूरी पर लगभग बेगार की स्थिति में काम करे को मजबूर कर देते थे. यही कारण है कि भिखारी ठाकुर की रचनाओं में समाज के इस वर्ग की पीड़ा देखने को मिलती है. अपनी पुस्तक नाई बहार में बड़े ही गंभीरता के साथ मार्मिक चित्रण किया है. भिखारी ने अपनी समस्त रचनाओं एवं नाटकों का केंद्र बिंदु सभी की पीड़ा को बनाने का प्रयास किया.
अपने नाटकों विदेशिया बेटी-बेचवा, बेटी विलाप आदि में हमें ठाकुर जी के इसी सभी वेदना की अभिव्यक्ति दिखलायी पड़ती है. उनके विदेशिया नाटक को देखने के लिए तो बंगाल के चटकल मजदूरों को टिकट के रूप में चार आने की राशि ही देनी पड़ती थी. भिखारी ठाकुर ने आज से लगभग 70 वर्ष पहले अपनी नाट्य रचना ‘पियउ निसइल’ में शराब के कारण टूटते परिवार की व्यथा-कथा को चर्चित किया है. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भूमंडलीकरण एवं, आर्थिक, राजनीतिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है. दुनिया में फैल रहे इस नये बाजार में धन उपार्जन के सभी नैतिक-अनैतिक आयामों को बदल दिया है.
उन्होंने अपनी नाट्य रचना बेटी बियोग में इसका चित्रण करते हुए समाज को यह सोचने को विवश कर दिया है कि मनुष्य चंद रूपयों की खातिर अपनी लाडली बेटी का बूढ़े से बेमेल विवाह कर उसे जीवन के नरक में ढकेल देता है. बेटी वियोग की सभी करूण क्रंदन करते हुए कहती है कि ‘’रूपिया गिनाई लिहल, पगहा धराई दिहल, चेरिया के छेरिया बनवल हो बाबू जी’’ यानि धन के लिए बेटी को खूंटे पर बंधे पशु की तरह बेचा जा सकता है. भिखारी ठाकुर ने एक साथ दलित चिंतन, स्त्री विमर्श, नशापान की समस्या, पलायन जैसे आज की गंभीर समस्याओं पर पूर्व में ही अपनी साहित्यिक अभिव्यक्ति से आज की समस्याओं को उकेर दिया था. उनकी साहित्यियक अवदानों की प्रासंगिकता बरकरार है.
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