यूनीफॉर्म सिविल कोड मंजूर नहीं : रहमानी
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :27 Nov 2016 3:53 AM
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दस्तारबंदी. 40 आलिम तथा 37 हाफिज को पहनायी पगड़ी, सालाना इजलास आयोजित सालाना इजलास में बिहार के साथ ही झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व राजस्थान सहित अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में इस्लाम धर्मावलंबी शामिल हुए़ मुंगेर : ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव हजरत मौलाना वली […]
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दस्तारबंदी. 40 आलिम तथा 37 हाफिज को पहनायी पगड़ी, सालाना इजलास आयोजित
सालाना इजलास में बिहार के साथ ही झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व राजस्थान सहित अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में इस्लाम धर्मावलंबी शामिल हुए़
मुंगेर : ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव हजरत मौलाना वली रहमानी ने कहा है कि यूनीफॉर्म सिविल कोड किसी भी हाल में हमें मंजूर नहीं है. मुल्क के तमाम लोगों को अपने मजहब के अनुसार रहने का अधिकार है. इसलिए हर हाल में यूनीफॉर्म सिविल कोड का बहिष्कार किया जाय. वे शनिवार को मुंगेर स्थित खानकाह रहमानी में आयोजित सालान इजलास एवं दस्तारबंदी समारोह को संबोधित कर रहे थे. इस मौके पर उन्होंने आलिम तथा हाफिज की शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों की दास्तारबंदी की.
सालाना इजलास में बिहार के साथ ही झारखंड, बंगाल, उड़ीसा, दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व राजस्थान सहित अन्य राज्यों से हजारों की संख्या में इस्लाम धर्मावलंबी शामिल हुए़ जिन्होंने दस्तारबंदी कार्यक्रम के साथ-साथ देर शाम तक हजरत मौलाना सैयद मो वली रहमानी के तकरीर भी सुने़ रविवार को सुबह 9-12 बजे तक सालाना फातिया का आयोजन किया जायेगा़ जिसमें दूरदराज से आये इस्लाम धर्मावलंबी हजरत साहब से दुआ लेकर आपने-अपने घर जायेंगे़
77 छात्रों को बांधी गयी पगड़ी
जामे रहमानी मुंगेर से तालिम पूरी करने वाले कुल 40 छात्रों को आलिम तथा 37 छात्रों को हाफिज की दस्तार दी गयी़ मालूम हो कि आलिम की शिक्षा पूरी करने के लिए छात्रों को पूरे नौ साल तक शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है़ वहीं हाफिज की शिक्षा पूरी करने के लिए समय की कोई पाबंदी नहीं होती है़ वैसे छात्र जो कुरान को जुबानी सुना देता है, उसे यहां हाफिज का दस्तार दे दिया जाता है़ जामिया रहमानी में बिहार ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों सहित नेपाल तक के छात्र आ कर दीनी शिक्षा प्राप्त करते हैं.
लोगों को भा रहा लखनवी पराठा व हलुआ
फातिया के आयोजन को लेकर खाने-पीने का भी उत्तम प्रबंध है़ यूं तो भेजन के लिए कई अस्थायी होटल खोले गये हैं, किंतु लोगों को लखनवी पराठे खू भा रहे हैं. लोग बड़े चाव से पराठे, हलुवा, सोहन पापड़ी, मनसूर व खास्ते का लजीज स्वाद ले रहे हैं. उत्तर प्रदेश के लखनऊ से आये कारीगर मो. खालिद ने बताया कि लखनवी पराठे न सिर्फ देखने में आकर्षक लगते हैं, बल्कि इसका स्वाद भी बेहद लजीज होता है़ इसी कारण से लोग इसे बड़े ही चाव से खाते हैं.
तेल, पानी व रेवड़ी की भी खूब हो रही बिक्री
इस बड़े आयोजन में तेल, पानी, रेवड़ी तथा लुकुम दाना की भी खूब बिक्री हो रही है़ दुकानदार मो. इबराम ने बताया कि सालाना फातिया के दौरान हजरत साहब द्वारा दुआ पढ़ कर तेल व पानी दिया जाता है़ लोग इस तेल व पानी को अपने साथ घर ले जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि घर परिवार के किसी सदस्य को किसी प्रकार की परेशनी होने पर दुआ पढ़े गये तेल व पानी का प्रयोग किया जाता है, जिससे पीड़ित व्यक्ति को काफी लाभ मिलता है़ वहीं रेवड़ी तथा लुकुम दाना को लोग तबर्रुख (प्रसाद) के तौर पर अपने घर ले जाते हैं.
जमकर हो रही कपड़ों की खरीदारी
इस आयोजन को लेकर कपड़ों का भी एक बड़ा बाजार लगा है़ जिसमें विभिन्न जिले से आये कारोगारी जहां अपने भाग्य की आजमाइस कर रहे हैं, वहीं हजारों की संख्या में आये लोग जम कर कपड़ों की खरीदारी कर रहे हैं. कोई लुंगी तो कोई टोपी, कोई कंबल तो कोई कश्मिरी चादर की खरीदारी करने में व्यस्त नजर आ रहे हैं.
बांका जिला के बौंसी से आये कारोबारी मो. शहिद अंसारी ने बताया कि वे इस बार काफी लेटेस्ट डिजाइन के कंबल, चादर, बेडसीट, लुंगी, गमछा व शॉल लेकी आये हैं. किंतु पिछले साल के वनिस्पत इस बार मात्र एक चौथाई की बिक्री हो पायी है़ इस बार कारोबार पर नोटबंदी का असर दिख रहा है़ जिसके कारण काफी मायूसी छायी हुई है़
खानकाह रहमानी में उमड़ी भीड़.
सालाना इजलास व फातिया को लेकर यूं तो दो दिन पूर्व से ही लोग खानकाह रहमानी पहुंचने लगे थे़ रविवार की सुबह सालाना फातिया का आयोजन किया जायेगा़ इसको लेकर शनिवार को देश के अलग- अलग राज्यों से हजारों की संख्या में लोग पहुंच गये़ अनुमान लगाया जा रहा है
कि इसे फातिया में 50 हजार से भी अधिक इस्लाम धर्मावलंबी शामिल होंगे़ भीड़ इतनी हो चुकी है कि गोला मोड़ से लेकर चुआबाग तक सड़क पर दो पहिया वाहन को लेकर गुजरना भी काफी मुशकिल हो गया है़ दूरदराज से आये लोग यहां पर लगाये गये होटलों में जहां अलग- अलग प्रकार के व्यंजनों का स्वाद लेने मशगूल हैं, वहीं घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी में भी खास दिलचस्पी रख रहे हैं.
1901 में हुई थी खानकाह रहमानी की स्थापना
वर्ष 1901 में अजीम सुफी व जैयद आमिमे दीन कुतबे आलम हजरत मौलाना मो. अली मुंगेर रहमातुल्लाहि अलैह ने खानकाह रहमानी की स्थापना की थी़ उन्होंने ही वर्ष 1927 में जामिया रहमानी की भी बुनियाद रखी़ वर्ष 1934 में आये भूकंप के कारण जामिया रहमानी का भवन क्षतिग्रस्त हो गया़
जिसके बाद वर्ष 1942 में हजरत अमिरे सरियत मौलाना मिन्नतुल्ला रहमानी रहमातुल्लाहि अलैह ने फिर जामिया रहमानी के भवन का निर्माण करवाया़ तब से यहां बिहार के साथ- साथ देश के अन्य राज्यों व विदेश से आये छात्र दीनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.
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