नवजात मृत्यु दर कम करने के लिए स्तनपान पर फोकस

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पटना : नवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए राज्य में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाया जायेगा. इस अभियान में राज्य स्वास्थ्य समिति के साथ शिशु रोग विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जायेगा. राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा इस दिशा में गंभीरता से अभियान चलाया जायेगा. स्तनपान कराने से जन्म के […]

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पटना : नवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए राज्य में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम चलाया जायेगा. इस अभियान में राज्य स्वास्थ्य समिति के साथ शिशु रोग विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जायेगा. राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा इस दिशा में गंभीरता से अभियान चलाया जायेगा.

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स्तनपान कराने से जन्म के दो घंटे के अंदर स्तनपान कराने पर नवजातों की मृत्यु दर में कमी आती है. सिजेरियन प्रसव में भी एक घंटे के भीतर शिशु को स्तन पान कराने से मृत्यु में कमी आती है. जन्म के शुरुआती छह माह तक स्तनपान करनेवाले बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है.
जन्म के शुरुआती दो घंटों तक शिशु अधिक सक्रिय रहते हैं. इस दौरान शिशु स्तनपान करने में सक्षम भी होते हैं. छह माह तक केवल स्तनपान कराना चाहिए. उनको बाहर से कुछ भी नहीं देना चाहिए. यहां तक कि उन्हें ऊपर से पानी भी नहीं. देना चाहिए. स्टेट रिसोर्स यूनिट के बाल स्वास्थ्य टीम लीडर डाॅ पंकज मिश्रा ने बताया जन्म के शुरुआती एक घंटे के भीतर शिशुओं के लिए स्तनपान अमृत समान होता है.
जन्म के बाद शिशु सर्वाधिक सक्रिय अवस्था में रहते हैं और इस दौरान स्तनपान कराने से स्तनपान कर पाते हैं. स्तनपान करनेवाले बच्चों में निमोनिया एवं डायरिया जैसे गंभीर रोगों से भी बचाव होता है. उन्होंने बताया कि प्रसव के बाद मां के स्तन में एक चम्मच से अधिक दूध नहीं बनता है.
यह दूध गाढ़ा एवं पीला होता है. इसे क्लोस्ट्रम कहा जाता है. लोगों में इसे लेकर भ्रांतियां है. इसे गंदा या बेकार दूध समझकर शिशु को नहीं देने की सलाह देते हैं. लोग यह भी समझते हैं कि मां का दूध नहीं बन रहा है. इसे मानकर बाहर का दूध पिलाना शुरू कर देते हैं. बच्चे के लिए पहला गाढ़ा पीला दूध जरूरी है और मां का शुरुआती समय में कम दूध बनना भी एक प्राकृतिक प्रक्रिया ही है.
संबंधित आंकड़े
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के
अनुसार वर्ष 2005-06 में बिहार में केवल चार प्रतिशत बच्चे को ही एक घंटे के भीतर स्तनपान कराया जाता था. वर्ष 2015-16 में बढ़कर लगभग 35 प्रतिशत हो गया है.
छह माह तक केवल स्तनपान
नहीं करने वाले बच्चों में तुलनात्मक रूप से 14 गुना अधिक मृत्यु की संभावना होती है.
संक्रमण से होने वाली 88
प्रतिशत बाल मृत्यु दर में स्तनपान से बचाव होता है.
संपूर्ण स्तनपान से शिशुओं में
54 प्रतिशत डायरिया के मामलों में कमी आती है.
स्तनपान से शिशुओं में 32
प्रतिशत श्वसन संक्रमण के मामलों में कमी आती है.
शिशुओं में डायरिया के कारण अस्पताल में भर्ती होने के 72 प्रतिशत मामलों में स्तनपान बचाव करता है.
शिशुओं में श्वसन संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने के 57 प्रतिशत मामलों में स्तनपान बचाव करता है.
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