कटिहार: अमदाबाद में बाढ़ से त्राहिमाम, टीन की नाव पर चूल्हा रखकर खाना बनाने को मजबूर महिलाएं; दुर्गापुर के घरों में घुसा कमर भर पानी
कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड में बाढ़ ने तबाही मचाई है. घरों में कमर से डेढ़ फीट तक पानी भर गया है, जिससे लोगों को नाव पर चूल्हा जलाकर खाना बनाने जैसे विकट हालात का सामना करना पड़ रहा है. प्रशासन की उदासीनता से लोग राहत सामग्री से वंचित हैं.
कटिहार जिले के अमदाबाद प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में बाढ़ की विभीषिका ने विकराल रूप धारण कर लिया है. निचले इलाकों में पिछले एक पखवाड़े से जलजमाव बना हुआ था, लेकिन बीते एक सप्ताह से गंगा और महानंदा के उफान ने दर्जनों रिहायशी गांवों को जलमग्न कर दिया है. दुर्गापुर पंचायत के लक्खी टोला, बालमुकुंद टोला और नारायणपुर समेत कई बस्तियों में हालात बदतर हो चुके हैं. घरों के आंगन में कमर भर और कमरों में एक से डेढ़ फीट पानी बह रहा है. इस भयंकर आपदा के बीच प्रशासन की उदासीनता से पीड़ित परिवारों में भारी आक्रोश है, जिन्हें अब तक बुनियादी राहत सामग्री तक मयस्सर नहीं हो सकी है.
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नाव पर चूल्हा, मचान पर जिंदगी: रूह कंपाने वाली तस्वीर
बाढ़ के बीच से मानवीय बेबसी की एक हृदयविदारक तस्वीर सामने आई है. दुर्गापुर पंचायत के एक परिवार की महिला मामूनी देवी घर के जलमग्न आंगन में टीन की छोटी नाव पर मिट्टी का चूल्हा रखकर परिवार के लिए भोजन पकाने को विवश हैं. भोजन बनने के इंतजार में उनके मासूम बच्चे हाथ में खाली थाली लिए पानी से घिरे चबूतरे पर लाचार बैठे नजर आए. पीड़ित मोहित रविदास ने नम आंखों से बताया कि किसी तरह रूखा-सूखा बनाकर परिवार का पेट पाला जा रहा है, लेकिन स्थिति अब बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है.

कमर भर पानी में कैद दर्जनों परिवार, घर छोड़ने को तैयार नहीं
रोहित रविदास, पशुपति रविदास, अर्चना देवी और कमल रविदास सहित दर्जनों परिवारों के घरों में बाढ़ का पानी घुस चुका है. इसके बावजूद ग्रामीण अपना बचा-खुचा सामान, अनाज और पशुओं को असुरक्षित छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने से डर रहे हैं. स्थानीय अजय रजक और अर्जुन रजक के परिजनों ने बताया कि कमरों में चौकी और लकड़ी के मचान डालकर पूरे परिवार को उसी पर समेट दिया गया है. उसी चौकी पर चूल्हा जलाकर किसी तरह गुजारा हो रहा है.
शौचालय डूबे, महिलाओं पर टूटा संकट, सांप-बिच्छू का बना खौफ
ग्रामीण डोमाराम ने दर्द बयां करते हुए बताया कि गांव के सभी शौचालय जलमग्न हो चुके हैं, जिससे खासकर महिलाओं और किशोरियों को असहनीय परेशानियों और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है. पानी में जहरीले सांप, कीड़े और बिच्छू तैर रहे हैं, जिससे दिन-रात काटने का डर बना रहता है. इलाके में न तो शुद्ध पेयजल की कोई व्यवस्था है और न ही रोशनी का कोई साधन.
ऊंचे स्थानों पर पलायन, खुले आसमान तले तिरपाल को तरसते लोग
हालात बिगड़ने के बाद कई परिवार अपने घरों को छोड़कर ऊंचे तटबंधों और सड़कों पर शरण ले चुके हैं. लेकिन विडंबना यह है कि एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी अंचल प्रशासन की ओर से इन विस्थापित परिवारों को प्लास्टिक (पॉलीथिन शीट) तक उपलब्ध नहीं कराई गई है. पीड़ित खुले आसमान के नीचे या फटे-पुराने कपड़ों का तंबू बनाकर भीगते हुए रातें काटने को मजबूर हैं. बाढ़ पीड़ितों ने जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से अविलंब नाव की व्यवस्था, पॉलीथिन शीट, सूखा राशन और मेडिकल किट उपलब्ध कराने की गुहार लगाई है.
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