घाटों पर नहीं है शौचालय, मैली हो रही गंगा

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प्रतिनिधि : मुंगेर जिले में स्वच्छ भारत अभियान का नारा फाइलों पर सिमट कर रह गयी है. देश के प्रधानमंत्री भले ही बनारस के अस्सी घाट पर बार-बार जाकर पूजा-अर्चना कर लोगों को स्वच्छ व निर्मल गंगा के लिए प्रेरित कर दें. किंतु मुंगेर में इसका कोई असर नहीं दिख रहा है. यहां के घाटों […]

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प्रतिनिधि : मुंगेर जिले में स्वच्छ भारत अभियान का नारा फाइलों पर सिमट कर रह गयी है.

देश के प्रधानमंत्री भले ही बनारस के अस्सी घाट पर बार-बार जाकर पूजा-अर्चना कर लोगों को स्वच्छ व निर्मल गंगा के लिए प्रेरित कर दें.

किंतु मुंगेर में इसका कोई असर नहीं दिख रहा है. यहां के घाटों के स्थिति में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ है और न ही गंगा को निर्मल बनाने को लेकर कोई पहल किया जा रहा है. जिला मुख्यालय में कुल चार घाट हैं.

किंतु एक घाट पर भी शौचालय की व्यवस्था नहीं है. जिसके कारण आम जनों को तो परेशानियों का सामना करना पड़ता ही है. साथ-साथ गंगा भी मैली होते जा रही है.

कष्टहरणी घाट
कष्टहरणी घाट की मुंगेर में अपनी एक अलग महत्ता है. जिले भर में सबसे अधिक श्रद्धालु इसी घाट पर गंगा स्नान को आते हैं. इस घाट का संबंध त्रेता युग से है.
लोक मान्यता है कि इस घाट पर लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम स्नान कर थकान मिटाये थे. किंतु घाट की समुचित सफाई व्यवस्था नहीं होने के कारण श्रद्धालुओं को परेशानी होती है. यहां आने वाले श्रद्धालु शौचालय की व्यवस्था नहीं रहने के कारण गंगा किनारे ही शौच त्याग कर देते हैं.
बबुआ घाट
बबुआ घाट को प्रशासनिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. गंगा किनारे किसी भी प्रकार की प्रतियोगिता व अन्य गतिविधियों का आयोजन इसी घाट पर होता है. दियारा क्षेत्र के कुतलुपुर व जाफरनगर पंचायत के लोगों का शहर आने का मुख्य रास्ता भी यही घाट है. छठ पूजा के दौरान यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं. किंतु यहां भी शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है.
जहाज घाट
मुंगेर से गंगा पार करने का प्रमुख स्थान जहाज घाट है. जहां प्रतिदिन सैकड़ों यात्री पहुंचते हैं तथा जहाज के लेट रहने पर वहां काफी देर तक इंतजार भी करते हैं. किंतु इस दरमियान यदि यात्रियों को शौच जाना पड़ जाय तो उन्हें गंगा के तट का ही सहारा लेना पड़ता है. क्योंकि यहां शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है
. इतना ही नहीं जहाज घाट के समीप ही श्मशान घाट भी है. जहां रोजाना दर्जनों लाशे जलती है. दाह संस्कार के लिए आने वाले लोगों को भी गंगा के तट पर ही शौच करना पड़ता है.
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