महानंदा के उफान से जलमग्न हुआ खरना श्मशान घाट, अंतिम संस्कार को लेकर बढ़ी ग्रामीणों की चिंता

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जलमग्न श्मशान घाट

Mahananda River: ठाकुरगंज प्रखंड में उफनती महानंदा नदी का पानी अब जीवन की अंतिम यात्रा के पड़ाव तक पहुंच गया है. प्रसिद्ध खरना श्मशान घाट परिसर पूरी तरह बाढ़ के पानी में डूब जाने से स्थानीय ग्रामीणों के सामने शवों के अंतिम संस्कार और धार्मिक कर्मकांड को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है.

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Mahananda River: बिहार के सीमांचल क्षेत्र अंतर्गत किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड से बाढ़ की एक बेहद विचलित और परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई है. पहाड़ी और मैदानी इलाकों में हो रही लगातार भारी बारिश के कारण महानंदा नदी का जलस्तर अचानक खतरे के निशान के पार पहुंच गया है. नदी के इस रौद्र रूप के कारण ठाकुरगंज स्थित ऐतिहासिक व सार्वजनिक खरना श्मशान घाट परिसर पूरी तरह जलमग्न हो गया है. घाट का मुख्य परिसर, शवदाह शेड और आसपास का पूरा खुला क्षेत्र 3 से 4 फीट पानी में डूब चुका है.

शेड और मुख्य घाट डूबे, अंतिम विदाई पर संकट

श्मशान घाट की मौजूदा स्थिति और जलस्तर से जुड़ी मुख्य जानकारियां इस प्रकार हैं. खरना श्मशान घाट पर सामान्य दिनों में वैदिक रीति-रिवाज से दाह संस्कार और अन्य सनातनी धार्मिक कर्मकांड संपन्न कराए जाते हैं.

लेकिन शनिवार और रविवार को नदी का तेज बहाव घाट के अंतिम छोर को तोड़ते हुए मुख्य शेड के भीतर तक प्रवेश कर गया. घाट के चारों ओर अब महानंदा की उफनती लहरों का कब्जा है, जिससे स्थानीय लोगों के बीच इस बात को लेकर भारी चिंता है कि यदि इस दौरान किसी की मृत्यु होती है, तो उसका अंतिम संस्कार कहाँ और कैसे किया जाएगा.

दर्जनों गांवों का इकलौता प्रमुख श्मशान घाट

इस श्मशान घाट के भौगोलिक और सामाजिक महत्व की कड़ियां काफी गहरी हैं. खरना श्मशान घाट ठाकुरगंज प्रखंड मुख्यालय सहित आसपास की करीब आधा दर्जन पंचायतों और कस्बों के सनातन धर्मावलंबियों के लिए अंतिम संस्कार का एकमात्र और सबसे प्रमुख स्थल है.

रोजाना यहाँ दूर-सुदूर के गांवों से लोग अपने परिजनों की अंतिम विदाई के लिए पहुंचते हैं. घाट के पूरी तरह पानी में डूब जाने से अब लोगों को शवों को जलाने के लिए ऊंचे स्थानों या निजी खेतों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिससे सामाजिक विवाद और व्यावहारिक कठिनाइयां खड़ी होने की आशंका है.

प्रशासनिक लापरवाही से जलकुंभी और गाद ने बढ़ाई आफत

स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि महानंदा नदी बरसात के मौसम में हर साल उफान पर रहती है, यह कोई नई बात नहीं है. लेकिन इस बार श्मशान घाट के डूबने की मुख्य वजह प्रशासनिक सुस्ती है.

नदी के मुहाने और घाट के किनारे भारी मात्रा में गाद (मिट्टी) जमा हो चुकी थी और जलकुंभी की सफाई नहीं की गई थी. अगर समय रहते नदी के इस किनारे पर सुरक्षात्मक बोल्डर क्रेट या ऊंचे बांध का निर्माण करा दिया जाता, तो आज आस्था का यह बड़ा केंद्र इस तरह जलमग्न नहीं होता.

Mahananda River: स्थिति बिगड़ी तो करनी होगी वैकल्पिक व्यवस्था

“बाढ़ के इस भयावह संकट पर बात करते हुए स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने कहा कि नदी का जलस्तर अभी भी लगातार बढ़ रहा है. यदि अगले 24 घंटे में बारिश नहीं थमी, तो स्थिति बेकाबू हो जाएगी. हम जिला प्रशासन और अंचलाधिकारी (CO) से मांग करते हैं कि आपदा प्रबंधन के तहत तुरंत श्मशान घाट के पास पानी निकासी की व्यवस्था की जाए या आपातकालीन स्थिति के लिए किसी सुरक्षित और ऊंचे सरकारी भूखंड को वैकल्पिक शवदाह स्थल के रूप में चिन्हित किया जाए.”

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प्रकृति के रौद्र रूप के आगे बेबस हुई व्यवस्था

महानंदा नदी की लहरों के बीच डूबा हुआ यह श्मशान घाट इस बात का जीता-जागता सबूत है कि प्रकृति के कहर के आगे इंसान की बनाई हर व्यवस्था कितनी बेबस है. जहां कभी चिताओं की आग और अपनों को खोने का क्रंदन गूंजता था, वहां आज सिर्फ बाढ़ के पानी का सन्नाटा पसरा है. क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों ने आपदा प्रबंधन विभाग से अविलंब खरना घाट का मुआयना करने और प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने की पुरजोर मांग की है.

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